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"परछाई "


"परछाई "





नेताजी को अपने आस पास
एक अजीब सी दुर्गन्ध आई...
कुर्सी, पलंग आलमारी
सब कुछ जा टटोला
कमरे मे सब तरफ़ नजरें दौडाई
हार थक जब कुछ भी समझ ना आया
सामने आईने पर ही नजरे जा टिकाई
अपनी मरी हुई इंसानियत को देखा
और नज़र आ गयी
खुद की सडी गली परछाई



(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)

34 comments:

  1. त्ताऊ जब नेता सडा होगा तो परछाई भी सडी ही दिखेगी बडिया है ।

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  2. सड़े नेता की परछाई .............. पर उसपर भी नेता लोगों को डर नहीं लगेगा

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  3. वाह ताउजी बहुत सुन्दर रचना !! पर नेता लोग कभी ऐसे शीशे नहीं देखते जिसमे उनकी असली परछाई दिखे !!

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  4. बहुत सही और सामयिक लिखा है..

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  5. सुंदर कटाक्ष। नेता बनना कभी कि‍तने सौभाग्‍य की बात मानी जाती थी मगर अब इस शब्‍द का कि‍तना अर्थ पतन हुआ है:(

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  6. वाह क्या बात कही है।
    सामने आईने पर ही नजरे जा टिकाई
    अपनी मरी हुई इंसानियत को देखा
    और नज़र आ गयी
    खुद की सडी गली परछाई

    बहुत उम्दा।

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  7. सटीक बात! सीधे सीधे...

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  8. वाह्! जी वाह्! क्या खूब लिखा है!!!! एकदम सही!!

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  9. बहुत सुन्दर रचना !!

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  10. बेल दिया नेता जी को !

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  11. पुरानी कविता ठेल रहे हैं? इन्सानियत मरे जमाना हो गया!

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  12. सींचते रहे तो इंसानियत फिर से अंकुरित होगी. अछि रचना. आभार.

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  13. बहुत सटीक रचना

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  14. सही कहा आपने. बहुत पहले ही सड चुके ये लोग तो

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  15. सही कहा आपने. बहुत पहले ही सड चुके ये लोग तो

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  16. सामने आईने पर ही नजरे जा टिकाई
    अपनी मरी हुई इंसानियत को देखा
    और नज़र आ गयी
    खुद की सडी गली परछाई

    sundar vyang

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  17. सामने आईने पर ही नजरे जा टिकाई
    अपनी मरी हुई इंसानियत को देखा
    और नज़र आ गयी
    खुद की सडी गली परछाई

    sundar vyang

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  18. सुन्दर दुर्गन्धमई कविता ..!!

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  19. वाह ताऊ जी बहुत बढ़िया लिखा है आपने! बहुत खूब!

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  20. हा हा.. अब बचो अपनी परछाई से..

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  21. सीमाजी लाजवाब कटाक्ष आभार्

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  22. सच बता दिया नेता जी को....
    पता नहीं कब सुधरेंगे ये कमजर्फ...
    मीत

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  23. नेताजी पर किया गया व्य्ग्यबाण अच्छा लगा ।

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