प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के 34 वें अंक मे हार्दिक स्वागत है.
आजकल मिलावट का जोर इतना जबरदस्त होगया है कि क्या कहा जाये? नकली दवाईयां..नकली और मिलावटी मिर्च मसाले..ये तो मामूली बाते हो गई. यानि हम सब इसके आदि हो चुके हैं. हर चीज मे मिलावट.
फ़िर लौकी, कद्दू, तरबूज खरबूज ..जिनके २५-५० ग्राम के फ़ल को रात में हारमोनल इंजेक्शन लगाया जाता है और सुबह वो सीधे ७ - ८ किलो वजन के हो जाते हैं. और जानते हैं यह वही इंजेक्शन होता है जो २ या ४ रुपये का आता है और गाय भैंसो को दूध निकालने के लिये लगाया जाता है. जिसके बारे मे कहा जाता है कि यह दूध भी बहुत जहरीला होता है. आगे चलकर इसे पीने वालों को नाना प्रकार की बीमारीयों का सामना करना पडता है.
अब सीधे सीधे आया है केमिकल युक्त दूध. जी हां और वो भी मुम्बई पूना जैसे शहरो मे हजारो लाखों लीटर की मात्रा मे रोज सप्लाई हो रहा है. पहले यह दुध राजस्थान हरयाणा के कुछ हिस्सों मे ही तैयार होता था. अब तो पूरे राष्ट्रिय स्तर पर बीमारी की तरह फ़ैल गया है. और वो भी केमिकल से सिर्फ़ अढाई रुपये लीटर मे तैयार हो रहा है. मिलावट करने वाले इंसानियत के दुश्मन उसे ३० रुपये लीटर मे पिला रहे हैं इस देश के नन्हे मुन्नों कॊ.
कहते हैं कि देशी घी तो असली मिल ही नही सकता. आप कोई सा भी ब्रांड ले लिजिये.नकली ही मिलेगा.
आखिर हम कहां जा रहे हैं? क्या हमारे पास इन मामलों के लिये समय नही है. इन सबकी अनदेखी इस राष्ट्र के भविष्य पर बहुत भारी पडने वाली है. और मित्रों आप सरकार के भरोसे मत रहियेगा. सरकार मे तो जैसे चैतुये फ़सल काटने आते हैं उसी तरह से ये भी चैतुये हैं जो फ़सल काटने आये हैं और ये मिलावट कालाबाजारी चोरबाजारी इनकी फ़सल है. क्योंकि धडल्ले से हर राज्य मे इनके नुमाईंदों के सामने ये मिलावट का जहर सारी आबादी को परोसा जारहा है.
कुछ सोचे..कुछ करें. आपका यह सप्ताह शुभ हो.
-ताऊ रामपुरिया
![]() आज याद आते है हमारे तिवारी मास्साब. कालेज में पढ़ाया करते थे. मैने उन्हें कभी भी नोट्स नये सादे कागज पर बनाते नहीं देखा. हमेशा इस्तेमाल किये हुए कागज के पीछे ही लिखा करते थे. कच्चा काम जैसे टोटल आदि लगाना घर और दफ्तर में आई चिट्ठियों के खाली लिफाफों को फाड़कर बनाये गये पैड़ पर. मुझे लगता था कितने कंजूस हैं. एक नई कॉपी नहीं खरीद सकते. आज सोचता हूँ तो लगता है कि पर्यावरण संरक्षण की कितनी बड़ी चेतना रही होगी उनके भीतर. नमन करने को जी चाहता है. हम सभी अब हाथ से तो ज्यादा लिखते नहीं मगर यदि कम्प्यूटर भी इस्तेमाल करते हैं तो क्या प्रिंट हमेशा नये पन्ने पर ही लेते हैं. जब तक कहीं प्रेजेन्टेशन की बात न हो, क्या हम पन्नों को दोनों तरफ प्रिन्ट करते हैं? यदि नहीं, तो सोच कर देखियेगा कि ऐसा करके आप कितनी बचत कर सकते हैं और साथ ही पर्यावरण संरक्षण में कितना बड़ा योगदान. यह मत सोचो कि मेरे अकेले के करने से क्या होगा? बूंद बूंद से सागर भरता है, पहली बूंद गिराओ तो!! ऐसी ही बचत के अन्य आयामों पर भी ध्यान दें जैसे गिफ्ट रैपर को संभाल कर खोलें ताकि वह पुनः इस्तेमाल हो सके. गिफ्ट में मिले लिफाफे, मेल में आये लिफाफे एवं अन्य एक तरफ इस्तेमाल की गई स्टेशनरी आदि. सभी पर्यावरण की सुरक्षा में सार्थक कदम होंगे. हरियाली पर लिये कुल्हाड़ी तुमने ये जो वार किया है सोच सको तो सोचो इसको ऐसा कितनी बार किया है.. तड़पोगे तुम उस दिन यारों जब ये धरती बंजर होगी पेड़ नहीं काटा है तुमने तुमने खुद को मार दिया है. -समीर लाल 'समीर' |
