Powered by Blogger.

ताऊ तरही कम गरही कवि सम्मेलन में : कवि शिरोमणी श्री विजय कुमार सप्पात्ति

प्यारे श्रोताओं, मैं रामप्यारे ताऊ तरही कम गरही सम्मेलन में आप सबका स्वागत करता हुं. ताऊ गरही मुशायरे में अभी तक आप महाकवि ताऊ जी महाराज, महान कवियित्री मिस समीरा टेढी, और आलराऊंडर श्री ललित शर्मा को सुन चुके हैं. और आज इस सम्मेलन में महान कविकार, अनेक विधाओं के ज्ञाता श्री विजयकुमार सप्पात्ति अपनी हास्य व्यंग की रचना प्रस्तुत कर रहे हैं.

और हमेशा की तरह आन लाईन कैट स्केनिंग का कार्यभार संभाल रही हैं मिस रामप्यारी. और अब मैं आमंत्रित करता हूं आज की रेवडी प्राप्त श्री विजयकुमार सप्पाति को...जोरदार स्वागत किजिये हमारे आज के महाकवि महाराज का... आईये विजय जी.... अपनी बिल्कुल ताजी और हास्य व्यंग की रचना से इस गरही सम्मेलन की गरिमा को साढे नौ चांद लगाकर हम सब को कृतार्थ किजिये..

कविराज श्री विजय सप्पाति के कविता पाठ पर डांस करता रामप्यारे, कैट स्केन करती हुई मिस. रामप्यारी


प्यारे श्रोताओं, आप सबको विजय सप्पाति की और से होली की भांग भरी नमस्कार, आज मैं आपको अपनी कविता "मेरी कविता की किताब" की दास्तान सुना रहा हूं, ध्यान से सुनिये और मटका भर कर होली युक्त टिप्पणी दिजिये.



नीरज जी से मेरी मुलाकात हुई ;

मन की पूरी बहुत बड़ी आस हुई !

उन्हें अपना समझकर उन्हें चाय पिलाई ;

दिल उनका जीतकर मैंने एक बात बतलाई !

नीरज जी , मुझे कविता की किताब छपवाना है

साहित्य की दुनिया में बड़ा नाम कमाना है

बहुत बड़ा कवि बनकर दिखलाना है

नीरज जी हंसकर बोले ,

और बोल कर गज़ब ढा दिया

मेरा छोटा सा दिल तोड़ दिया

कविता लिख लिख कर बोरा भर , बौरा गया है

तेरी किताब को कोई नहीं पढ़ेगा

उस पर घास रखकर गधे चरेंगे

और दाल रख कर लोग रोटी खाएँगे

सुनकर दिल मेरा भयभीत सा हुआ

मेरे भीतर का कवि व्यथित हुआ !!

फिर भी निडर हो मैंने किताब छपवाने की ठान ली

नीरज जी को अनसुना कर दिया ;

जाते जाते नीरज जी फिर बोल गए

कानों में नीम सा कुछ घोल गए

विजय, क्यों पगला गया है

और दिल की बात मान ली

बेटा ,दोबारा सोच ले

मेरी बात पर कान दे !

पर मैंने न कान, न नाक और न आंख दी

उनकी सलाह को आंख दिखा दी

एक कान से सुनी दूसरे से निकाल दी

मैं कहा , नीरज जी , बस अब देखिये क्या होता है

साहित्य की दुनिया में मेरा कैसा नाम होता है

घर आकर सारे रूपये लगाकर

मैंने मोटी सी किताब छपवाई

और अपने खर्चे पर दोस्तों को भिजवाई

और लोकार्पण की एक बड़ी पार्टी रखवाई

ये बात अलग है कि इस सारी प्रक्रिया में

बीबी ने मुझे डांट ही खिलाई

खाना तो छोड़िये चाय भी नहीं पिलाई

बहुत दिन बीत गए

कर्जा जिनसे लिया था

वो आने शुरू हो गए

मेरे नाम से गालियों के दौर शुरू हो गए

कविता की वाहवाही की कोई निशान नहीं था

साहित्य जगत में मेरे कोई नाम नहीं था

मैंने एक दिन फैसला किया

और दोस्तों के घर जाने का हौसला किया !!

एक दिन भरी बरसात में एक

दोस्त के घर गया और जो देखा

उसके बच्‍चे मेरी किताब के पेजों की

एक दूसरे पर हवाई जहाज़ बना कर उड़ा रहे है

देख कर ये सीन दिल मेरा टूट गया

उसे जी भर भर कोसा

नाव बना रहे हैं और

मैं उस दोस्त से रूठ गया !

