"बिणजारी ए हंस हंस बोल.."

"बिणजारी ए हंस हंस बोल.."




धरती पर आग बरसाता
जेठ का सूरज
धधकती जमीन, प्यासे कंठ

बंजारे का काफ़िला
हरियाली की खोज मे
बहुत दूर निकल आया
मंजिल के नजदीक आते ही
सामने हरी भरी कोंपलें
रंगबिरंगे फ़ूलों का दृश्य
काफ़िले के पशुओं के मन भाया
बंजारा भी लगा ऊंघने ओढ
घने बरगद की कोमल छाया

अचानक मौसम ने अंगडाई ली
वर्षा रानी के आने की आहट सुन
धधकता सूरज भी शरमाया
पलों मे आसमान का रंग बदला
काली घटाओं से वो घिर आया
झर झर बूंदों ने मोती
का झरना खूब बरसाया
प्यासी धरती तृप्त हो गई
फ़ूल पत्तियों का मन भरआया
हवाओं की सौंधी महक से
डाली डाली का तन लहराया
अवर्षा से चिंतित और उदास
बंजारे का मन भी ऐसे में हर्षाया
थाम लिया हाथों मे जंतर (दिलरुबा)
कांधे पे जा उसे टिकाया
और अपने मीठे कंठ से छेड तान
कुछ ऐसे गुनगुनाया .........

बिणजारी ए हंस हंस बोल..
टांडो लद ज्यासी....


(आभार सुश्री सीमा गुप्ता)






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44 comments:

  विवेक सिंह

Tuesday, July 14, 2009 4:00:00 PM

ताऊ जी बुरा मत मानना , मुझे आपके कवि होने का भ्रम हो रहा है :)

  Nirmla Kapila

Tuesday, July 14, 2009 4:00:00 PM

वाह सीमाजी आपके लिखने भर की देर थी कि हमरे शह्र मे भी बादल छा गये हैं आभार्

  अनिल कान्त :

Tuesday, July 14, 2009 4:03:00 PM

मुझे बहुत पसंद आई

  ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey

Tuesday, July 14, 2009 4:09:00 PM

म्हारे तरफ तो बिणजारी बोल ही न रही!

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

Tuesday, July 14, 2009 4:12:00 PM

"बिणजारी ए हंस हंस बोल..
टांडो लद ज्यासी...."
कृपया व्याख्या की जाए.

  ताऊ रामपुरिया

Tuesday, July 14, 2009 4:38:00 PM

@Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

अनुज अनुरागजी, यह सूफ़ी बंजारा है, अपने इंद्रिय रुपी पशुओं को इसने तपा डाला..कुछ नही मिला और चलते चलते आखिर उस परमात्मा की कृपा हो ही गई..और मस्ती मे पुकार उठा अपनी प्रेयसी को. यहां प्रेयसी बंजारण परमात्मा को कहा गया है. सूफ़ी फ़कीर ईश्वर को स्त्रीरुप मे पुकारते आये हैं.

बिणजारी ए हंस हंस बोल ..टांडो लद ज्यासी...मतलब अब ज्यादा समय नही बचा है. बस हंस गा कर पुकार ले उस ईश्वर को...यह फ़कीरों का बहुत प्रिय गीत है..कभी मौका लगे तो उनके मुख से यह पूरा गीत सुनना बहुत आनंद दायक लगेगा.

मेरे भाव इस कविता के लिये ऐसे ही हैं बाकी तो यह शब्द हैं इनके अनेकानेक अर्थ निकलेंगे..जैसा भी निकालना चाहें.

रामराम.

  डॉ. मनोज मिश्र

Tuesday, July 14, 2009 4:45:00 PM

"बिणजारी ए हंस हंस बोल..
टांडो लद ज्यासी...."..
इसका भावार्थ बता कर आपने आनंद ला दिया.

  sonu

Tuesday, July 14, 2009 4:47:00 PM

bahut sundar kavita

  sonu

Tuesday, July 14, 2009 4:47:00 PM

bahut sundar kavita

  Bhairav

Tuesday, July 14, 2009 4:48:00 PM

स्वागत वर्षारानी का. बहुत बढिया .

  लालों के लाल....इंदौरीलाल

Tuesday, July 14, 2009 4:49:00 PM

बहुत मीठी कविता. बस बारिश मे भीग गया तन मन.