![]() त्रिपुरा प्रकृति प्रेमियों के लिए बेहद आकर्षक पर्यटक स्थल है त्रिपुरा! भौगोलिक क्षेत्र 10,49,169 हेक्टेयर और 27,57,205 [ 1991 Census के अनुसार ] जनसँख्या वाला यह राज्य भारत का दूसरा सब से छोटा राज्य है.सुदूर उत्तर पूर्व में स्थित ७ राज्यों में से एक राज्य है.इस छोटे से राज्य उत्तरी,दक्षिणी,और पश्चिमी सीमायें बंगला देश की सीमा से जुडी हैं.इस कि पूर्वी सीमा भारत के मिजोरम और आसाम राज्यों की सीमा से जुडी है. त्रिपुरा बांग्लादेश तथा म्यांमार की नदी घाटियों के बीच स्थित है. यहाँ मुख्यत बंगला और काकबोरक भाषाएँ बोली जाती हैं. इस राज्य की अधितकतर आबादी गावों में रहती है और कृषि ही उनका मुख्य व्यवसाय है. अगरतला इस राज्य की राजधानी है.[यह बंगला देश से मात्र २ किलोमीटर दूर है.] १८३८ में राजा कृष्ण किशोर ने अगरतला को त्रिपुरा की राजधानी बनाया था. इस राज्य में केवल चार ही जिले हैं. १-धलाई जिला,२ उत्तरी त्रिपुरा ३-जिला,दक्षिण त्रिपुरा जिला,४-पश्चिम त्रिपुरा जिला. त्रिपुरा का नाम कैसे पड़ा? इस बारे में विभिन्न मत हैं- १-स्थानीय भाषा में 'तुइपारा ' का अर्थ है पानी से जुडा हुआ.कहते हैं पहले यह क्षेत्र बंगाल की खाड़ी तक फैला हुआ था.इसी वजह से इस का नाम त्रिपुरा पड़ा हो? २-ऐसा भी कहा जाता है कि राजा त्रिपुर, जो ययाति वंश का 39 वाँ राजा था के नाम पर इस राज्य का नाम त्रिपुरा पड़ा. ३-एक मत के अनुसार स्थानीय देवी त्रिपुर सुन्दरी [त्रिपुरेश्वरी देवी]के नाम पर यहाँ का नाम त्रिपुरा पड़ा . यह 51 शक्ति पीठों में से एक है. ४-कहते हैं पहेल यह जगह तीन जिलों [छात्ग्राम ,नोखाली और कुमिला ] से मिल कर बनी हुई थी इस लिए त्रि+पुर =त्रिपुरा ' कहने लगे. जानिए त्रिपुरा के इतिहास को- त्रिपुरा को प्राचीन काल में किराटभूमि कहते थे और इसकी राजधानी त्रिबेग थी.हजारों साल पहले इस का नाम त्रिपुरा पड़ा.ऐसा माना जाता है कि त्रिपुरा का इतिहास बहुत पुराना है.महाभारत,अशोक के शिला लेखों और पुराणों में भी इस के बारे में लिखा मिलता है.राजमाला के अनुसार त्रिपुरा के शासकों को ‘फा’ उपनाम से पुकारा जाता था जिसका अर्थ ‘पिता’ होता है.त्रिपुरा नरेश के बारे में ‘राजमाला’ गाथाओं तथा मुसलमान इतिहासकारों के वर्णनों से जाना जा सकता है.कई युद्धों में त्रिपुरा के शासकों ने बंगाल के सुल्तानों कों हराया था. 19 वि शताब्दी में राजा वीर चन्द्र बहादुर [माणिक्य राजवंश]ने अपने राज्य का शासन ब्रिटिश भारत की तर्ज पर चलाया.इस तरह उनके शासनकाल में त्रिपुरा में नए युग की शुरुआत हुई. महाराजा की मृत्यु के बाद- चूँकि उनके बेटे 'किरीट बिक्रम किशोर 'बहुत छोटे थे इस लिए महाराजा की पत्नी महारानी कंचन प्रभा देवी ने राजगद्दी संभाली. यूँ तो भारत की आज़ादी के बाद तत्कालीन महारानी ने ९ सितम्बर ,१९४७ को त्रिपुरा के भारत संघ में शामिल होने के लिए लिखित सहमती दे दी थी. लेकिन १५ अक्टूबर , 1949 को ही त्रिपुरा को भारत संघ ने अपने अधिकार क्षेत्र में शामिल किया.तब तक वहां महारानी द्वारा स्वतंत्र राज्य किया जाता रहा.वर्त्तमान में 'महाराजा प्रद्योत बिक्रम माणिक्य' इस राजवंश से हैं.. 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद यह केंद्रशासित प्रदेश बना.राज्य का दर्जा १९७२ में ही मिला. त्रिपुरा राज्य के ' उज्जयंता पैलेस' का चित्र आप को पहेली में दिखाया गया था. अब जानते हैं उज्जयंता पैलेस के बारे में- ![]() त्रिपुरा के राजवंश के पूर्व निवास स्थान इस उज्जयंता महल को सरकार द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में करने के बाद सरकारी धरोहर घोषित कर दिया गया.पिछले कुछ वर्षों से यह खाली था इस लिए अब यहाँ राज्य विधान सभा की बैठकें की जाती हैं और यह प्रतिबंधित क्षेत्र है.शान ३ बजे से चार बजे के बीच अगर आप मुख्य द्वार से जाएँ तो आप पास ले सकते हैं और घूम सकते हैं[इस जानकारी की पुष्टि कर लिजीये.] शाम के समय यहाँ बहुत ही सुन्दर रोशनी की जाती है जिसे पर्यटक देखने आते हैं. १८६२ में शर से कुछ दूर बना बना शाही आवास जब १८९८ में बुरी तरह से नष्ट हो गया तब शहर के बीच में यह दो मंजिला महल महाराजा राधा किशोर मानिक ने १८९९-१९०१ में बनवाया था.