ताऊ साप्ताहिक पत्रिका : अंक 13

प्रिय बहणों, भाईयो, भतिजियों और भतीजो आप सबका ताऊ पत्रिका के १३ वें अंक मे स्वागत है.जो पहेली आपसे पूछी गई थी वो रोहतांग दर्रे पर स्थित व्यास कुंड की थी.यह कुंड ही ब्यास नदी का उदगम स्थान है.

 

 

कुल्लू से मनाली के बीच अनेक रिसोर्ट्स हैं आप कहीं भी ठहर सकते हैं. मनाली मे हर तरह के होटल उपलब्ध हैं.

 

 

 

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कुल्लू से ही ब्यास नदी इठलाती बल खाती मनाली तक साथ चलती है और आगे बीच बीच मे रोहतांग तक कहीं कहीं झरनों के रुप मे मिलती है.

 

 

रोहतांग मनाली से ५१ किलोमिटर दूर है. पूरा रास्ता मनोरम दृष्यावली से परिपुर्ण है. कई फ़िल्मकार इसी रास्ते पर अपनी फ़िल्मों का छायांकन करते मिलेंगे.

 

 

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कोठी नामक जगह के बाद रास्ता और चढाई भरा हो जाता है. ड्राईविंग का असली आनन्द इसी रास्ते पर आता है. पुरे रास्ते मे अनेको बर्फ़ के दर्रे मिलते हैं.

 

 

लेकिन प्रदुषण की समस्या वहां भी है. बर्फ़ के ढलानों से फ़िसलने के पहले जरा जांच ले कि कहीं कोई टूटी कांच ( बीयर) की बोतल तो नही है. कई सिरफ़िरे ऐसी वस्तुये वहां खाली करके पटक जाते हैं.

 

वैसे पूरी ही कुल्लू घाटी बहुत ही रमणीक है. आप जब भी समय निकाल पायें अवश्य जायें. आपका वहां बिताया समय यादगार समय बन जायेगा.

 

 

आइये अब चलते हैं सु अल्पनाजी के    “मेरा पन्ना”    की और:-

 

 

-ताऊ रामपुरिया

 

 

 

 

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                       "मेरा पन्ना"

 

 

 

-अल्पना वर्मा



आईये इस अंक मे आपको  हमारी पहेली के स्थान के बारे में विस्तृत  जानकारी देते हैं.

रोहतांग दर्रा

 

 

भारत देश के हिमाचल प्रदेश में  13,050 फीट/समुद्री तल से 4111 मीटर  की ऊँचाई पर स्थित है  'रोहतांग दर्रा 'हिमालय का एक प्रमुख दर्रा है.

 

रोहतांग इस जगह का नया नाम है.पुराना नाम है-'भृगु-तुंग'!

 

rohtang-scan0251                               चाय पीने के दौरान अचानक बर्फ़ीला तूफ़ान

 

 

यह दर्रा मौसम में अचानक अत्यधिक बदलावों के कारण भी जाना जाता है.

उत्तर में मनाली ,दक्षिण में कुल्लू शहर से ५१ किलोमीटर दूर यह स्थान मनाली-लेह के मुख्यमार्ग  में पड़ता है.

 

इसे लाहोल और स्पीति जिलों का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है.पूरा वर्ष यहां बर्फ की चादर बिछी रहती है।

 

राज्य पर्यटन विभाग के अनुसार पिछले वर्ष 2008में  करीब 100,000 विदेशी पर्यटक यहां आए थे।

 

 

 

यहाँ से हिमालय श्रृंखला के पर्वतों का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है. बादल इन पर्वतों से नीचे दिखाई देते हैं.

 

यहाँ ऐसा नजारा दिखता है ,जो पृथ्वी पर बिरले ही स्थानों पर देखने को मिले. रोहतांग दर्रे में स्कीइंग  और ट्रेकिंग  करने की अपार संभावनाएँ हैं.

हर साल यहाँ हजारों की संख्या में पर्यटक इन आकर्षक नजारों का लुत्फ लेने और साहसिक खेल खेलने आते हैं. रोहतांग-दर्रा जाते हुए ब्यास नदी के बाएं किनारे पर एक छोटा सा दर्शनीय गांव है,वशिष्ठ.रोहतांग-दर्रा जाते हुए, मनाली से 12 कि.मी. दूर कोठी एक सुंदर दृश्यावली वाला स्थान है.हर साल यहाँ हजारों की संख्या में पर्यटक इन आकर्षक नजारों का लुत्फ लेने और साहसिक खेल खेलने आते हैं.