  लालों के लाल....इंदौरीलाल

Tuesday, July 14, 2009 4:49:00 PM

बहुत मीठी कविता. बस बारिश मे भीग गया तन मन.

  makrand

Tuesday, July 14, 2009 4:51:00 PM

बहुत खूबसूरत भाव. सुंदर लगी यह रचना

  भानाराम जाट

Tuesday, July 14, 2009 4:52:00 PM

ताऊजी आपकी व्याख्या पसंद आयी. बहुत सुंदर दृष्टिकोण आपका.

  भानाराम जाट

Tuesday, July 14, 2009 4:52:00 PM

ताऊजी आपकी व्याख्या पसंद आयी. बहुत सुंदर दृष्टिकोण आपका.

  kartik

Tuesday, July 14, 2009 4:53:00 PM

अति सुंदर कविता.

  दीपक "तिवारी साहब"

Tuesday, July 14, 2009 4:56:00 PM

वाह ताऊ वाह.. भाव विभोर करती हुई रचना. आनंद आया..और आपकी व्याख्या से हमे अब समझ आई है, बहुत ऊंची बात है जो हमारे दिमाग मे अब घुसी है. वर्ना हम तो सीधी साधी वर्षा की कविता समझ रहे थे.

  दीपक "तिवारी साहब"

Tuesday, July 14, 2009 4:56:00 PM

वाह ताऊ वाह.. भाव विभोर करती हुई रचना. आनंद आया..और आपकी व्याख्या से हमे अब समझ आई है, बहुत ऊंची बात है जो हमारे दिमाग मे अब घुसी है. वर्ना हम तो सीधी साधी वर्षा की कविता समझ रहे थे.

  दीपक "तिवारी साहब"

Tuesday, July 14, 2009 4:56:00 PM

वाह ताऊ वाह.. भाव विभोर करती हुई रचना. आनंद आया..और आपकी व्याख्या से हमे अब समझ आई है, बहुत ऊंची बात है जो हमारे दिमाग मे अब घुसी है. वर्ना हम तो सीधी साधी वर्षा की कविता समझ रहे थे.

  अल्पना वर्मा

Tuesday, July 14, 2009 4:58:00 PM

वाह !
ताऊ जी आज तो आप की कविता नए रंग में है..'भाषा के कारण जहाँ कविता समझ नहीं आई थी वहां आप की प्रति टिप्पणी पढ़ कर समझ आ गयी.

बहुत चोखी लिखी है...

[अवर्षा-?-यह शब्द नया सुना..]

  अविनाश वाचस्पति

Tuesday, July 14, 2009 5:02:00 PM

बस बारिश आने वाली है

राजधानी दिल्‍ली में
जरा मेट्रो ने जो बिखरा दिया है

सिमट जाए ढंग से

वरना सब कीचड़ हो जाएगा।

  HEY PRABHU YEH TERA PATH

Tuesday, July 14, 2009 5:10:00 PM

सुंदर कविता.
लेखिका को बधाई

आभार/मगलभावो के साथ
मुम्बई टाइगर
हे प्रभु तेरापन्थ खान

  सुशील कुमार छौक्कर

Tuesday, July 14, 2009 5:16:00 PM

बहुत उम्दा जी। आनंद आ गया।

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

Tuesday, July 14, 2009 5:26:00 PM

देश, काल, परिस्थिता के अनुरूप
सुन्दर रचना।
आभार!

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

Tuesday, July 14, 2009 5:26:00 PM

देश, काल, परिस्थिता के अनुरूप
सुन्दर रचना।
आभार!

  सतीश पंचम

Tuesday, July 14, 2009 5:33:00 PM

टांडो लद ज्यासी.... मुझे समझ नहीं आया तो आपको पूछने ही वाला था कि आपने यहां स्मार्ट इंडियन के द्वारा पूछे इसी प्रश्न का उत्तर दे दिया।
बहुत सुंदर।

  रंजन

Tuesday, July 14, 2009 5:54:00 PM

मजेदार..

"बिणजारी लटका खायेगी रे.........."

  Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"

Tuesday, July 14, 2009 6:09:00 PM

बिणजारी ए हंस हंस बोल..
टांडो लद ज्यासी....

वाह्! भावार्थ जानकर कविता का आनन्द दूना हो गया।

  Udan Tashtari

Tuesday, July 14, 2009 6:14:00 PM

बिणजारी ए हंस हंस बोल..
टांडो लद ज्यासी....

-मधुर!! आनन्द आ गया इस मिठास का.