इस के वास्तुकार श्री अलेक्सान्दर मार्टिन थे.इस पर उस समय १० लाख रुपयों से कुछ ऊपर की लागत आई थी.यह ८०० एकड़ क्षेत्रफल में फैला है.महल में खूबसूरत टाइल, लकड़ी का अधिकतर काम और दरवाजों पर खूबसूरत हस्तकला की गई है. इस महल को विशाल मुगल गार्डन की शैली में तैयार किया गया है. उज्जयंता महल की वास्तुकला में ग्रीक,मुग़ल, और रोमन वास्तुकला का प्रभाव दिखाई देता है.यह काफी आकर्षक है. इसके अतिरिक्त महल में तीन ऊंचे गुम्बद है. महल के मैदान में नारंगी रंग के दो मंदिर अर्थात् उम्मेनश्वर मंदिर और जगन्नाथ मंदिर स्थित है, जिनमें कोई भी व्यक्ति दर्शानार्थ जा सकता है. कुछ ही समय पहले संगीत पर नाचते फव्वारे यहाँ लगवाए गए हैं जो बहुत ही खूबसूरत हैं.. दर्शनीय स्थल - अगरतला -[त्रिपुरी लोग इसे अगुली भी कहते हैं]यहाँ प्रमुख आकर्षण केन्द्र उज्जयंता पैलेस, राज्य संग्रहालय - एचजीबी रोड पर स्थित राज्य म्यूजियम में एथनोग्राफिकल और आर्कियोलॉजी संबंधी वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं. यह सोमवार से शनिवार तक प्रात: 10 से सायं 5 बजे तक खुलता है, इसमें प्रवेश निशुल्क है. जनजातीय संग्रहालय-[पर्यटन कार्यालय के पीछे स्थित यह ट्राइबल म्यूजियम त्रिपुरा के 19 आदिवासी समूहों की स्मृति के रूप में बनाया गया है], इन के अलावा चर्च , सुकान्ता एकेडमी, एम.बी.बी. कॉलेज, लक्ष्मीनारायाण मंदिर, उमा महेश्वर मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, वेणुबन विहार नामक एक बौद्ध मंदिर , गेदू मियां मस्जिद [जो अनोखे तकीके से क्राकरी के टूटे हुए टुकड़ों से बनी है], मलांच निवास, रविन्द्र कनान, पुरबाशा, हस्तशिप केन्द्र, चतुर्दश देवता मंदिर -पुराना अगरतला पूर्व में 5 कि.मी. दूर है. यहां यह चौदह मूर्तियों वाला मंदिर है जहां जुलाई माह में श्रद्धालु कड़छी-पूजा के लिए एकत्र होते हैं. यहां आटोरिक्शा, बस और जीप द्वारा पहुंचा जा सकता है] . अगरतला के अतिरिक्त दर्शनीय स्थल- पीलक उदयपुर [राजस्थान राज्य के उदयपुर की तरह इस उदयपुर को भी त्रिपुरा में झीलों का शहर कहते हैं.] त्रिपुरेश्वरी मंदिर[त्रिपुरा सुंदरी मंदिर ] - त्रिपुरा सुंदरी माता को ५१ शक्तिपीठों में एक माना गया है.साधना ग्रन्थों में त्रिपुरा महाशक्ति को त्रिपुर सुन्दरी-त्रिपुर भैरवी नाम भी दिये गये हैं.त्रिपुरा के तीन मुख-तीन आयामी सृष्टि, त्रिगुण, त्रिकाल के प्रतीक हैं . चार हाथों में त्रिशूल से त्रिताप नाश का,फल से श्रेष्ठ परिणाम प्राप्ति का कमण्डलु से पात्रता का और आशीर्वाद मुद्रा से दिव्य अनुदान का बोध होता है.यह मंदिर तलवाडा ग्राम से 5 किलोमीटर दूर स्थित है , यहाँ सिंह पर सवार भगवती अष्टादश भुजा की मूर्ति स्थित हैं,मूर्ति की भुजाओं में १८ प्रकार के आयुध हैं.मंदिर में खण्डित मूर्तियों का संग्रहालय भी बना हुआ हैं जिनकी शिल्पकला बेजोड़ है. नीरमहल [राजस्थान के जलमहल के जैसा यह त्रिपुरा का जलमहल है.] भुवनेश्वरी मंदिर सेफाजाला कमल सागर देओतुमुरा दम्बूर झील जामपुई हिल उनकोती रेफरेन्सेस-http://tripura.nic.in/ कब जाएँ-सबसे अच्छा मौसम-अक्टूबर से मार्च तक है. कैसे पहुंचें?- वायु मार्ग - निकटतम हवाई अड्डा अगरतला है,कोलकाता,दिल्ली और गुवाहाटी से सीधी विमान सेवाएं हैं. सड़क मार्ग- कलकत्ता, धर्मनगर, गोवाहटी, सिलचर आदि से सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है. रेल मार्ग -सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन धर्मनगर और कुमार घाट हैं. वहां घूमने जाने से पहले राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और स्थिति पर एक बार नज़र डाल लें और सम्बंधित दफ्तर से परामर्श कर लें. |
