Powered by Blogger.

जो बिखर के चकनाचूर हुए, वो सपने हमने देखे हैं !




जो बिखर के चकनाचूर हुए, वे स्वप्न उमड़ते देखें हैं
इन नजरों ने, प्रभु के सम्मुख ,तूफ़ान उमड़ते देखे हैं.


मैं सुबह कहूं,  इसको कैसे, जलप्रलय में सूरज उगने को
जिस रात अनगिनत आफ़ताब मैंने आग उगलते देखे हैं.

ये इश्क मोहब्बत की गज़लें  दुनियां में तमाशा  करती हैं

मैंने तो यहाँ   लैलाओं  से , कई  मजनू लुटते हुये देखे हैं.

सारी रात गुजर गई यादों में,लगता है कि वे आने से रहे

पूरी रात करवटें , बदल बदल, अफ़साने  हज़ारों  देखे हैं.

लुटा यहाँ सब प्रभु के सम्मुख, बर्वादी के आँगन में     
फिर भी ताऊ ने भूखे प्यासे, काफ़िले चलते  देखे हैं. 

37 comments:

  1. मैं सुबह कहूं, इसको कैसे, जलप्रलय में सूरज उगने को
    जिस रात अनगिनत आफ़ताब मैंने आग उगलते देखे हैं.

    लाजबाब ताऊ जी, सुन्दर गजल !

    ReplyDelete
  2. वाह: बहुत सुन्दर प्रस्तुति....

    ReplyDelete
  3. लुटा यहाँ सब प्रभु के सम्मुख, बर्वादी के आँगन में
    फिर भी ताऊ ने भूखे प्यासे, काफ़िले चलते देखे हैं.
    एक से एक लाजवाब शेर है ताऊ, बहुत सुन्दर गजल है !

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ....!!

    ReplyDelete
  5. लाजवाब अभिव्यक्ति! ताओ के कृतित्व का एक रूप यह भी है।

    ReplyDelete
  6. बहुत बढ़िया शेर....
    लाजवाब!!!!

    सादर
    अनु

    ReplyDelete
  7. सच कहा ताऊ , काफले नहीं रुकते...

    ReplyDelete
  8. आज की बुलेटिन "काका" को पहली पुण्यतिथि पर नमन .... ब्लॉग बुलेटिन।। में आपकी पोस्ट (रचना) को भी शामिल किया गया। सादर .... आभार।।

    ReplyDelete
  9. ये इश्क मोहब्बत की गज़लें दुनियां में तमाशा करती हैं
    मैंने तो यहाँ लैलाओं से , कई मजनू लुटते हुये देखे हैं.

    गजब ताऊ।

    ReplyDelete
  10. बहुत उम्दा,सुंदर गजल ,,,वाह ताऊ !!! क्या बात है,,

    RECENT POST : अभी भी आशा है,

    ReplyDelete
  11. सच कहा भाई जी ...काफिले लुटते रहते हैं
    जिन्दगी चलती रहती है .....

    ReplyDelete
  12. बहुत खूब! आपकी रचना का ये रूप भी बहुत अच्छा लगा...
    ~सादर

    ReplyDelete
  13. गजब ताऊ......
    जैसे मुस्कानो के झरने से कराह बहती हुई.....

    ReplyDelete
  14. प्रभु के मन की क्या कहें हम तो इन्सनों का मन बी कहां समझ पाते हैं ।
    पर शिकायत करने का हक तो रखते ही हैं हम ।

    ReplyDelete
  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शुक्रवार (19-07-2013) को स्वर्ग पिता को भेज, लिया पति से छुटकारा -चर्चा मंच 1311 पर "मयंक का कोना" में भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  16. लुटा यहाँ सब प्रभु के सम्मुख, बर्वादी के आँगन में ,फिर भी ताऊ ने भूखे प्यासे, काफ़िले चलते देखे हैं
    सुन्दर लिखा है ताऊ !!

    ReplyDelete

  17. मैं सुबह कहूं, इसको कैसे, जलप्रलय में सूरज उगने को
    जिस रात अनगिनत आफ़ताब मैंने आग उगलते देखे हैं.

    लाजवाब गज़ल......

