क्या यही नारी है

क्या यही नारी है?


nari-2_thumb[5]

 

हर रूप मे जीती है नारी
कभी पिता , कभी पति,
भाई और संतान के लिए
रूप धर माँ बेटी

बहन और पत्नी का

नही जान पाती

कभी अपनी निजता

गुम हो जाती है रिश्तो में
और खो जाते है स्वपन उसके
भूल जाती है पहचान अपनी 
रिश्तों की इस अंधी दौड में

रात के सूनेपन में

पुकारती है उसकी निजता
उसे कोमलता से

और वो अश्रु पुर्वक

विदा कर देती है

अपनी पहचान को
अगली रात तक

क्या यही नारी है
जिसने
मुझे जन्म दिया है?

 

 

(आभार सुश्री सीमा गुप्ता जी)

35 comments:

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

Tuesday, March 31, 2009 6:19:00 AM

रचना करती, पाठ-पढ़ाती,

आदि-शक्ति ही नारी है।

फिर भी अबला बनी हुई हो,

क्या ऐसी लाचारी है।।

प्रश्न-चिह्न हैं बहुत,

इन्हें अब शीघ्र हटाना होगा।

खोये हुए निज अस्तित्वों को,

भूतल पर लाना होगा।।

  मा पलायनम !

Tuesday, March 31, 2009 7:17:00 AM

इसी लिए तो उसे जगत जननी कहा गया .वह केवल सृजन है ,केवल सृजन . ...

  Arvind Mishra

Tuesday, March 31, 2009 7:27:00 AM

अच्छी कविता -नारी की खुद अपनी पहचान -अपना होने का अहसास ही इस आपाधापी में खो सा जाता है ! नारी मन की समझ की कविता -बहुआयामी होते ताऊ !

  योगेन्द्र मौदगिल

Tuesday, March 31, 2009 7:41:00 AM

Wah

Behter Kavita

Behter Prastuti

Shukriya

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

Tuesday, March 31, 2009 7:51:00 AM

यथार्थ कविता!

  Gagagn Sharma, Kuchh Alag sa

Tuesday, March 31, 2009 8:23:00 AM

त्याग का दूसरा नाम ही नारी है।
जिंदगी के हर मोड़ पर, हर उम्र में कुछ ना कुछ त्यागना ही उसकी नियती है। यहां तक की विवाह के पश्चात कभी-कभी अपनी पहचान, अपने नाम, को भी बदलना पड़ता है। एवज में जो मिलता है वह जगजाहिर है !

  अनूप शुक्ल

Tuesday, March 31, 2009 8:29:00 AM

कवि राज ताऊ की जय हो!

  P.N. Subramanian

Tuesday, March 31, 2009 8:33:00 AM

हमेशा की तरह एक बेहतरीन रचना. आभार.

  सुशील कुमार छौक्कर

Tuesday, March 31, 2009 8:42:00 AM

बहुत ही उम्दा रचना।

  seema gupta

Tuesday, March 31, 2009 8:56:00 AM

हर रूप मे जीती है नारी
कभी पिता , कभी पति,
भाई और संतान के लिए
रूप धर माँ बेटी
बहन और पत्नी का

" ताऊ जी बेहद भावनात्मक अभिव्यक्ति.....नारी ही है जो एक साथ इतने रूप धर अपने कर्तव्य निभा सकती है....हर शब्द में जाने नारी के कितने रूप उभर आये हैं.. आभार"

Regards

  शोभा

Tuesday, March 31, 2009 9:19:00 AM

हाँ नारी ऐसी ही होती है। सुन्दर प्रस्तुति।

  Prem Farrukhabadi

Tuesday, March 31, 2009 9:50:00 AM

This comment has been removed by the author.
  Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"

Tuesday, March 31, 2009 10:21:00 AM

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति........आभार

  mehek

Tuesday, March 31, 2009 10:41:00 AM

komal sunder bhav,bahut sunder

  Anil Pusadkar

Tuesday, March 31, 2009 10:48:00 AM

वाह ताऊ जी छा गये,एक्दम सच्ची कविता।ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की मूरत क्या होगी?