![]() खस्ताहाली के इस दौर में जहां जिंदा हस्तियों को अपनी कमाई का ग्राफ ऊपर लाने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगाना पड़ रहा है, वहीं कुछ हस्तियां ऐसी भी हैं, जो कई दशक पहले इस दुनिया को छोड़ देने के बावजूद आज भी कमाई में सबसे आगे हैं। आर्थिक मंदी इन हस्तियों की कमाई पर बुरी नजर डालने में नाकाम रही है और ये हस्तियां निधन के बाद भी कमाई के मामले में अपना कद बढ़ाती ही जा रही हैं। एक नजर उन चुनिंदा मृत हस्तियों पर, जिनकी साल 2008 की कमाई कई जिंदा सितारों की कमाई पर भी भारी पड़ी है- एल्विस प्रेस्ली रॉक एन रॉल के शहंशाह एल्विस प्रेस्ली निधन के करीब 32 साल बाद भी कमाई के मामले में सबसे आगे हैं। उनकी साल 2008 की कुल कमाई रही- 5.2 करोड़ डॉलर यानी करीब ढाई अरब रुपए। गौरतलब है कि हिंदुस्तान के सबसे धनी व्यक्ति मुकेश अंबानी की सालाना तन�वाह केवल 44 करोड़ रुपए है। प्रेस्ली की आज की कमाई का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रमुख पॉप गायिका ने पिछले साल उनके मुकाबले करीब पच्चीस फीसदी पैसा कम कमाया है। गौरतलब है कि प्रेस्ली का निधन 1977 में 42 साल की उम्र में हृदयाघात से हुआ था। 2007 में उनकी 30वीं बरसी मनाई गई और इस अवसर पर उनके उत्पादों की खूब बिक्री हुई। उनके नाम पर गिटार और सैटेलाइट रेडियो भी लॉन्च हुआ और इनके जरिए हुई कमाई ने उन्हें निधन के बाद सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाला सितारा बना दिया।चार्ल्स एम शुल्ज ![]() कार्टूनिस्ट चार्ल्स एम शुल्ज अगर आज जिंदा होते तो अपने कार्टून चरित्र चार्ली ब्राउन की इतनी भारी भरकम कमाई को देखकर फूले नहीं समाते। उनकी पिछले साल की कुल कमाई रही 3.3 करोड़ डॉलर यानी करीब डेढ़ अरब रुपए। शुल्ज का नौ साल पहले कैंसर से निधन हो गया था। उस वक्त वे 77 साल के थे। एक ही साल में इतनी कमाई का राज यह है कि इस दौरान वाल्ट डिज्नी ने उनके कार्टून करेक्टर की ताजा सामग्री को अपनाने के लिए बड़ा करार किया। अमरीकी चुनाव के दौरान उनके कार्टून करेक्टर को बतौर प्रचार इस्तेमाल किया गया और साथ ही इस दौरान चार्ली की एक फिल्म को भी रिलीज किया गया। जाहिर है कि इस साल एक कार्टून करेक्टर ने इतना पैसा कमाया है, जो किसी जीवित हस्ती के लिए भी महज एक सपना ही हो सकता है। हीथ लेजर ![]() आस्ट्रेलियाई कलाकार हीथ लेजर का निधन 28 साल की उम्र में पिछले साल ही हुआ था। कहा जाता है कि वे नशे की गोलियों का शिकार हुए थे। उनके निधन के बाद उनकी कमाई रही 2 करोड़ डॉलर यानी करीब एक अरब रुपए। बैटमैन फिल्म द डार्क नाइट में वे जोकर की भूमिका में थे और इस फिल्म ने सफलता के नए कीर्तिमान बनाए थे। इस दौरान उनके जोकर किरदार वाले खिलौने भी बिके, जिसकी पूरी कमाई उनके नाम ही रही। फिल्म की बॉक्स ऑफिस कमाई में से भी उनका हिस्सा पूर्व निर्धारित था। एक अन्य फिल्म को भी वे पूरा नहीं कर सके, लेकिन इस अधूरे किरदार के लिए भी उन्हें काफी सारा पैसा दिया गया। इस तरह निधन के बाद उनकी कमाई का आंकड़ा 2 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। अल्बर्ट आइंस्टीन दुनिया के सबसे महान वैज्ञानिकों में शुमार अल्बर्ट आइंस्टीन पिछले साल की कमाई के मामले में दुनिया भर में चौथे स्थान पर रहे। उनकी कमाई रही 1.8 करोड़ डॉलर यानी करीब 90 करोड़ रुपए। यह कमाई उनकी खोजों के पेटेंट की वजह से नहीं, बल्कि उनके नाम से बिकने वाले उत्पादों की वजह से रही। निधन के करीब 53 साल बाद भी आइंस्टीन लोगों के बीच किस कदर लोकप्रिय है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डिज्नी ने उनके नाम पर बेबी आइंस्टीन सुइट जारी किया है, जो बच्चों की याददाश्त तेज करने का दावा करता है। इसके अलावा वे नेस्ले की जापानी कॉफी के ब्रांड अंबेसेडर भी बनाए गए हैं। इन सभी करारों के कारण उनकी कमाई इस शिखर तक पहुंच सकी है।