और मेरी किताब को चबा रहा था !!

दूसरे दोस्त के घर गया

उसका छोटा बच्चा खडा था

तीसरे दोस्त के घर गया

वहां हाल और भी खराब थे

वे किताब को वो बेच कर छोले खा चुके थे !!!

घूमते घूमते रात हो गई

पेट में चूहे तांडव मचाने लगे

एक दोस्त के घर पहुंचा

वो बेचारा गरीब था

बरतनों से भी मरहूम था

मुझे बड़े प्यार से खिलाई

उसने मेरी ही किताब पर रख कर दाल रोटी ,

ऐसा कर के उसने मुझे बड़ी ठेस

पर पेट की आंतडि़यों को राहत पहुंचाई

वापिस आते हुए ठोकर लगी और मैं गिर पड़ा

मेरे पैर को मेरी किताब ने ही ठोका था

मुझे गिराने का मौका उसने नहीं चूका था

आँख खुली तो हॉस्पिटल नजर आया

मेरे उपर पड़ रही थी नीरज जी की छाया

गिरा और बेहोश हो गया मैं

नीरज जी हंसकर कहा

फिक्र मत करो , सब ठीक है

हॉस्पिटल का बिल कुछ ज्यादा आया था

तेरी मोटी किताबों को बेचकर चुकाया है

मैं फिर खुश हो गया

पर दोबारा से रो गया

जब मुझे बताया कि बिकी नहीं

मोटी थी, तुली हैं, तोलाराम कबाड़ी वाले ने खरीदी हैं

तभी बिल चुकाया है

हाय रे मेरी कविता की किताब

जिसने अस्‍पताल में भर्ती करवाया मुझे जनाब !!!

अब कभी भी अपनी कोई किताब नहीं छपवाऊंगा ,

ये बात अब समझ आ गयी है

अब आप भी इसे समझ ले , यही दुहाई है ......!!!!!


हमारे अगले रेवडी प्राप्त कवि हैं चच्चा रामपुरी चक्कू वाले यानि श्री अनुराग शर्मा (स्मार्ट इंडियन)
(अगले अंक में)

22 comments:

  1. अब भी कोई किताब छपवाना चाहे तो उसकी मर्जी !:)

    ReplyDelete
  2. जय हो होली पर...श्री विजय सप्पत्ति जी की....


    मजेदार

    ReplyDelete
  3. वाह वाह! कसम परबतिया भौजी की, बहुत सुंदर रचना है। सतपति अंटी हाथ में दु-दु मोबाईल धरे गजब ढा रही हैं।

    ताऊ वंदना के कुछ अंश

    ताऊ चरण कमल रज नित श्रद्धा लेय लगाये
    तिनके सकल काज सिद्ध ताऊ जी करे सहाय

    जय हो ताऊ ज्ञान के आगर
    सकल भुवन में तुम उजागर

    ताऊ ब्लाग के तुम हो स्वामी
    तुम्हारी पहेली सबने जानी

    खेल खिलाओ तुम सतरंगी
    चेलों की नहीं है तुम्हे तंगी

    एक हाथ में लट्ठ विराजे
    दुसर हाथ में माउस साजे

    ब्लाग जगत है तेरा वन नंदन
    उडन तश्तरी का है अभिनन्दन

    बुद्धिवान तुम गुण की खान
    भतीजों के तुम हो भगवान

    तुम्हारा चरित हमारे मन बसिया
    तुम हो हास्य व्यंग्य के रसिया

    अपन रूप तुम केहू ना दिखावा
    रामप्यारे को ही सम्मुख लावा

    मुझ अपढ़ गंवार की विनती सुन लो त्रिपुरारी
    थोड़ी किरपा मुझ पे हो,ध्यान धरो संगवारी

    ReplyDelete
  4. होली की रंगारंग शुभकामनायें आप सबको।

    ReplyDelete
  5. वाह आज तो विजय जी ने बड़ी लंबी कविता लिख छोड़ी है :)

    ReplyDelete
  6. मेरी तरफ से कीचड़ भरा एक गुब्बारा...छपाक।

    ReplyDelete
  7. कविता अच्छी है, और चांदों के काबिल भी. लेकिन यह साढ़े नौ चांदों का क्या राज है..

