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अमन चैन

अमन चैन

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चारों तरफ़ भय, है छाया हुआamanjpg
खो गया सब अमन चैन

सन्नाटा भी थर्राया हुआ
मर गई इन्सानियत
टुटता नहीं ये भ्रम-जाल
ईमान अब बोराया हुआ
झील पे बगुले, व्योम में बाज
सब हैं सहमें दुबके
सूरज भी जैसे पथराया हुआ





(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)

32 comments:

  1. सन्नाटा संकेत है होगा अब बदलाव।
    कदम कलम जब साथ हों न होगा भटकाव।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  2. ‘‘मानवता मर गयी विश्व में, सूरज भी पथराया है।
    डोल गये ईमान, धर्म अब, सारा जग बौराया है।।’’
    सीमा जी का धन्यवाद,
    ताऊ जी का आभार।
    घणी राम-राम।

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  3. बधाई सुश्री सीमा गुप्ताजी को सुंदर रचना के लिए .

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  4. झील पे बगुले, व्योम में बाज

    सब हैं सहमें दुबके

    जाएँ तो जाएँ कहाँ ? सच है !

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  5. वाह वाह बहुत सटीक और सामयिक रचना,

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  6. झील पे बगुले, व्योम में बाज
    सब हैं सहमें दुबके

    bahut umda rachana

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  7. ताउ बहुत बढिया रचना लिखी है आज तो. बिल्कुल हालात ऐसे ही हैं.

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  8. बहुत सुंदर कविता. बधाई

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  9. चारों तरफ़ भय, है छाया हुआ
    खो गया सब अमन चैन

    " ताऊ जी बहुत सत्य और सामयिक भाव प्रस्तुत किये हैं आपने...हर तरफ ऐसा ही माहोल है .."

    regards

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  10. झील पे बगुले, व्योम में बाज

    सब हैं सहमें दुबके
    सूरज भी जैसे पथराया हुआ
    kuch satya hai ye,bahut khub.

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  11. ये माना निहायत बुरी है यह दुनिया
    हमारी नहीं आपकी है यह दुनिया !

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  12. सत्य को दर्शाती इस रचना के लिए सुश्री सीमा जी और आपका धन्यवाद.......

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  13. सच और सच,सिर्फ़ सच्।

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  14. लगता नहीं है ये वही ताऊ है..

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  15. भय पसरा है - जागृति का जाम्बवन्त चाहिये जो बताये कि भय की जड़ें नहीं होतीं।

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  16. नया जीवन गहन अंधकार में ही फूटता है....

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  17. "वो सुबह जरूर आयेगी सुबह का इंतज़ार कर" बड़ी सुन्दर रचना. आभार.

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  18. ताऊ जी राम राम.... सच्चाईभरी रचना है

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  19. गहरी बात ताऊ.............बहुत खूब

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  20. सब हैं सहमें दुबके
    सूरज भी जैसे पथराया हुआ
    नर-नारी सब व्याकुल हुए है
    कौन सा ये संकट आया हुआ है
    जो बोया था बीज कभी
    आज वो पेड़ बन लहराया हुआ है

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  21. आशा और आस्था तो यही है कि सुबह होने के पहले रात का अंधेरा बहुत बढ जाता है।

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  22. चंद शब्दों से आज की स्थिति को गहराई से बयान किया है आपने.. आभार

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  23. प्रकृति‍ के माध्‍यम से भयाक्रांत समाज का सही चि‍त्रण।

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  24. सब हैं सहमें दुबके
    सूरज भी जैसे पथराया हुआ
    गंभीर रचना.सामयिक चिंतन लिए हुए सफल और सार्थक.
    सच ही है..जाएँ तो जाएँ कहाँ?यही दुनिया है..

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  25. चारों तरफ़ भय, है छाया हुआ
    खो गया सब अमन चैन सन्नाटा भी थर्राया हुआ मर गई इन्सानियत टुटता नहीं ये भ्रम-जाल ईमान अब बोराया हुआ झील पे बगुले, व्योम में बाज सब हैं सहमें दुबके
    सूरज भी जैसे पथराया हुआ

    बहुत ही सटीक लिखा है आपने सीमा जी आभार ताऊ का धन्‍यवाद आप सभी का

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  26. झील पे बगुले, व्योम में बाज
    सब हैं सहमें दुबके
    बहुत सुन्दर! एक पुराना फिल्मी गीत याद आ गया -
    अंधियारा गहराया, सूनापन घिर आया,
    घबराया मन मेरा, चरणों में आया !

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  27. चुभती रचना...अलग कुछ अलग-अलग प्रतिकों का बढ़िया इस्तेमाल

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  28. सीमा जी को बधाई...वक्त को चिन्हित करती कविता..ताऊ जी को भी इस प्रस्तुति हेतु अनेक बधाई...

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