थियोडोर गीजल (डॉ. स्यूस) कलम की कमाई की सबसे शानदार मिसाल थियोडोर गीजल (डॉ. स्यूस) को माना जा सकता है। यूं तो बाल कथाओं के लेखक थियोडोर का निधन 18 साल पहले 87 साल की उम्र में हो चुका है, लेकिन आज भी उनके वारिस उनके लेखन की बदौलत सालाना करोड़ों रुपए कमा रहे हैं। पिछले एक साल में उनकी कमाई रही 1.2 करोड़ डॉलर यानी करीब 60 करोड़ रुपए। इस कमाई का जरिया रहीं उनकी कुछ किताबें, जिन पर इस दौरान फिल्में बनाई गईं। इसके अलावा उनके कुछ नाटकों का मंचन भी किया गया और इससे भी उनके वारिसों को बड़ी राशि कमाई के रूप में मिली।जॉन लेनन दुनिया भर में धूम मचाने वाले बीटल्स बैंड से जुड़े प्रख्यात गीतकार और गायक जॉन लेनन अपने निधन के 28 साल बाद भी कमाई के मामले में काफी आगे हैं। उनकी साल 2008 की कमाई रही 90 लाख डॉलर यानी करीब 45 करोड़ रुपए। साल 2006 में तो उन्होंने ढाई करोड़ डॉलर कमाए थे। उस दौरान बीटल्स बैंड व संगीत वितरण कंपनी के साथ उनके कई कानूनी मामले सुलझे थे और उनके वारिसों को अदालत ने बड़ी राशि दिलवाई थी। इस साल उनकी कमाई ज्यादातर उनके सृजन के पेटेंट और लाइसेंस फीस के रूप में हुई है। लेनन की कमाई के सिलसिले में सबसे महत्वपूर्ण और सराहनीय बात यह है कि इस कमाई के ज्यादातर हिस्से को उनके वारिसों ने युद्ध विरोधी गतिविधि के लिए चैरिटी में दिया है।अगले हफ्ते आपसे फिर मुलाकात होगी.. हैपी ब्लॉगिंग |
![]() ![]() एक दिन एक अमीर परिवार के माता पिता ने , गरीब लोग कैसे रहते हैं इस उद्देश्य से अपने बेटे को पुरे देश में घुमाने का निश्चय किया. इस यात्रा के दोरान उन्होंने एक बेहद गरीब माने जाने वाले परिवार के साथ उनके खेत पर कुछ दिन बिताये. वापसी में पिता ने पुत्र से पुछा, यात्रा कैसी रही. " पिता जी यात्रा बहुत खूब रही " बेटे ने कहा पिता ने फिर पुछा " गरीब लोग कैसे अपनी जिन्दगी व्यतीत करते हैं " क्या तुमने देखा? "बेटे ने कहा " हाँ पिता जी" पिता ने फिर पुछा - अच्छा जो तुमने इस यात्रा के दोरान देखा उसका वर्णन करो. बेटे ने कहना शुरू किया " हमारे पास सिर्फ एक कुत्ता है और उनके पास चार हैं" " हमारे पास एक नहाने का पूल है जो सिर्फ हमारे बगीचे के मध्य तक सिमित है, और उनके पास एक तलाब है जिसका कोई अंत नहीं है" हमारे बगीचे में लालटेन हैं, जब की उनके पास इस अनंत आकाश मे चमकते हुए सितारे" हमारी दृष्टि सिर्फ हमारे सामने वाले यार्ड तक पहुंचती है जबकि उनकी दूर क्षितिज तक " "हमारे पास एक जमीन का छोटा सा टुकडा है रहने को और उनके पास दूर तक फैले हुए खेत" "हमारे पास नौकर है जो हमारे सेवा करते हैं, लकिन ये लोग दुसरो की सेवा करते हैं" " हम खाना खरीदते हैं जबकि ये अपने लिए खुद खाना उगाते हैं" " हमारे घर के चारो तरफ ये मजबूत दिवार है हमारी रक्षा के लिए, जबकि इनके पास इनके दोस्त हैं इनकी सुरक्षा के लिए" "पुत्र की बाते सुन कर पिता अवाक रह गया" अपनी बात खत्म करते हुए पुत्र ने कहा" पिता जी मैं आपका बहुत आभारी हूँ की आपने आज मुझे ये एहसास कराया की हम कितने गरीब हैं" कहानी का नैतिक मूल्य " हमे ये चिंता नहीं करनी चाहिए की हमारे पास क्या नहीं है, बल्कि ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए हर उस चीज़ के लिए जो हमारे पास है. |
![]() ![]() नैनीताल में पुस्तकालय की स्थापना की घटना भी अपने आप में एक रोचक प्रसंग है। स्व. श्री मोहन लाल साह जी को नैनीताल जैसी जगह में पुस्तकालय न होने का अफसोस था और उन्हें यह कमी बार-बार अखरती रहती थी। सन् 1933-34 के लगभग उन्होंने नैनीताल में पुस्तकालय बनवाने का प्रस्ताव नगरपालिका में रखा। उस समय नैनीताल नगरपालिका के अध्यक्ष मि. बूशर ने इस प्रस्ताव को यह कह कर स्वीकार नहीं किया कि - इस समय पालिका के पास इतना पैसा नहीं है कि पुस्तकालय का खर्च वहन किया जा सके। उन्होंने पालिका के सदस्यों को बताया कि - पुस्तकालय के निर्माण में लगभग 5,000 रुपयों का