बुढापा

बुढापा

budhapa प्रकृति का नियम सुना
हर चीज है आनी जानी
मेरे साथ मगर प्रकृति ने
अपना नियम नही निभाया
मैने किया स्वागत जबbudhapa2
बुढापे ने द्वार मेरा खटखटाया
मैं नादान समझे बैठा था
नियम के तहत ही तो है आया
कुछ दिन करेगा बसेरा अपना
और छोड चला जायेगा
पर हाय रे प्रकृति का दगा
बुढापा अपना घर समझ
साथ मेरे था रहने आया




(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)

Comments

  1. ताऊ क्या क्या चल रहा है मन में भाई ! ये मुआमला क्या है !

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  2. बचपन आया गयी जवानी,
    और बुढ़ापा आया।
    कितना है नादान मनुज,
    यह खेल समझ नही पाया।

    यही बुढ़ापा अनुभव के,
    मोती लेकर आया है।
    नाती पोतों की किलकारी,
    यही बुढ़ापा लाया है।

    अच्छी रचना।
    सुश्री सीमा जी
    और
    ताऊ जी बधायी स्वीकार करें।

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  3. यही तो जीवन का सत्‍य है। बुढापा तो मौत के दरवाजे से साथ लेकर ही जाता है।

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  4. प्रकृति का नियम सुना

    हर चीज है आनी जानी

    " और एक दिन बुडापा भी आना ही है.....ताऊ जी जीवन के सत्य से रूबरू कराते बेहद भावनात्मक शब्द "

    regards

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  5. यह तो अमिट सत्य है ही .बधाई ताऊ जी आप को इस सत्य का एहसास करानें के लिए .

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  6. यही सत्य है.यही एक अवस्था है जो आकर कभी जाती नहीं.

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  7. आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . लिखते रहिये
    चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है

    गार्गी
    www.abhivyakti.tk

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  8. ताऊ! बुढापा ही तो एक अकेला सच्चा मित्र है जो कि अन्त तक साथ निभाता है....बचपन और जवानी तो "लुंगाडे यार" की माफिक हैं,जो खाए पिए और खिसके.

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  9. खूबसूरत चित्रों के साथ ज़िन्दगी की सच्चाई बयां करती रचना...
    नीरज

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  10. शब्दों से सुंदर चित्रण किया है...
    मीत

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  11. बहुत सुन्दर रचना..ये ही सच्चाइ है..बधाई सीमा जी को..

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  12. कुछ दिन पहले आश्रम जाकर आया तब समझ आया बुढापा क्या है?

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  13. बुढापा अपना घर समझ
    साथ मेरे था रहने आया

    हां ताऊ ये तो अब अगया समझो. क्या करें? आज तो यही सच्चाई है कब तक मुंह मडेंगे?

    रामराम.

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  14. बहुत सटीक कविता ताऊ जी.

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  15. सच्चाई बयान करती रचना.

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  16. सही है ताऊ. बुढापा आकर नही जाता. शायद आप प्रकृति का नियम समझने मे धोखा खा गये.:)

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  17. ये तो अभी तक सोचा ही नही था?

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  18. यही तो एक चीज है जो एक बार आ जाए तो फिर आती ही जाती है. उम्र भर का साथ निभा जाती है फिर !

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  19. यह कविता ताऊ के बारे मे तो नही हो सकती है क्यों कि ताऊ तो कभी बुढा हो ही नही सकता है ।

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  20. पुनरपि जननं, पुनरपि मरणम।
    यह पोस्ट पढ़ कर आदिशंकर का भजगोविन्दम याद आ गया!

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  21. नमस्कार, ताउ जी,
    क्या लिखते है जी आप, आपके द्वारा लिखे लेख को पढ़कर मन खुश हो जाता हैं। धन्यवाद इसी तरह हम सभी को अच्छे अच्छे लेख दिया किजीऐंगा।
    आपने मेरे ब्लाग पर अपना कीमती समय देकर अपना विचार व्यक्त किया इसके लिए धन्यवाद्। मुझे ब्लाग लिखने नही आता मै तो बस आप बिती बस लिखा। बस आप लोगों के आर्शिवाद से आगे कोशिश करूंगा अच्छा लिखने की।  
    धन्यवाद्।
     

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  22. मैं नादान समझे बैठा था

    नियम के तहत ही तो है आया

    कुछ दिन करेगा बसेरा अपना

    और छोड चला जायेगा........
    kahin doorrrr,,,,bahut doorrrrr....tau ham samajh bhi nahi payege...

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  23. अच्छा लिखा है. यह भी कहा जा सकता था कि कुछ दिन रहकर ले जाने आया है.

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  24. बुढापा अपना घर समझ
    साथ मेरे था रहने आया
    बहुत खूब.. जीवन की इस अवस्था का मार्मिक किंतु सत्य चित्रण.. आभार

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  25. यह तो जीवन का एक कटु सत्य है। और क्या कहूँ......

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  26. ताऊ.............कोई बात नहीं.............बुढापा तो आत ही है ............जाता नहीं पर जब जाता है सब कुछ ले जाता है ...............

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  27. एक अटल सत्य को उकेरा है आपने..बेहतरीन!!

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  28. जीवन का चक्र है....कौन इससे बचेगा ?

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  29. जो जाकर कभी ना आये वो जवानी है,
    और जो आकर कभी ना जाये वो बुढापा है।

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  30. कविता के क्लाइमेक्स ने डरा दिया है ताऊ

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  31. ताऊ जी ऐसी सच्चायी चुनी कि दहसत छा गयी मन मे........बडी आसानी से समझ मे पैन्ठ गयी . फ़िर भी डरने की कोयी बात नही..........आप और हम तो जवान ही ठहरे.............
    अभी तो तुम जवान हो , अभी भी मै जवान हून
    चलेगा काम कुछ दिनो गो कि उम्र का मुकाम हून ....

    भूलिये भी और भतीजे भतीजियोन को अपने ठेठ हरियानवी अन्दाज़ मे जवानी का ’शिलाजीत’ चखाते रहिये . कोयी गम्भीर बात तो नहीन ना कह दी...हा हा हा !!
    वैसे सीमाजी ने बडी ही गहरी बात कही है ! पर समझने का मन नहीन करता , गोया सच्चायी तो यही है लम्बी ज़िन्दगानी की .सभी को तो शहीदोन की मौत नहीन ना नशीब होती .

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