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कवि सम्मेलन में उदघोषक बोला |
"कवि चोर करेलवी कैसे कहलायेंगे"?
Tuesday, January 19, 2010 at 4:44 AM Posted by ताऊ रामपुरिया
Labels: poem
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About Me
- ताऊ रामपुरिया
- अब अपने बारे में क्या कहूँ ? मूल रुप से हरियाणा का रहने वाला हूँ ! लेखन मेरा पेशा नही है ! थोडा बहुत गाँव की भाषा में सोच लेता हूँ , कुछ पुरानी और वर्त्तमान घटनाओं को अपने आतंरिक सोच की भाषा हरयाणवी में लिखने की कोशीश करता हूँ ! वैसे जिंदगी को हल्के फुल्के अंदाज मे लेने वालों से अच्छी पटती है | गम तो यो ही बहुत हैं | हंसो और हंसाओं , यही अपना ध्येय वाक्य है | हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं ! उस पर लिखा है : कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं ! एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं ! ब्लागिंग का मेरा उद्देश्य चंद उन जिंदा दिल लोगों से संवाद का एक तरीका है जिनकी याद मात्र से रोम रोम खुशी से भर जाता है ! और ऐसे लोगो की उपस्थिति मुझे ऐसी लगती है जैसे ईश्वर ही मेरे पास चल कर आ गया हो ! आप यहाँ आए , मेरे बारे में जानकारी ली ! इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ !
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30 comments:
Tuesday, January 19, 2010 6:33:00 AM
यूँ तो सूरदास रैदास जैसे कवियों के
हजारों पद में हजारों हजार विचार हैं
किन्तु जो क्वालिटी कंट्रोल में खरे होते हैं
हम सुनाते बस केवल वही दो चार हैं...
--वाह वाह कविवर..ताऊ...
क्या बात है..लट्ठ कहाँ गया..ये कवितागिरी और लट्ठ तो साथ न चल पायेगा.
Tuesday, January 19, 2010 6:58:00 AM
ये कैरानावी ने अपना नाम कब से बदल लिया ? सावधान ताऊ !
Tuesday, January 19, 2010 7:06:00 AM
सच कहा है ताऊ चोर अगर इमानदारी बरते तो वो चोर नहीं रहा जाता है | करारा व्यंग्य है, आभार इस रचना के लिए |
Tuesday, January 19, 2010 7:35:00 AM
वाह ताऊ जी !
बहुत ही शानदार कही
Tuesday, January 19, 2010 8:26:00 AM
अच्छा व्यंग्य है।
Tuesday, January 19, 2010 8:35:00 AM
कैसा कलयुग आगया है भगवन
प्रचार प्रसार को ही चोरी करना बताया जा रहा है.
Tuesday, January 19, 2010 8:49:00 AM
कवि करेलवी को अब तो अकल आनी ही चाहिए उम्मीद है जिस मन्तव्य से आपने इतनी मेहनत की है उसका परिणाम सार्थक होगा.
regards
Tuesday, January 19, 2010 9:05:00 AM
ताऊ ताजी ताजी खबर के अनुसार मियां करेलवी ने कहा है कि उन्हें डेडिकेट करती हुई ये रचना बहुत पसंद आई है , वे इसे भी ................हां , वही वही ....
अजय कुमार झा
Tuesday, January 19, 2010 9:46:00 AM
'कैसा कलयुग आगया है भगवन
प्रचार प्रसार को ही चोरी करना बताया जा रहा है.'
--कलयुग तो घोर कलयुग ही है.
-नयी तरह की अनूठी और सुंदर प्रस्तुति.
Tuesday, January 19, 2010 11:32:00 AM
मज़ा आगया , गज़ब की रचना , सच है ताऊ ,और इन चोरो पर कोई असर भी नहीं होता !
Tuesday, January 19, 2010 11:39:00 AM
ईमानदारी तो अब चोरी के धंधे में ही बची है
Tuesday, January 19, 2010 11:45:00 AM
वाह ताऊ जी!
