"मैं भीख क्यों मांगता"

भिखारी के हाथ मे
रोटी देख ललचाये कुत्त्ते
ने पूंछ हिलाई
भिखारी ने हाथ की रोटी
भूखे कुत्ते को जा थमाई
यह मंजर देख रही
अम्माजी ने पूछा
खुद भूखा था फिर रोटी
कुत्ते को क्यों दे डाली
अम्माजी ने पूछा
खुद भूखा था फिर रोटी
कुत्ते को क्यों दे डाली
बेजुबान प्राणी बेचारा
और कहां जाएगा,
मुझसे ज्यादा भूखा था ,
कहां से रोटी पायेगा,
और कहां जाएगा,
मुझसे ज्यादा भूखा था ,
कहां से रोटी पायेगा,
मै तो जब हाथ फैलाऊंगा,
कोई ना कोई दे ही जायेगा,
सुन कर चौंक गयी अम्माजी ,
इतनी अक्ल रही जब तुझमे,
भीख काहे को मांगे है,
कोई ना कोई दे ही जायेगा,
सुन कर चौंक गयी अम्माजी ,
इतनी अक्ल रही जब तुझमे,
भीख काहे को मांगे है,
भिखारी बोला,
अजब जमाना आया है अम्मा,
तरस खाकर रोटी मिल जाती,
काम नहीं मिल पाया है,
अजब जमाना आया है अम्मा,
तरस खाकर रोटी मिल जाती,
काम नहीं मिल पाया है,




35 comments:
Tuesday, August 04, 2009 3:48:00 PM
बिलकुल सही बात ताऊ जी
अगर काम मिल मै भीख क्यों मागता
Tuesday, August 04, 2009 4:10:00 PM
विचारणीय पोस्ट , सत्य को बयां करती हुई
Tuesday, August 04, 2009 4:37:00 PM
सीमा गुप्ता जी की इस कविता की जितनी तारीउ की जाये कम है।
नायाब है।
बधाई,
ताऊ को भी और सीमा गुप्ता जी को भी।
Tuesday, August 04, 2009 4:49:00 PM
शोचनीय स्थिति एवं सोचनीय विषय !
Tuesday, August 04, 2009 5:04:00 PM
वाह!
मूरख को तुम राज दियत हो
पंडित फिरत भिखारी
संतों करम की गति न्यारी
(मीराबाई)
Tuesday, August 04, 2009 7:30:00 PM
bahut kadwa sach hai jeevan ka.gehre marmik bhav bahut badhai.
Tuesday, August 04, 2009 7:42:00 PM
वास्तव में दुखद है और सही स्थिति भी यही है.
Tuesday, August 04, 2009 8:46:00 PM
कोनसे ज़माने की बात कर रहे हो ताऊ जी आजकल तो भिखारी भीख मांगने को बिजनेस कहते हैं .
Tuesday, August 04, 2009 9:11:00 PM
समाज का सब से बड़ा संकट बेरोजगारी ही है।
Tuesday, August 04, 2009 9:59:00 PM
सीमा जी की कविता पढ़वाने के लिए आभार ताऊ !!
Tuesday, August 04, 2009 10:14:00 PM
आपने तो इस कविता के माध्यम से वर्तमान की सबसे बडी सच्चाई को ही उजागर कर दिया।।
बेहतरीन्!!! सीमा जी सहित आपका भी आभार्!!
Tuesday, August 04, 2009 10:28:00 PM
बात तो बिल्कुल सही है ताऊ जी लेकिन ज्यादातर भिखारी तो भीख ही सिर्फ इसलिए मांगते है कि कमाना नहीं पड़े हालंकि आज कल भीख मांगने में भी मेहनत पूरी करनी पड़ती है |
Tuesday, August 04, 2009 10:31:00 PM
वाह क्या खूब कहा सीमाजी बहुत सटीक अभिवयक्ति है आभार्
Tuesday, August 04, 2009 11:06:00 PM
गज़ब कविता !
मार्मिक !
Wednesday, August 05, 2009 9:25:00 AM
वाह बहुत बढ़िया! भीख तो तब मांगी जाती है जब और कोई काम करने के लायक नहीं है!
Wednesday, August 05, 2009 10:32:00 AM
bahut sahi kaha.
Wednesday, August 05, 2009 10:33:00 AM
सत्य बात है.
Wednesday, August 05, 2009 10:33:00 AM
सत्य बात है.
Wednesday, August 05, 2009 10:35:00 AM
पर आज भीख मांगना भी स्वरोजगार मे आगया है.:)
Wednesday, August 05, 2009 10:35:00 AM
पर आज भीख मांगना भी स्वरोजगार मे आगया है.:)
Wednesday, August 05, 2009 10:35:00 AM
पर आज भीख मांगना भी स्वरोजगार मे आगया है.:)
Wednesday, August 05, 2009 10:36:00 AM
वाकई कटु सत्य.
Wednesday, August 05, 2009 10:36:00 AM
वाकई कटु सत्य.
Wednesday, August 05, 2009 10:38:00 AM
भिखारी बोला,
अजब जमाना आया है अम्मा,
तरस खाकर रोटी मिल जाती,
काम नहीं मिल पाया है,
यह तो हकीकत है.
Wednesday, August 05, 2009 10:38:00 AM
भिखारी बोला,
अजब जमाना आया है अम्मा,
तरस खाकर रोटी मिल जाती,
काम नहीं मिल पाया है,
यह तो हकीकत है.
Wednesday, August 05, 2009 10:38:00 AM
भिखारी बोला,
अजब जमाना आया है अम्मा,
तरस खाकर रोटी मिल जाती,
काम नहीं मिल पाया है,
यह तो हकीकत है.
Wednesday, August 05, 2009 10:43:00 AM
दयनिय स्थिति है.
Wednesday, August 05, 2009 10:43:00 AM
दयनिय स्थिति है.
Wednesday, August 05, 2009 11:28:00 AM
भिखारी बोला,
अजब जमाना आया है अम्मा,
तरस खाकर रोटी मिल जाती,
काम नहीं मिल पाया है,
काम अगर मिल जाता तो
मैं भीख क्यों मांगता?
सीमा जी हमेशा की तरह आज भी आपकी रचना बहुत उम्दा है... आपकी हर रचना में एक शिक्षा दिखाई देती है....
मीत
Wednesday, August 05, 2009 1:08:00 PM
बेहतरीन रचना ।
आज लोग रोटी तो दे देते पर काम नही ।
Wednesday, August 05, 2009 2:11:00 PM
तल्ख हकी़कत को कविता के कोमल रूप में पढ़कर अच्छा लगा, बेहतरीन रचना के बधाई।
Wednesday, August 05, 2009 2:56:00 PM
कविता के माध्यम से लिखा है सार्थक, केवल सत्य ............ अच्छी रचना है ........ रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनायें...........
Wednesday, August 05, 2009 4:04:00 PM
बहुत संजीदा रचना...
Thursday, August 06, 2009 4:12:00 AM
बिलकुल सही...मेहनतकश से ज्यादा तरस भिखारिओं पर खाया जाता रहा है ..!!
Monday, August 10, 2009 4:21:00 PM
yahi sthiti hai aaj ki!
dukhd aur dayniy!
bheekh mil jaati hai rozgaar nahin..
bhaavpoorn kavita.
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