  कुश

Tuesday, March 31, 2009 10:59:00 AM

आपकी तो ये अदा भी निराली है.. कमाल और सिर्फ़ कमाल

  आलोक सिंह

Tuesday, March 31, 2009 11:31:00 AM

बहुत सुन्दर भाव पूर्ण अभिव्यक्ति .

  मोहन वशिष्‍ठ

Tuesday, March 31, 2009 12:29:00 PM

बेहद ही सुंदर शब्‍दों में नारी की पहचान बताई है ताऊ जी बहुत अच्‍छी लगी कविता

  रंजना [रंजू भाटिया]

Tuesday, March 31, 2009 12:31:00 PM

बहुत ही अच्छा लिखा है ..बहुत पसंद आई यह शुक्रिया

  रंजन

Tuesday, March 31, 2009 12:58:00 PM

बहुत सुन्दर रचना.. राम राम

  विनीता यशस्वी

Tuesday, March 31, 2009 1:27:00 PM

bahut khub...

  Helloraipur.com

Tuesday, March 31, 2009 3:51:00 PM

bahut hi achha likha hai aapne to nari shakti ko samjha hai bahut badiya ........... know about C.g. & raipur log on -www.helloraipur.com

  आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal)

Tuesday, March 31, 2009 4:25:00 PM

बहुत खूब.. दिल को छू जाने वाली कविता..

  मीत

Tuesday, March 31, 2009 5:47:00 PM

आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया बहुत अच्छा लगा आकर...
मीत

  कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee

Tuesday, March 31, 2009 6:26:00 PM

भावपूर्ण।

  दिगम्बर नासवा

Tuesday, March 31, 2009 7:05:00 PM

नारी तो रूप है शक्ति का, प्रेम का, विशवास का
नारी के बिना ये जग जूठा है.......

बहूत सुन्दर रचना

  डॉ .अनुराग

Tuesday, March 31, 2009 7:19:00 PM

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति........राम राम

  भारतीय नागरिक - Indian Citizen

Tuesday, March 31, 2009 8:32:00 PM

ताऊ, घनै भूत दिख रहे हैं थारे बिलोग पे

  राज भाटिय़ा

Tuesday, March 31, 2009 8:59:00 PM

बहुत ही सुंदर लगी ताऊ आप की यह कविता,
धन्यवाद

  गौतम राजरिशी

Tuesday, March 31, 2009 9:25:00 PM

ताऊ को सलाम एक सुंदर अभिव्यक्ति के लिये वो भी इतने सधे-सजे शब्दों में...

  अशोक पाण्डेय

Tuesday, March 31, 2009 10:45:00 PM

बहुत खूब..सुंदर भाव वाली सुंदर रचना। सीमा जी और ताउ का आभार।

  रचना

Tuesday, March 31, 2009 10:45:00 PM

kyaa yae kavita seema gupta ji kii haen ?? aabhar daekh kar aesa hi laagaa . phir ek commentmae seema gupta ji kaa naam bhi deekha . to kyaa kavita p c rampuriya ji ki haen . clear kardaetey duvidha ko maeri samjh ki

  बवाल

Tuesday, March 31, 2009 11:41:00 PM

बाप रे ताऊजी, कब से आपकी और राज भाटिया जी की पोस्ट पर टीप करने को तरस गए हम। पता नहीं क्यूँ आप दोनों की साइट ही ब्ला॓क कर देता था हमारा एन्टीवायरस। बड़ी मुश्किल से अब माना। बहुत ही ख़ूब कविता लिखी है ताऊ साहब आपने। वास्तव में दिल को छू लिया जी। आपका बहुत बहुत आभार और सीमाजी को भी हमारा आभार प्रेषित करें।

  Syed Akbar

Wednesday, April 01, 2009 12:13:00 AM

बेहद भावनात्मक अभिव्यक्ति......आभार

  अल्पना वर्मा

Wednesday, April 01, 2009 12:39:00 AM

bahut hi achchee kavita likhi hai Taau ji aap ne.

'निजता गुम हो जाती है रिश्तो में
और खो जाते है स्वपन उसके
भूल जाती है पहचान अपनी
रिश्तों की इस अंधी दौड में रात के सूनेपन में पुकारती है उसकी निजता ...

Sshkat abhivyakti.
badhaayee.

ताऊ उवाच :-:


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