प्रदूषण की समस्या-:

 

 

पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण इस क्षेत्र में गाड़ियों की आवाजाही भी बढ़ रही है.यह भी प्रदूषण बढ़ाने में एक कारक सिद्ध हो रही हैं .

 

 

यहाँ के स्थानीय वैज्ञानिक जेसी कुनियाल के मुताबिक पूरे सीजन में 10000 गाड़ियाँ यहाँ से गुजर चुकी होती हैं.

 

 

व्यस्त समय में यहाँ से प्रतिदिन 2000 किलो कचरा निकलता है तो यहाँ के वातावरण को खराब कर रहा है. पर्यावरणविदों के अनुसार अगर स्थिति नहीं बदली तो इस क्षेत्र को गंभीर नुकसान हो सकता है.

मौसम की समस्या -:

 

 

जब भी बर्फ के कारण इस मार्ग को बंद कर दिया जाता है.[अक्सर नवम्बर से अप्रैल तक].तब इस जिले में रहने वाले लगभग ३० हज़ार निवासी दुनिया से कट जाते हैं.रोहतांग दर्रा बंद होने का सबसे ज्यादा असर स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ता है.हेलीकॉप्टर से ही आवागमन संभव हो पाता है और जब मौसम खराब हो तब यह भी संभव नहीं हो पता.

 

अक्सर ५-६ महीने के लिए ऐसी स्थिति हो जाती है,सोचिये वहां जीवन कितनी कठिनाई में गुजरता होगा.उन सभी दिनों राज्य सरकार सब्सिडी पर राशन देती  है.

 

 

यहाँ के लोग मुख्यत आलू मटर की खेती पर अपना गुजारा करते हैं.

 

**प्रयटन हेतु अनुकूल समय -जून से अक्टूबर

**रोहतांग पास जाने के लिए मनाली-रोहतांग रास्ते में से सर्दी में पहनने वाले कोट और जूते किराये पर ले लें.क्योंकि वहां बर्फ है तो आप को बिना इनके वहां घूमने में परेशानी आएगी.

कैसे जाएँ-

 

रोहतांग पास जाने के लिए मनाली या कुल्लू से आप जीप ले सकते हैं या अपनी गाड़ी में भी वहां जा सकते हैं.

 

[मनाली ५७० किलोमीटर दिल्ली से और २८० किलोमीटर शिमला से दूर है.]

 

**सभी पर्यटकों  से विनती है इन प्राकृतिक स्थलों को साफ़ सुथरा  रखने में मदद करें.
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ब्यास नदी का उदगम और वेद ब्यास ऋषि मंदिर

 

इसी दर्रे से ब्यास नदी का उदगम  हुआ है.पहेली के मुख्य चित्र में दिखाया गया कुंड ब्यास नदी के उदगम का स्थान है.आज भी यह वैसा ही है जैसा चित्र में दिख रहा है.

 

 

वहां के कुंड के पानी का स्वाद का वर्णन शब्दों में संभव ही नहीं है.शायद अमृत का स्वाद ऐसा ही होता होगा?यह कुंड वेद ब्यास ऋषि के मंदिर में स्थित है.'ब्यास नदी'कुल्लू - मनाली ही नहीं ,वरन फिरोजपुर में 'हरी का पटन[?]' की नदी में मिलकर पंजाब और सतलुज नदी में मिल कर  पाकिस्तान की ज़मीन को भी हरा भरा करती है फिर अरब सागर में मिल जाती है.इस नदी की कुल लम्बाई ४६० किलोमीटर है.

 

 

कहते हैं..लाहोल -स्पीती और कुल्लू खेत्र आपस में अलग थे तब इन्हें जोड़ने के लिए स्थानीय लोगों  ने यहाँ एक मार्ग बनाने के लिए अपने इष्ट देव भगवान  शिव की आराधना की .तब भगवान शिव ने भृगु तुंग पर्वत को अपने त्रिशूल से काट कर यह भृगु -तुंग मार्ग यानि रोहतांग पास बनाया.

 

 

 

इस दर्रे के  दक्षिण में व्यास नदी का उदगम    कुंड बना हुआ है.यहीं  पर हिन्दू ग्रंथ महाभारत लिखने वाले महारिषी वेद  व्यास जी ने तपस्या की थी.इसी लिए इस स्थान पर व्यास मंदिर बना हुआ है.