  हिमांशु । Himanshu

Tuesday, July 14, 2009 6:43:00 PM

कविता मुग्ध कर रही है । कविता के विवरणात्मक चित्र खूबसूरत हैं । आभार ।

  Ratan Singh Shekhawat

Tuesday, July 14, 2009 7:02:00 PM

"बिणजारी ए हंस हंस बोल..
टांडो लद ज्यासी...."..

ताऊ जी यह गीत सुने तो बहुत दिन हो गए यदि रिकॉर्डिंग हो तो कृपया ब्लॉग पर लगाएँ अति कृपा होगी |

  जितेन्द़ भगत

Tuesday, July 14, 2009 7:36:00 PM

मि‍ट्टी की सोंधी महक थी इस कवि‍ता में।

  राज भाटिय़ा

Tuesday, July 14, 2009 8:17:00 PM

ताऊ आप की यह कविता बहुत सुंदर लगी, यह हरियाण्वई से मिलती जुलती है, क्योकि रोहतक साईड मै भाषा इस से थोडी अलग है.

  विनीता यशस्वी

Tuesday, July 14, 2009 10:33:00 PM

Kya mausam ke hisab se kavita lagayi apne...maza aa gay...

  mehek

Wednesday, July 15, 2009 2:24:00 AM

काली घटाओं से वो घिर आया
झर झर बूंदों ने मोती
का झरना खूब बरसाया
प्यासी धरती तृप्त हो गई
फ़ूल पत्तियों का मन भरआया
हवाओं की सौंधी महक से
डाली डाली का तन लहराया
अवर्षा से चिंतित और उदास
बंजारे का मन भी ऐसे में हर्षाया
bahut hi khubsurtise manbhav barse hai,aisa laga banjare ke saath apna bhi man harshit ho gaya,sunder rachana

  vani geet

Wednesday, July 15, 2009 7:06:00 AM

क्या बात है ताऊ !!!

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

Wednesday, July 15, 2009 7:26:00 AM

बिणजारी ए हंस हंस बोल ..टांडो लद ज्यासी...मतलब अब ज्यादा समय नही बचा है. बस हंस गा कर पुकार ले उस ईश्वर को...

कविता फिर से पढी. अर्थ जानने के बाद कविता का आनंद सौगुना बढ़ गया.
धन्यवाद!

  Babli

Wednesday, July 15, 2009 10:08:00 AM

ताऊ जी आपकी ये ख़ूबसूरत कविता मुझे बहुत पसंद आया!

  Murari Pareek

Wednesday, July 15, 2009 10:47:00 AM

वाह बहुत खूब प्यासे मन पे फुहार "बणजारी ए हंस हंस बोल बातां रह ज्यासी

  ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

Wednesday, July 15, 2009 12:53:00 PM

सुंदर चित्रण।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

  दिगम्बर नासवा

Wednesday, July 15, 2009 3:14:00 PM

"बिणजारी ए हंस हंस बोल..
टांडो लद ज्यासी...."..

Vaah Taau..........pyase ko kya chahiye.......PAANI aur mujh jaise rasik ko prem, moh, pyaar neh...... sabkuch mil gayaa in do laaino mein

  नरेश सिह राठौङ

Wednesday, July 15, 2009 6:53:00 PM

ताऊ, यह बहुत पुराना राजस्थानी लोक गीत है । जिसका सम्बन्ध सीधा आत्मा से है । आज तो दूर की बात ले आये ।

  seema gupta

Thursday, July 16, 2009 9:38:00 AM

क्या खूब कहा आपने ताऊ जी और देखो यहाँ भी बरखा रानी आ ही गयी....

regards

  Ratan Singh Shekhawat

Friday, July 17, 2009 8:11:00 AM

ताऊ रामपुरिया जी
बिणजारी ए हंस हंस बोल..
टांडो लद ज्यासी....
गीत काफी पहले गांव में सुना करते थे लेकिन कभी इसकी गहराई में नहीं गए | आपके इस गीत के दो बोल व उनकी व्याख्या यहाँ लिखने के बाद ही इस गीत का असली भाव समझ आया है | अब इस गीत को सुनने में बहुत आनंद आता है आपकी व्याख्या नहीं पढ़ते तो शायद इस आनंद से हमेशा वंचित रहते |

नरेश सिंह जी का धन्यवाद जो उन्होंने इसका विडियो खोज निकाला |

ताऊ उवाच :-:


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