खर्च आयेगा जो पालिका वहन नहीं कर सकती है इसलिये इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया जा सकता। मोहन लाल साह जी ने अपनी ओर से 5,000 रुपये पुस्तकालय निर्माण के लिये देने की पेशकश की और कहा - उनकी सिर्फ इतनी सी शर्त है कि पुस्तकालय का नाम उनके पिताजी के नाम पर दुर्गा शाह म्युनिसिपल पब्लिक लाइब्रेरी रखा जाये। उनकी इस शर्त को मान लिया गया और नैनीताल में पुस्तकालय की स्थापना हो गई। यह पुस्तकालय बाद में उत्तर भारत के प्रमुख पुस्तकालयों में शुमार हुआ। इस पुस्तकालय में आज भी अनेक दुर्लभ पुस्तकों बहुत अच्छा संकलन है। कुछ वर्ष बाद नैनीताल नगरपालिका के उस समय के अध्यक्ष ने यह कह कर कि - नगरपालिका प्रतिवर्ष पुस्तकालय की पुस्तकों को खरीदने के लिये बहुत धनराशि खर्च करती है, मोहन लाल साह जी द्वारा दिये गये 5,000 रुपये उन्हें लौटा दिये और पुस्तकालय का नाम म्युनिसिपल पब्लिक लाइब्रेरी रख दिया परन्तु मोहन लाल साह जी ने इस चैक को कैश नहीं करवाया और नगरपालिका को ही वापस लौटा दिया। 30 अगस्त, 1946 को उत्तर प्रदेश शासन ने इस पुस्तकालय का नाम फिर से दुर्गा शाह म्युनिसिपल पब्लिक लाइब्रेरी ही रख दिया और आज भी इस पुस्तकालय को इसी नाम से जाना जाता है। |
![]() ![]() बहुत दिनो से राजस्थान का स्वाद भरा घी वाला खाना खा रहे है। आज हम दक्षिण भारत की हल्की फ़ुल्की स्वादिष्ट रेसिपी की ओर बढते है। अक्सर हम होटल मे जाते है तो इसी डिश का ऑर्डर करते है। आज हम इसे घर पर बनाने कि कोशिश करते है-देखे कैसे बनता है यह? रवा डोसा...... Rava Dosa सामग्री:- सूजी -1 कप मैदा -2 टी स्पून दही -1/2 कप हरी मिर्च कटी हुई 2 जीरा -1/2 टी स्पून नारीयल {कसा हुआ} 2 टेबल स्पून नमक स्वाद अनुसार तेल आवश्यकतानुसार बनाने की विधि:- सूजी, दही, मैदा और 1/2 कप पानी मिलाए. और घोल बनाकर ढक-कर 15-20 मीनट के लिए अलग रख दे. हरी मिर्च, जीरा, नारीयल नमक मिलाए. थोडा पानी और मिलाकर पतला घोल बनाए. नान स्टिक तवा गर्म करे और थोडा घोल डालकर पैन को हिलाए ताकि पूरे तवे पर पतली परत फ़ैल जाए थोडा तेल चारो तरफ़ डालकर सेके और मोड दे. सभी डोसे इसी प्रकार बनाकर नारीयल की चटनी के साथ गर्म सर्व करे. _ _ _ _ _ _ _ _ मै तो घर पर खाना बनाते समय कोई भी चीज को वेस्ट समझकर बाहर फैक कर अपना नुक्सान नही करती। सभी चीजो का सदउपयोग करती हू। "ना हिन्ग लगे ना फिटकरी रन्ग भी चोखा लगे" तात्पर्य हम कैसे सब्जीयो एवम फ्रुटो के छिलको को जीवन मे उपयोग करे। :- सन्तरे व निम्बू के छिलके छाया मे सुखाकर पीस ले। दुध या दही मे मिलाकर इसे फेस स्क्रब की तरह प्रयोग करे। :- करेले के छिलके सुखाकर उन्हे मैदे, दाल व बेसन के डिब्बो मे रखे । कीडे लगने का डर जाता रहेगा। :- निम्बु के छिलको को सुखा कर कपडे की अलमारी मे जहॉ-तहॉ फैलाकर रख दे। कीडे भाग जाएगे। :- लोकी और तुरई के छिलके पतले पतले काटकर मसाले मे बनाऍ, उपर भुना बैसन बुरक दे। सब्जी तैयार हो जाएगी। :- छोटी इलायची के छीलेके चाय के डिब्बे मे डाल दे। ऍसा करने से चाय सुगन्धित और स्वादिष्ट बनेगी। :- निम्बु के छिलके नाखूनो और दातो पर रखडने से वे चमक उठेगे। :- खॉसी, कफ की शिकायत हो धुप मे सुखा हुआ अनार के छिलके का छोटा सा टूकडा मुह मे रखकर चुसे। खॉसी कफ से राहत मिलेगा। चलते चलते सोचा था हर मोड पर आपका इन्तजार करेगे, पर... पर... पर... पर... पर..... क्या करे, कमबख्त..... सडक ही सीधी निकली। अब मुझे इजाजत दिजिए नये सप्ताह मे नई बात के साथ फिर मिलेगे, पता है ना कहॉ ? जी हॉ, ताऊ डॉट ईन पर, नमस्कार। प्रेमलता एम सेमलानी |
सहायक संपादक हीरामन मनोरंजक टिपणियां के साथ.
![]() अरे हीरू… बोल ..बोल…पीरू..तू क्यों कायं कायं मचाये जा रिया है? अरे हीरू..ये जरा देख नीरज अंकल..क्या के रिये हैं? क्या के रिये हैं भिया…जल्दी बता.. ले खुद ही पढ ले.
