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प्रेम


एक सन्यासी
एक गठरी लिये
हिमालय के पहाडों पर
अपने गंतव्य की ओर
हाफ़ंते हुये बढ रहा था.

तभी पीछे से एक अल्हड लडकी
पीठ पर एक गठरी ऊठाये
सहयात्री के मानिंद
साथ साथ बढने लगी


सन्यासी हांफ़ते हुये
विश्राम के लिये रुका
और उस लडकी से बोला
बेटी, तू भी इस बोझ को उतार दे
और दो घडी विश्राम करले

लडकी ने
सन्यासी को खा जाने वाली
तपती निगाह से देखा
और बोली
सन्यासी महाराज
ये मेरा बीमार भाई है
कोई बोझ नही है

सन्यासी ने तुरत माफ़ी मांगी
और बोला
हां बेटी, तू सही कहती है
प्रेम मे कभी बोझ नही होता
वो तो परमात्मा की तरह
बिल्कुल निर्भार है.


(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)

28 comments:

  1. waah bahut hi khubsoorati se prem ki pribhasha di hai ............atisundar man khush ho gaya.....badhaai

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  2. बिल्कुल सत्य...

    सुन्दर रचना!!

    सीमा जी को बधाई एवं regards. :)

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  3. सही है.. भाई है बोझ नहीं...

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  4. सही बात कही आपने गुरूजी

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  5. सत्य वचन्!!

    उम्दा रचना के लिए सुश्री सीमा जी ओर आपको भी बहुत सारी बधाई!!!

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  6. बहुत सुंदर रचना.

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  7. बिल्कुल खरी बात. प्रेम मे बोझ नही होता.

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  8. लडकी ने
    सन्यासी को खा जाने वाली
    तपती निगाह से देखा
    और बोली
    सन्यासी महाराज
    ये मेरा बीमार भाई है
    कोई बोझ नही है

    behad sundar bat kahi apane

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  9. लडकी ने
    सन्यासी को खा जाने वाली
    तपती निगाह से देखा
    और बोली
    सन्यासी महाराज
    ये मेरा बीमार भाई है
    कोई बोझ नही है

    behad sundar bat kahi apane

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  10. सन्यासी महाराज
    ये मेरा बीमार भाई है
    कोई बोझ नही है

    वाह ताऊ, सौ टका खरी बात है.

    ReplyDelete
  11. सन्यासी महाराज
    ये मेरा बीमार भाई है
    कोई बोझ नही है

    वाह ताऊ, सौ टका खरी बात है.

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  12. वाह ताऊजी आज तो बहुत सुंदर बात कही.

    ReplyDelete
  13. वाह ताऊजी आज तो बहुत सुंदर बात कही.

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  14. वाह ताऊजी आज तो बहुत सुंदर बात कही.

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  15. प्रेम मे कभी बोझ नही होता
    वो तो परमात्मा की तरह
    बिल्कुल निर्भार है.

    सत्य वचन ताऊ !

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  16. हां बेटी, तू सही कहती है
    प्रेम मे कभी बोझ नही होता
    वो तो परमात्मा की तरह
    बिल्कुल निर्भार है.
    waah bahut hi marmik aur sachhi rachana.sunder.

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  17. संस्मरण पोस्ट के रूप में बहुत बढ़िया रहा।
    बधाई।

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  18. बहुत सुंदर, अपना है तो निर्भार है. काश! पराये भी हो पाते.

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  19. वाह
    आज तो बहुत सुंदर बात कही.
    मन पुलकित है .........

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  20. sach hai prem aur aatimy sambandh kabhi bojh nahin hote.

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  21. समीर जी की टिप्पणी भी शब्दशः मेरी मानी जाय !

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  22. सत्य वचन ...सीमाजी को आभार ...!!

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  23. प्रेम मे कभी बोझ नही होता
    वो तो परमात्मा की तरह
    बिल्कुल निर्भार है.


    कितनी अच्छी बात कही ...सच में प्रेम भार नहीं इक सुन्दर रूप लिए उम्दा अहसास है ...बहुत खूब !!!

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  24. निश्चय ही साधू जी गलती पर थे। अनुभव हीनता की गलती।

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