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उत्तम खेती है जरूर करिये.....

उड़ते पंछी का सारा आकाश....
नए बछड़े को नई नई चीजों में सींग घुसेड़ने में जितना मजा आता है उतना पुरानी चीजों में नही। इसी तरह मौज लेने वालों को भी ताजा तरीन विषय लगता है मौज लेने के लिए तो खेती से ज्यादा ताजा तरीन विषय कोई हो ही नही सकता। खेती किसानी जितनी आसान लगती है उतनी आसान है नही। खेती के औजार भी सीधे नहीं होते तो खेती करना कैसे सीधा होगा? फिर इस पर लिखना तो और भी मुश्किल।

हम संटू भिया के कबाड़खाने इसी आस में पहुंचे थे कि जो कहीं भी ना मिले वो भिया के कबाड़ में जरूर मिल जाता है। वहां देखा तो भिया नदारद, कुछ पाने की उम्मीद में बैठकर हम गहन चिंतन में डूब लिए।  खेती में सींग घुसेड़ने को हम बाएं अंगूठे का काम समझे थे वो तो उतना ही मुश्किल होता जा रहा था। हम परेशान होकर वहां से फूटने ही वाले  थे कि संटू भिया आ धमके और अपने लोहे के तख्त सिंहासन पर विराज लिए। और उनके पीछे पीछे ही हमारी मित्र मंडली के सदस्य रमलू भिया चाय वाले भी आ गए।
हमने अचरज भरी निगाहों से उनकी तरफ देखा तो उन्होंने हमें देखकर कहा कि आज दुकान बंद है। पूछने पर कहने लगे कि खेती की हड़ताल होने की वजह से दूध नही आया तो चाय काहे से बनाते? तीन दिन होगये ... चाय का काम धंधा ठप।
हमने उन्हें बिना मांगे सलाह दे डाली की रामदेव बाबा का पाऊडर वाला डब्बे का दूध ले आते, काहे दुकानदारी ठप कर दी?

रमलू भिया यह सुनकर हमारे ऊपर ही भड़क लिए, भड़क क्या लिए बल्कि फट ही पड़े, बोले - ये सब तुम जैसे सिरफिरों  कि साजिश है जो अपने फायदे के लिए गरीब किसानों को मरवा रहे हो। उनकी सब्जियां खेतों में ही सड़ रही हैं, दूध तुम लोगों ने सड़क पर रायते सरीखा फैलवा दिया...सब तुम नेताओं की साजिश का नतीजा है।

हमने पूछा रमलू भिया आपके कौन से खेत हैं आप क्यों परेशान हो रहे हो?  रमलू भिया बोले - हैं क्यों नही? हमारे पास सात बीघा जमीन गांव में है और हम खेती भी करते हैं, ये चाय का तो हमारा पार्ट टाइम धंधा है। सब कुछ खेती के भरोसे रहें तो भूखे मर जाये।

हमने पूछा कि कुछ कर्ज वर्ज भी लिया है कि नही आज तक? तो रमलू भिया बोले - हमें वैसे कर्ज की जरूरत तो नही थी पर नेताजी बोले कि सब लोग कर्ज जरूर लेकर रखो क्योंकि कर्ज वापस तो लौटाना नही है। कर्ज तो नेताजी सरकार से माफ करवा देंगे सो हमने भी 5 लाख रुपये कर्ज लिया था। कर्ज से एक मोटरसाइकिल खरीदी, मकान की छत डलवा ली और ये चाय की दुकान डाल ली।

हमने आश्चर्य से पूछा कि कर्ज वापस मांगने कोई आया कि नही? वो बोले कि आते हैं बैंक वाले पर जो नेताजी की शरण मे हैं उनको कोई कुछ नही कहता बाकी के लोगों के बैल भैंस मकान बैंक वाले जब्त कर लेते हैं।

हमने पूछा भिया आपके यहाँ कोई नही आता क्या?
भिया बोले नही हम तो नेताजी के पाले में हैं। चुनाव में हम नेताजी को जितवाने में पूरा दमखम लगा देते हैं। और नेताजी जब तक हैं तब तक तो हम नही लौटाएंगे। वैसे भी महाराष्ट्र सरकार ने माफ कर दिया है तो अपने यहां भी माफी आती ही होगी वरना मामाजी का उपवास कैसे टूटेगा?

हम लिखना विखना भूलकर चुपचाप वहां से उठकर घर चले आये और सोचने लगे कि कहीं दो चार बीघा जमीन का जुगाड़ करके अन्नदाता बनने की कोशिश करनी चाहिए, खाली नेतागिरी से दुकान नही चलने वाली।

2 comments:

  1. एक शेर, एक चार लाईन की कविता, एक गीत लिखकर हम समझते है कि
    किसानों के प्रति हमारी भावनाओं का जो फर्ज है पूरा किया !
    सच में जिस तरह से किसान आज अपने स्वभाव से
    भटक गया है उसपर क्या क्या लिखे कितना लिखे ? :(
    सुंदर पोस्ट !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-06-2017) को
    रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर; चर्चामंच 2644
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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