अबे पीरू…दूसरे कन्फ़्युजियायें इसके पहले ही निकल ले…आज तो आफ़िस भी जाना है..चल भाई हीरू.. |
ट्रेलर : - पढिये : सुश्री पूजा उपाध्याय से ताऊ की दिलचस्प बातचीत
ताऊ : आपको विषेष रुप से क्या पसंद है? पूजा : पापा का सर पे हाथ रखना, मम्मी की चिट्ठियां पढ़ना, जिमी (मेरा छोटा भाई) से बात करना... कुणाल से गप्पें मरना, दोस्तों को कविता सुना कर फ़ोन पर पकाना, ताऊ : कभी रात भर होस्टल से बाहर तडी भी लगाई कि नही? पूजा : ताऊ बस एक यही अरमान कभी पूरा नहीं हुआ, हॉस्टल कि बालकोनी से कूद कर नाईट आउट मरने का मन था...अफ़सोस कभी मौका ही नहीं आया. ताऊ : क्या कभी उस भूत या डायन ने वहां पकडा? पूजा : मैं.............. ताऊ के साथ एक बहुत ही दिलचस्प मुलाकात हमा्री सम्माननिय मेहमान सुश्री पूजा उपाध्याय से |
अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.
संपादक मंडल :-
मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया
वरिष्ठ संपादक : समीर लाल "समीर"
विशेष संपादक : अल्पना वर्मा
संपादक (तकनीकी) : आशीष खण्डेलवाल
संपादक (प्रबंधन) : Seema Gupta
संस्कृति संपादक : विनीता यशश्वी
सहायक संपादक : मिस. रामप्यारी, बीनू फ़िरंगी एवम हीरामन
स्तम्भकार :-
"नारीलोक" - प्रेमलता एम. सेमलानी











.jpg)

.jpg)

.jpg)






37 comments:
Monday, August 10, 2009 3:41:00 PM
बिलकुल सही बात ताऊ जी अब तो सेब को चमकाने के लिए उसके ऊपर मोम का लेप लगाकर रखते है बड़ी बड़ी फ्रेश मार्केट की कंपनिया .
अच्छा लगा आज का ये अंक
हमें मिलावट के विरोध में एकजुट होना चाहिए
Monday, August 10, 2009 4:05:00 PM
ताऊजी! आपने सही लिखा है यह कृत्रिम फसले/ एवम इन्जेक्शन से तैयार खाध प्रदार्थ हमे एवम हमारी भावी पीढी को जान लेवा बिमारीयो से ग्रसित कर दिया है।
इस और ध्यान दिलाने के लिए आभार।
बाकी बाते रात मे करेगे जी
हे प्रभु यह तेरापन्थ
Monday, August 10, 2009 4:32:00 PM
पत्रिका का यह अंक भी बहुत अच्छा है.सम्पादकीय जहाँ हर एक को जागरूक होने को आगाह कर रहा है.वहीँ समीर जी की बात भी अनुकरणीय है..आशीष जी रोचक खबर दी....एल्विस प्रेस्ले का मुकाबला कहाँ?कुछ दिनों बाद इस लिस्ट में माय्किल जैक्सन का नाम भी आएगा..विनीता जी और सीमा जी हीरामन सभीके स्तम्भ अच्छे लगे.
प्रेमलता जी आप की गोविन्द गट्टे अच्छे बने..आज की डिश तो आती है बनानी.. इस के बाद आप ने जो टिप्स दी हैं वे वाकई काम की लग रही हैं..आप की रसोई ki प्रस्तुति लाजवाब है.कभी जल्दी बनने वाले नाश्तों की विधि भी दिजीये.
Monday, August 10, 2009 4:32:00 PM
बहुत आकर्षक अंक
Monday, August 10, 2009 4:32:00 PM
ताऊ।
मुझे तो शुगर हो गयी हे।
इस पर कोई पोस्ट लगा देना।
Monday, August 10, 2009 5:05:00 PM
samir ji ki baat bilkul sahi lagi...mere office me ham kagaj ke dono or print lete hain. aur jahan tak ho paaye, jaroorat na ho to print nahin lete hain. even chhote efforts lene se bahut kuch ho sakta hai.
aashish ji ka stambh bahut rochak laga...kamaal hai...mar kar bhi logon ki kamai ruki nahin...aur na hi logon par unka asar. is angle par kabhi dhyan hi nahin gaya tha.
poori patrika hamesha ki tarah behad acchi hai...poori team to badhai.
Monday, August 10, 2009 5:26:00 PM
वाह भयी आज की पत्रिका में तो मजा आ गया...
मीत
Monday, August 10, 2009 5:56:00 PM
बहुत बढिया अंक रहा ये भी.
Monday, August 10, 2009 5:59:00 PM
ताऊ ये तो एक से बढकर एक जानकरी है आपकी इस पत्रीका मे . ब्लाग जगत मे इस तरह की कण्टिन्युटी कम ही देखी है. आपकी टीम वाकई काबिले तारीफ़ है. बहुत मेहनती हैं सभी. इतनी मेहनती लोगों का साथ हो तो सफ़लता तो सुनिश्चित ही है.
Monday, August 10, 2009 5:59:00 PM
ताऊ ये तो एक से बढकर एक जानकरी है आपकी इस पत्रीका मे . ब्लाग जगत मे इस तरह की कण्टिन्युटी कम ही देखी है. आपकी टीम वाकई काबिले तारीफ़ है. बहुत मेहनती हैं सभी. इतनी मेहनती लोगों का साथ हो तो सफ़लता तो सुनिश्चित ही है.
Monday, August 10, 2009 6:00:00 PM
खाद्य पदार्थों की मिलावट बहुत गंभी मसला है. आपको धन्यवाद इस तरफ़ ध्यान आकर्षित करने के लिये.
रामराम.
Monday, August 10, 2009 6:01:00 PM
अच्छा और सराहनिय अंक.
Monday, August 10, 2009 6:02:00 PM
bahut shandar patrika
Monday, August 10, 2009 6:03:00 PM
bahut shandar patrika
Monday, August 10, 2009 6:04:00 PM
मजेदार अंक.. बधाई..
