वाराणसी यात्रा के अनुभव भाग - 6 (समापन)

वाराणसी अभ्यास शिविर भाग - 6 (समापन किश्त)

अब तक का विवरण आपने भाग -1,  भाग – 2,  भाग – 3भाग - 4 एवम भाग - 5 में पढा. अब इस यात्रा के समापन भाग की तरफ़ बढते हैं.

तय कार्यक्रम अनुसार आज संकट मोचन हनुमान जी के दर्शनार्थ, सुबह सुबह तैयार होकर मधु जी की गाडी से हम, वत्स जी, मधु जी और विक्की शर्मा जी, रवाना हो गये. मंदिर के बाहर बहुत सी प्रसाद की और फ़ूलों की दुकानें थी. सबने अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार हार फ़ूल और प्रसाद लिये पर हमने कुछ नहीं लिया. प्रसाद के नाम पर पेडे और बेसन के लड्डू थे जिनको चखकर विक्की शर्मा जी बोले कि यह तो निरी शक्कर है.... सो हमारी इच्छा नहीं हुई....  पर बनारस गये हो और प्रसाद लेकर घर नहीं लौटो तो घर में फ़जीते होने का डर था. सो हमने सोचा कि बाहर कि किसी दुकान से ढंग के पेडे ले लेंगे....

यहां काल भैरव मंदिर के उलट सब काम व्यवस्थित था. लाईन लगी थी और मास्क अनिवार्य था, मोबाईल फ़ोन भी नहीं ले जाने दे रहे थे..... जिन्हें हमने ड्राईवर साहब को सौंप दिया और आनंद पूर्वक हनुमान जी के दर्शन किये बिना किसी धक्का मुक्की के बहुत सुंदर दर्शन हुये. और लौटकर होटल आ गये जहां सभी साथी नीचे ही इंतजार करते मिले. हमने फ़टाफ़ट रूम में जाकर अपना सामान पैक किया और नीचे आ गये. 

जो महफ़िल 14 अगस्त से शुरू हुई थी अब उसकी समाप्ति का समय आ चुका था यानि 16 अगस्त की सुबह, जब सबको बिछुडना था. सुबह सुबह ही सब अपना सामान पैक करके नीचे हाल में ब्रेक फ़ास्ट के लिये इकठ्ठे हो ही चुके थे. शिविर में जो पाया और जो दिया, इसकी खुशी सबके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी. कहीं ना कहीं सभी को बिछुडने का गम भी था. 


  

पर प्रकृति का नियम है, कोई भी चीज स्थिर नहीं रहती. हम जीवन में खुशी के पलों में ठहर जाना चाहते हैं पर प्रकृति आपको उससे दूर ले जाती है. मनुष्य के वश में नहीं है वर्ना वो आज इतनी तरक्की नहीं करता बल्कि तालिबानों की तरह अब भी पाषाण युग में ही जी रहा होता. प्रकृति में ठहराव नहीं बल्कि एक बहाव होता है, यह बहाव सकारात्मक ही होता है बशर्ते हम आगे बढने की कोशीश करते रहें. शिविरार्थियों ने जो ज्ञान पाया है उसे मथते रहेंगे तो जीवन में एक दिव्य दृष्टि प्राप्त करने में निश्चित रूप में सफ़ल होंगे और आपकी यही सफ़लता हमारी और वत्स जी की गूरू दक्षिणा होगी. ईश्वर आपको जीवन में सफ़लता और सुगमता दे, यही शुभकामनाएं हैं.

यहां इस शिविर में मिसेज पारीक भी हमारे बीच रहीं, बहुत ही शालीन व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं उनसे ज्यादा बातचीत करने का समय नहीं मिला, इसका मलाल अवश्य रहेगा.

ब्रेकफ़ास्ट करते हुये माहोल कुछ वासंती सा लग रहा था, महिलाओं की ड्रेस से ऐसा ही लगा, वसंत हंसी खुशी और प्रकृति के रंग बिखेरने और उल्लास का पर्व होता है और यही उल्लास यहां बिखरा पडा था. सभी चाह रहे रहे थे कि वक्त कुछ देर और ठहर जाये. पर इंसान यहीं तो विवश है, काल अपनी गति से भागता जाता है, वो अपना पहिया कभी नहीं रूकने देता. उसे ठहरने का पता ही नहीं है. बस जो उसके साथ कदम से कदम मिला सके वो ही विजयी है और जिसे रूकना है वो रूके उसकी बला से, ये रूकने वाले फ़िर जीवन में रूके ही रहते हैं.

इतनी ही देर में 11 बज गये, हमें और वत्स जी को एयरपोर्ट ले जाने के लिये गाडी आ गई. तभी मधु जी बोली....  आपने गाडी काहे बुलवाई? हम आपको छोडते हुये निकल जाते..... अब हमें टेक्सी वाले को लौटाना अच्छा नहीं लगा.....  फ़िर भी मधु जी आपकी विनयशीलता और सहृदयता के हम हमेशा कायल रहेंगे.

कुछ लोगों की रवानगी का समय देर से था सो वो लोग वहीं होटल में रूक गये. हम और वत्स जी सबसे विदा लेकर एयरपोर्ट के लिये निकल लिये. हमारे पीछे पीछे ही मधु जी भी अपनी गाडी लेकर अपने गंतव्य के लिये रवाना हो गई.  

