बेटा रोया
कि उसे भूख मिटाना है..
रुखा सूखा जो मिल जाये
खाना है!!

भूख तो सिर्फ
एक बहाना है...
दरअसल उसे आज फिर
पिज्ज़ा खाना है!!
अतिथी पोस्ट:-
-समीर लाल ’समीर’
Wednesday, May 5, 2010 at 4:44 AM Posted by ताऊ रामपुरिया

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27 comments:
Wednesday, May 05, 2010 5:19:00 AM
सच्चाई है
सटीक
Wednesday, May 05, 2010 6:17:00 AM
सही कहा, सर।
कहीं पढ़ा था कि "खाने का सही समय कौन सा है?"
जवाब - "गरीब को जब मिल जाये, और अमीर का जब मन करे।"
अब ये और बढ़ा देते हैं उसमें कि "क्या खाना चाहिये"
गरीब को जो मिल जाये और अमीर का जो मन करे।
विसंगतियां कुछ लोगों के लिये तर्कसंगत भी होती हैं।
आभार
Wednesday, May 05, 2010 6:19:00 AM
बहुत खूब | शानदार रचना !
जब से शहर में रहने लगे है तब से बाजरे के सोगरे भी किसी पिज्जा से कम नहीं लगते
Wednesday, May 05, 2010 6:21:00 AM
समीर लाल जी तो कलम के धनी हैं ही!
अमीरी व गरीबी में अन्तर बताती रचना बहुत ही प्रभावशाली है!
इस रचना को पढ़वाने के लिए ताऊ का आभार!
Wednesday, May 05, 2010 6:46:00 AM
सच सनातन रहेगा।
Wednesday, May 05, 2010 6:49:00 AM
सचमुच विसंगति
Wednesday, May 05, 2010 6:54:00 AM
गरीब और अमीर की व्यथा तो सभी समझते हैं ...जो इनके बीच में आते हैं ...उनका दर्द कौन लिखेगा ...??
Wednesday, May 05, 2010 7:15:00 AM
संक्षिप्त और प्रभावशाली कविता।
Wednesday, May 05, 2010 7:22:00 AM
बड़ा गंभीर व्यंग्य है ताऊ जी
Wednesday, May 05, 2010 7:37:00 AM
भूख और गरीबी अमीरी का
बहुत ही उम्दा चित्रण
आभार
Wednesday, May 05, 2010 8:16:00 AM
शीर्षक देख कर भागता आया की लगता है ताऊ ने समीर लाल को घेर लिया है !
मगर यहाँ तो आज ताऊ भी गंभीर हो गया ...इब क्या कहें .....?
Wednesday, May 05, 2010 8:32:00 AM
सही कहा, कहीं धुप तो कहीं छाँव!
Wednesday, May 05, 2010 9:49:00 AM
सटीक !
Wednesday, May 05, 2010 9:52:00 AM
भूख मिटाना और भूख एक बहाना!
यह भी एक अंतर है गरीब और अमीर में !
शायद यह बीच का वर्ग ही है जो इस अंतर को देख पाता है और महसूस करता है .
Wednesday, May 05, 2010 10:59:00 AM
wah ...sahi likha
Wednesday, May 05, 2010 11:02:00 AM
samir laalji dar nahin lagtaa aisaa likhne me .kyaa aap nahin jaante 'growth rate 9 per cent '
(p .c )hai .
garibon kaa kyaa hai -naa ho kameez to paanvon se pet dhak lengen ,ye log kitne munaasib hain is safar ke liye .veerubhaai 1947.blogspot.com
Wednesday, May 05, 2010 11:13:00 AM
भूख तो सब को समान रूप से ही लगती है.. किसी को क्षुधा शान्त करने के लिये जूठन भी नहीं मिलती और किसी की क्षुधा इन्सानी रक्त और मांस से भी शान्त नहीं होती..
Wednesday, May 05, 2010 11:14:00 AM
badhai saheb ko
Wednesday, May 05, 2010 12:18:00 PM
इन दो बच्चो के बीच तीसरे बच्चे की कमी खलती है या तो समीर जी परिवार नियोजन वालो से डर गए या ताऊ तक पहुचने से पहले ही गुम हो गया है क्यों कि मुझे तो ये दोनों ही बच्चे अपनी जिंदगी में मस्त दिखाई दे रहे है |ज्यादा परेशान तो वो तीसरा है जो झूठ मूठ अपनी शान को बनाए रखने की कोशिश करता है |
Wednesday, May 05, 2010 12:31:00 PM
सत्य को बयाँ करती एक उम्दा प्रस्तुति।
Wednesday, May 05, 2010 12:45:00 PM
कम शब्दों में गहरी बात
Wednesday, May 05, 2010 2:26:00 PM
असलियत हैं कभी नहीं बदलनी
Wednesday, May 05, 2010 5:54:00 PM
गजब की विसंगति।
Wednesday, May 05, 2010 7:10:00 PM
अच्छा आप इधर हैं :)
अप्रतिम
Thursday, May 06, 2010 12:24:00 AM
इंडिया की फाइव स्टार कल्चर के बच्चे इतने फल-फू.....ल रहे हैं कि डॉक्टर जंक फूड को उनकी जान का दुश्मन बता रहे हैं...
भारत के अभावों से ग्रस्त गांवों या शहरों के स्लम के बच्चे इतने कुपोषित हैं कि जान बचाने के लिए ही रूखी-सूखी रोटी का इंतज़ाम ही भारी हो रहा है...
आई लव माई इंडिया...
मेरा भारत महान...
जय हिंद...
Thursday, May 06, 2010 1:25:00 AM
बहुत सही कहा जी
Thursday, May 06, 2010 1:38:00 AM
प्रासंगिक......वस्तु विषय पर "लालाजी" का सटीक एवं धारदार प्रहार !!!!
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