Monday, August 10, 2009 6:05:00 PM
दूध और सब्जी, फलों में हारमोन्स बहुत हानिकारक है। इन इंजेक्शनों पर पाबंदी होनी चाहिए। समीर जी की बात से सहमत हैं। हम तो कागज को अंतिम दम तक इस्तेमाल करते हैं।
Monday, August 10, 2009 6:52:00 PM
ये पत्रिका तो दिन दूनी लाजवाब हो रही है............समीर जी की रोचक है प्रस्तुति .......... अल्पना जी और सीमा जी का भी जवाब नहीं........
Monday, August 10, 2009 6:58:00 PM
atyant upyogi ank !
badhaai !
Monday, August 10, 2009 7:39:00 PM
किस किस की तारीफ की जावे. बहुत भया यह अंक भी. आजकल पूजा का अत पता नहीं है. साक्षात्कार पर आपके रिपोर्ट का इंतज़ार रहेगा,.
Monday, August 10, 2009 7:49:00 PM
bahut hi rochak jankari,gyan aur manoranjan bhi.
Monday, August 10, 2009 8:21:00 PM
बहुत सुंदर पत्रिका.
Monday, August 10, 2009 8:21:00 PM
बहुत सुंदर पत्रिका.
Monday, August 10, 2009 8:24:00 PM
मिलावटी दूध दही..फ़ल सब्जियां अब तो इतने परेशान करते हैं कि सोचते है कि अब क्या खायें? और क्या नही? बहुत चिंता जनक विषय है.
Monday, August 10, 2009 8:24:00 PM
मिलावटी दूध दही..फ़ल सब्जियां अब तो इतने परेशान करते हैं कि सोचते है कि अब क्या खायें? और क्या नही? बहुत चिंता जनक विषय है.
Monday, August 10, 2009 8:25:00 PM
सुंदरतम प्रयास.
Monday, August 10, 2009 8:40:00 PM
टीम की मेहनत रंग ला रही है.
पत्रिका दिन प्रति दिन रोचकता के नये आयाम छू रही है.
सभी को बधाई!!
Monday, August 10, 2009 8:43:00 PM
अब तो प्रेमलता जी भी शेरो शायरी करने लगीं हैं. :)
पूजा के इन्टरव्यू का इन्तजार!!
Monday, August 10, 2009 9:36:00 PM
पत्रिका का आज का अंक भी रोचक लगा विशेषकर समीर जा का कागज के बारे में याद दिलाना सामयिक है.
Monday, August 10, 2009 9:43:00 PM
अहा..एक और जबरदस्त अंक पत्रिका...समीर जी हर बार की तरह अपनी बातों और कविता से मन मोहा...अशीष जी की दिलचस्प जानकारियों ने अचंभित किया....और सीमा जी ये इतनी प्रेअरक कहानियां हर बार कहाँ से ले आती हैं?
पूजा के साक्षात्कार का इंतजार है...
Monday, August 10, 2009 11:42:00 PM
अल्पना जी नें क्या सूक्ष्म जानकारीयां दी हैं. प्रभावित!!
वैसे सचिन देव बर्मन त्रिपुरा के ही राजघराने से संबंधित थे.
Tuesday, August 11, 2009 4:51:00 AM
मिलावटी खाने के तो हम ऐसे आदि हो चुके हैं की शुद्ध खाना खाना खाते ही पेट ख़राब हो जाता है..
त्रिपुरा में एक और उदयपुर भी है ..!!
प्रेमलताजी की किचेन टिप्स उपयोगी हैं..सीमा गुप्ता जी की यह प्रेरक कथा इटरनेट पर ही कई बार पढ़ चुकी ..पर यह हमेशा प्रासंगिक ही लगती है..आशीषजी ,दूसरो की कमाई से जलना अच्छी बात नहीं है..!!
Tuesday, August 11, 2009 6:41:00 AM
ताऊ आपकी चिंता जायज़ है मगर हमारी अपनी गैरत और कानून के हाथों की लम्बाई कहाँ गई?
उड़नतश्तरी, मेरी कलम से और हमारा अनोखा भारत भी पसंद आया.
Tuesday, August 11, 2009 10:13:00 AM
पत्रिका का एक ओर बेहतरीन अंक्!!!
सभी सम्पादकों की मेहनत प्रशंसनीय है!!
Tuesday, August 11, 2009 11:43:00 AM
ताऊ जी मैं इस बार की पहेली में भाग नहीं ले पाऊंगा...
मुझे पता है अब रामप्यारी पूछेगी की क्यों...?
भयी इसलिए की मैं शिरडी जा रहा हूँ... और शनिवार को मैं वहां होऊंगा....
साईं राम.....
मीत
Tuesday, August 11, 2009 12:10:00 PM
एक और बढिया अंक. धन्यवाद...
Tuesday, August 11, 2009 2:12:00 PM
बेहत्रीन पोस्ट है धन्यवाद्
Wednesday, August 12, 2009 12:11:00 PM
दूध और सब्जियों में जहर की मिलावट , भयावह है !क्या होगा हमारे बच्चों का ?? सामयिक और ऑंखें खोलने वाला लेख , शुभकामनाएं ताऊ !
सीमा जी की कहानी आज के जीवन मूल्यों को देखते हुए बहुत सार्थक लगी , उनका यह नया अंदाज़ और भी अच्छा लगा ! उनकी
प्रतिभा और कल्पना शक्ति को प्रणाम !!
Post a Comment