यो के रमझोळ सुणा दिया
आपने छापर सा पाड़ दिया
फ़ाटे पजामे सील रहे थे वो
तमने तो तम्बु ही पाड़ दिया
राम-राम
Tuesday, January 19, 2010 12:31:00 PM
ताऊ! इस बार सूर्यग्रहण पे कहीं कोई जरूर सिद्धि-विद्धि तो नहीं कर ली......तभी तो लट्ठ की बजाए इतनी बढिया रचनाएं निकल रही हैं:)
Tuesday, January 19, 2010 12:48:00 PM
आप की रचना देखकर मुझे भी चौर्य कर्म करने की प्रेरणा मिल रही है.
Tuesday, January 19, 2010 12:55:00 PM
वाह ताऊ श्री .......... आप भी ग़ज़ब ढाते हो ....... खूब लगाई है मदन लाल की ........ पर आपका एंगल भी ठीक लगता है .... एक बॉग क्या करेगा ...... मदन लाल ने तो प्रचार के लिए चोरी करी रचनाओं की .........
Tuesday, January 19, 2010 1:30:00 PM
वाह ताऊ जी क्या बात है! आपने तो बहुत बढ़िया, शानदार और जानदार बात कह दिया है! बहुत खूब !
Tuesday, January 19, 2010 3:50:00 PM
ताऊ जी!
इन चोरों की ही तो पौबारह है!
ये मदनलाल तो सबसे बड़ा नटवर लाल है!
Tuesday, January 19, 2010 4:16:00 PM
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Tuesday, January 19, 2010 4:41:00 PM
माना कि रचना सूरदास की है
पर क्वालिटी कंट्रोल तो हमारा है.
उनकी रचनाएं कापी राईट मुक्त हैं.
अरे फ़िल्म मे भी तो किसी और के नाम से आया है
बिना कापी राईट का माल जैसे आता है वैसे ही जाता है.
bahu behatrin tau
Tuesday, January 19, 2010 7:21:00 PM
वाह ताऊ जी क्या आइडिया दिया है अब आपकी इस कविता को चुरा कर सुनाना पड़ेगा.
Tuesday, January 19, 2010 8:51:00 PM
ताऊ दाद तो सब ने दे दी इस बहुत बहुत बहुत सुंदर रचना पर, हम दवा दे रहे है इस दाद की
Tuesday, January 19, 2010 9:52:00 PM
चोर जलेलबी आये हैं
मुंह पर चाशनी लपटाये हैं
चोर करेलवी के चेहरे को
चोरी के नये आयामों ने
मन को मोह(चोरी)लिया
इसलिए हम जलेलबी बांट
रहे हैं
जिसको चाहिये गोल गोल
घूमते घूमते आयें और
मधुमेहफ्री जलेलबी का
जायका पायें।
Tuesday, January 19, 2010 11:50:00 PM
कृपया हिन्दी के प्रसार प्रचार में ऐसा ही योगदान करते रहवें. साधुवाद!!
:)
Wednesday, January 20, 2010 1:02:00 AM
इस कर्म को चोरी कहना सही नहीं है, ये तो पुण्य का काम है :)
Wednesday, January 20, 2010 1:32:00 AM
वाह, वाह! मज़ा आ गया ताऊ! बड़े दिनों बात इतनी जानदार कविता पढने को मिली!
Wednesday, January 20, 2010 6:07:00 PM
bahut hi sundar kavita hai.
Wednesday, January 20, 2010 11:17:00 PM
आपको और आपके परिवार को वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनायें!
Thursday, January 21, 2010 10:44:00 AM
क्वालिटी कंट्रालरों को प्रणाम.
Thursday, January 21, 2010 8:54:00 PM
शानदार और जानदार ...
Thursday, February 11, 2010 5:45:00 PM
वाह ताऊ जी!
यो के रमझोळ सुणा दिया
आपने छापर सा पाड़ दिया
फ़ाटे पजामे सील रहे थे वो
तमने तो तम्बु ही पाड़ दिया
राम-राम
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