    आसमान का आफताब तो उगल सकता है आग भी
    गरीबी में धरती के चंदाओं को मैंने बुझते देखे ।

    ReplyDelete
  18. ये इश्क मोहब्बत की गज़लें दुनियां में तमाशा करती हैं
    मैंने तो यहाँ लैलाओं से , कई मजनू लुटते हुये देखे हैं.

    बहुत उम्दा गजल....वाह !!!

    ReplyDelete
  19. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  20. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

    ReplyDelete
  21. ये इश्क मोहब्बत की गज़लें दुनियां में तमाशा करती हैं...वाह ! आह निकाल दिया..

    ReplyDelete
  22. ये इश्क मोहब्बत की गज़लें दुनियां में तमाशा करती हैं
    मैंने तो यहाँ लैलाओं से , कई मजनू लुटते हुये देखे हैं.
    लुटा यहाँ सब प्रभु के सम्मुख, बर्वादी के आँगन में
    फिर भी ताऊ ने भूखे प्यासे, काफ़िले चलते देखे हैं.
    ताऊ, अभी तो और बहुत कुछ देखना बाक़ी है ,देखते रहिये, अपना हिया जलाते रहिये.

    ReplyDelete
  23. ये इश्क मोहब्बत की गज़लें दुनियां में तमाशा करती हैं
    मैंने तो यहाँ लैलाओं से , कई मजनू लुटते हुये देखे हैं.
    लुटा यहाँ सब प्रभु के सम्मुख, बर्वादी के आँगन में
    फिर भी ताऊ ने भूखे प्यासे, काफ़िले चलते देखे हैं.
    ताऊ, अभी तो और बहुत कुछ देखना बाक़ी है ,देखते रहिये, अपना हिया जलाते रहिये.

    ReplyDelete
  24. वाह शायर ताऊ !
    आने लगा है निखार धीरे धीरे।

    ReplyDelete
  25. व्यंग्य लेखन में तो आप माहिर है ही ...और अब उस के साथ साथ ...खूबसूरत गज़ल भी

    ReplyDelete
  26. बहुत बढ़िया ....अर्थपूर्ण पंक्तियाँ

    ReplyDelete
  27. ये इश्क मोहब्बत की गज़लें दुनियां में तमाशा करती हैं
    मैंने तो यहाँ लैलाओं से , कई मजनू लुटते हुये देखे हैं.

    .वाह ......................बहुत उम्दा गजल !!!

    ReplyDelete
  28. एक दौर है निराशा का , गुजर ही जायेगा!
    अच्छी कही मगर ग़ज़ल !

    ReplyDelete
  29. मैं सुबह कहूं, इसको कैसे, जलप्रलय में सूरज उगने को
    जिस रात अनगिनत आफ़ताब मैंने आग उगलते देखे हैं.

    सुन्दर बिम्ब भाव और व्यंजना

    ReplyDelete

  30. जो बिखर के चकनाचूर हुए, वे स्वप्न उमड़ते देखें हैं
    इन नजरों ने, प्रभु के सम्मुख ,तूफ़ान उमड़ते देखे हैं.

    ताऊ सा का ज़वाब नहीं :


    जो बिखर के चकनाचूर हुए, वे स्वप्न उमड़ते देखें हैं
    इन नजरों ने, प्रभु के सम्मुख ,तूफ़ान उमड़ते देखे हैं.

    इबतिदा -ए-इश्क है रोता है क्या ,

    आगे आगे देखिये होता है क्या

    ReplyDelete
  31. वाह क्या नये अंदाज में नयी बात कही है
    बहुत खूब भाई जी
    सादर

    ReplyDelete
  32. ये इश्क मोहब्बत की गज़लें दुनियां में तमाशा करती हैं
    मैंने तो यहाँ लैलाओं से , कई मजनू लुटते हुये देखे हैं...

    बहुत ही लाजवाब ... सुभान अल्ला ... हर शेर कई कई कहानियां समेटे ...
    हकीकत की ज़मीन पे बैठ के लिखे शेर ... आज तो तेवर कुछ नए ही हैं ताऊ ...

    ReplyDelete
  33. लुटा यहाँ सब प्रभु के सम्मुख, बर्वादी के आँगन में
    फिर भी ताऊ ने भूखे प्यासे, काफ़िले चलते देखे हैं.
    ....................बहुत सुन्दर गजल है ताऊ


    राज चौहान
    http://rajkumarchuhan.blogspot.in

    ReplyDelete