    ReplyDelete
  8. आदरणीय ताऊ जी राम राम
    केवल राम की तरफ से
    आज की रचना एक दृष्टान्त लग रही है .. लेकिन भाव सम्प्रेषण बहुत सजगता से हुआ है ....बहुत उम्दा ...आपका आभार

    ReplyDelete
  9. होली का रंगारंग प्रोग्राम सपाति जी के साथ बहुत अच्छा लगा\ राम राम ताऊ होली की हार्दिक बधाई।

    ReplyDelete
  10. तो होली धमाल छन रही है :))
    शुभकामनायें

    ReplyDelete
  11. आदरणीय ताऊ जी को मेरा प्रणाम.

    संग सारे साथियो को भी मेरा आदर भरा प्रणाम.
    दोस्तों आप सभी को सबसे पहले होली की रंगारंग शुभकामनाये .

    दोस्तों, मुझे आपने इतना प्यार दिया उसके लिए मैं आप सभीको सलाम करता हूँ .

    ये कविता मैंने श्री नीरज गोस्वामी जी और श्री अविनाश जी के आशीर्वाद के बाद लिख पाया हूँ. श्री अविनाश जी ने इसे final edit किया था.

    आप सभी गुरुजनों का दिल से शुक्रिया , मैंने इसे कल और आज भी ऑडियो में रिकॉर्ड करने की कोशिश की थी , श्री गिरीश जी ने सुबह बहुत मेहनत की , लेकिन शायद कुछ त्रुटी रह रही है .. देखते है , शाम को अगर हुआ तो एक बार और कोशिश करूँगा .

    मैं आशा करता हूँ की आप सभी का प्यार मुझे यूँ ही प्राप्त होंगा .

    बहुत धन्यवाद.
    ताऊ जी को एक बार फिर से स्पेशल शुक्रिया .

    आपका
    अपना
    विजय

    ReplyDelete
  12. होली की हार्दिक शुभकामनाएँ..

    ReplyDelete
  13. विजय सप्पत्ति जी को
    शानदार कविता पाठ के लिए बधाई.....

    ReplyDelete
  14. वाह वाह, क्या कविता सुनाई ताऊ ! :)

    ReplyDelete
  15. @@हाय रे मेरी कविता की किताब
    जिसने अस्‍पताल में भर्ती करवाया मुझे जनाब !!!
    अब कभी भी अपनी कोई किताब नहीं छपवाऊंगा ,
    ये बात अब समझ आ गयी है
    अब आप भी इसे समझ ले , यही दुहाई है ......!!!!!..
    सही बात आपने बतलाई--राम-राम.

    ReplyDelete
  16. काव्य पुस्तक प्रकाशन पर व्यंग अच्छा है ।
    अब तो हम भी कभी नाम न लेंगे छपवाने का ।

    ReplyDelete
  17. अरे ताऊ क्यो इस उम्र मे हमारी नीयत खराब कर रहे हो... रोज नये नये पटाखे दिखा कर, आज पतली कमर के झटके दिला रहे हो:)

    ReplyDelete
  18. बहुत सुन्दर रचनापाठ!
    होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
    --
    वतन में अमन की, जागर जगाने की जरूरत है,
    जहाँ में प्यार का सागर, बहाने की जरूरत है।
    मिलन मोहताज कब है, ईद, होली और क्रिसमस का-
    दिलों में प्रीत की गागर, सजाने की जरूरत है।।

    ReplyDelete
  19. बहुत सुन्दर रचनापाठ!
    होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
    --
    वतन में अमन की, जागर जगाने की जरूरत है,
    जहाँ में प्यार का सागर, बहाने की जरूरत है।
    मिलन मोहताज कब है, ईद, होली और क्रिसमस का-
    दिलों में प्रीत की गागर, सजाने की जरूरत है।।

    ReplyDelete
  20. बहुत सुन्दर रचनापाठ!
    होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!
    --
    वतन में अमन की, जागर जगाने की जरूरत है,
    जहाँ में प्यार का सागर, बहाने की जरूरत है।
    मिलन मोहताज कब है, ईद, होली और क्रिसमस का-
    दिलों में प्रीत की गागर, सजाने की जरूरत है।।

    ReplyDelete
  21. विजय जी को सुंदर हास्य रचना के लिए बधाई.मेरी होली के शुभ अवसर पर सभी को हार्दिक शुभ कामनाएँ .

    ReplyDelete