एयरपोर्ट का आधा रास्ता तय करने के बाद प्रसाद की याद आई, जो कि हमने अभी तक लिया ही नहीं था. एक बार हम और वत्स जी ज्वाला मुखी जी जाने का कह कर घर से निकले थे और यह तो हम दोनों को ही पता है कि कहां गये थे पर घरवालों के हिसाब से हम गोवा ही गये थे..... अब उनके शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं है तो हम कैसे यकिन दिला सकते थे. उस टूर में भी यही गड्बड हुई थी कि प्रसाद लेना भूल गये थे तो हमने इंदौर एयरपोर्ट से घर के रास्ते में ही एक दुकान से प्रसाद के नाम पर पेडे ले लिये और बडी श्रद्धा भावना से श्रीमती जी को सौंप दिया कि सबको मोहल्ले में बंटवा दे यह ज्वालामुखी जी का प्रसाद है.

थोडी देर बाद जब डिब्बा खोला तो हमारी पोल पट्टी खुल गई क्योंकि डिब्बे पर इंदौर के हलवाई का नाम पता प्रिंटेड था, शायद इसीलिये बुजुर्गों ने कहा है कि कितनी ही चालाकी करलो....कभी ना कभी पकडे तो जायेंगे ही... अब हमारे साथ जो हुआ होगा वो तो आप भी समझ ही गये होंगे, क्योंकि आप भी बाल बच्चेदार हैं.  यह गलती हम दोहराना नहीं चाहते थे सो रास्ते में एक दुकान से प्रसाद लिया और अच्छी तरह चेक कर लिया कि इस पर वाराणसी का ही नाम पता लिखा हो.

थोडी देर बाद "लाल बहादुर शाश्त्री एयरपोर्ट" या बाबतपुर एयरपोर्ट सामने दिखाई देने लगा था. फ़टाफ़ट जाकर चेक इन किया और सिक्युरीटी चेक के बाद बोर्डिंग गेट नं 4  के सामने जाकर बैठ गये. एयरपोर्ट बहुत ही शानदार और आधुनिक सुविधाओं से युक्त बना हुआ है. आखिर हो भी क्यों ना? मोदी जी का कार्यक्षेत्र जो ठहरा.


तय समय पर बोर्डींग शुरू होगई और कुछ ही देर में टेक आफ़ भी हो गया. रास्ते में ऊपर का मौसम काफ़ी खराब था सो हिचकोले खाते हुये ही दिल्ली पहुंचे. फ़्लाईट स्मूथ नहीं रही, अलबता विस्तारा एयर लाईन के एयरक्राफ़्ट की सीटें आरामदायक थी और क्रू मेम्बर्स बहुत ही अच्छे व्यवहार वाले थे. वहां से सीधे हमने और वत्स जी ने डोमेस्टिक ट्रांसफ़र का रास्ता पकडा.....हमारी आगे की फ़्लाईट में सिर्फ़ 1 घंटे का ही अंतराल था. इंटरनल सीक्युरीटी चेक की लाईन बहुत लंबी थी सो हमे लगा कि आज फ़्लाईट छूट जायेगी. तभी विस्तारा का एक स्टाफ़ दिखा जो इस तरह की फ़्लाईट वालों की मदद के लिये तैनात रहते हैं, उसने हमें ले जाकर सबसे आगे खडा कर दिया.... वत्स जी के पास काफ़ी समय था, अगली फ़्लाईट पकडने का सो यहीं वत्स जी से विदाई ली और सिक्युरीटी चेक के बाद फ़टाफ़ट मानीटर पर देखा तो हमारा बोर्डिंग गेट नं. 62 था.... हमने माथा पीट लिया.... 27 नंबर गेट से शुरू होकर 62 तक पहुंचना था. वहां कहीं इलेक्ट्रिक वाहन भी नहीं दिखा लिहाजा चलती हुई सडक पर भी दौडते हुये आगे बढने लगे.

घर से बच्चों की पहले से ही फ़रमाईश थी कि गेट नं 41 के सामने KRISPY KREME का काऊंटर है वहां से DOUGHNUTS लेकर आना. अब बच्चों को कौन नाराज करे सो वहां से फ़टाफ़ट डोनट लिये और भागे. अंतत: हम आखिरी यात्री थे जिसका इंतजार हो रहा था यदि 5 मिनट लेट हो जाते तो बोर्डिंग गेट बंद हो चुका होता.

आखिर इस तरह इंदौर पहुंचे....



अब मधु जी का विशेष धन्यवाद करना चाहुंगा कि आपने बचा लिया.... आपने इतना खूबसूरत गिफ़्ट दिया कि श्रीमतीजी की तबियत खुश हो गई और उसने घोषणा कर दी कि अबकि गणेश चतुर्थी पर इन्हीं की स्थापना की जायेगी......बहुत शुक्रिया आपका.

अंत में आप सबका आभार और शुक्रिया कि आपने इस शिविर को यादगार और सुनहरा बना दिया. ईश्वर आप सबको अपने मनोरथ में सफ़लता दे.     


#हिन्दी_ब्लॉगिंग

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