 

 

सभी धाराएँ मनाली से १० किलोमीटर दूर पलाचन गाँव में मिल जाती हैं और ब्यास नदी बनाती हैं.पहले इस नदी को'अर्जीकी' कहा जाता था.महाभारत के बाद इस नदी का नाम ब्यास नदी पड़ा.

 

इस पवित्र नदी की सुन्दरता ने न जाने कितने ऋषि मुनियों को आकर्षित किया है.
उन में कुछ नाम प्रमुख हैं..ऋषि वशिष्ठ ,मनु,नारद,विश्वामित्र,पराशर,कनव,परशुराम,व्यास जी आदि.इन में से कई ऋषियों के मदिर यहाँ अब भी देखने को मिल सकते हैं.

 

सभी जानकारी नेट से विश्वसनीय सूत्रों  से एकत्र की हुई है और जल्द ही विकिपीडिया में संगृहीत कर दी जायेगी.

 

 

मनाली और कुल्लू के बारे में हम विस्तार से कभी बाद में किसी और पहेली के साथ जानेंगे.

 

अगली पहेली तक के लिए नमस्कार.



-अल्पना वर्मा

 

 

( विशेष संपादक )

 

 

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            “ दुनिया मेरी नजर से”

 

 

 

 

 

 

 

 

-आशीष खण्डेलवाल

नमस्कार,


वॉकिंग एंड टॉकिंग

क्या आप भी मेरी तरह अपना मोबाइल फोन यहां-वहां भूलते रहते हैं। तब तो यह आपके लिए भी अच्छी ख़बर हो सकती है। आस्ट्रेलिया के एक नौजवान ने जूते को मोबाइल फोन में तब्दील करने का करिश्मा कर दिखाया है। जैसे ही किसी का फोन आए, अपना जूता उतारिए और उसे कान पर लगाकर बात कर लीजिए। बाईस साल के इस नौजवान का नाम है पॉल गार्डनर स्टीफन। देखिए इनका जूता फोन-



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इसमें इन्होंने अपने एक चर्मकार मित्र की मदद ली और मोटोरोला फोन तो तोड़-मरोड़कर इस तरह फिट किया कि इससे आसानी से बातचीत की जा सके। यही नहीं, उन्होंने ब्लूटूथ की मदद से हेडसैट के जरिए भी फोन सुनने की सुविधा रखी है। इन्हें यह आइडिया कैसे आया? जी ये महोदय फिल्मों से बहुत इंस्पायर्ड हैं। वर्ष 1960  की एक हॉलीवुड फिल्म में इन्होंने एक जासूस को इस तरह बात करते देखा। इनके दिमाग में सनक घुस गई और बना डाला यह जूता फोन।

Don Adams in character as secret agent Maxwell Smart uses his shoe phone in the 1960s TV spoof Get Smart /PA pics

स्टीफन अब इस फोन को ऑनलाइन बेचने पर भी विचार कर रहे हैं। अगर आपको यह फोन पसंद आया हो मुझे लिख दीजिएगा। वैसे भारतीय सड़कों पर इस फोन का इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है। नाक के लिए रूमाल और एक परफ़्यूम की बोतल जरूर साथ रखें। अगर आपको यह फ़ोन कुछ ज़्यादा ही पसंद आया हो तो इसके सजीव इस्तेमाल को बताने वाली यह वीडियो रिपोर्ट देख सकते हैं।

 

 

 

 



 

नोटः अगर आप सोच रहे हैं कि मैं इस तरह के फ़ोन की बात आपको बेवजह बता रहा हूं, तो आप गलत हैं। मैं ताऊ का एक राज़ आपको बता रहा हूं कि वे पाकिस्तान ऐसा ही फोन लेकर गए हैं। गुपचुप में सबसे बात भी कर लेंगे और किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा।



सादर

 

-आशीष खण्डेलवाल

(तकनिकी संपादक)


 

 

और अब आईये चलते हैं सुश्री सीमा गुप्ता के स्तम्भ “मेरी कलम से” की और

 

 

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            "मेरी कलम से"

 

 

 

 

 

 

 

 

 

--seema gupta

 

नमस्कार, ताऊ साप्ताहिक पत्रिका के एक और अंक में आपका स्वागत है. आज एक

कहानी और सुनते हैं.

 



जंगल मे एक सर्दियों के दिन थे. उस सूबह  अच्छी सी धुप खिली हुई थी. और एक शेर अपने गुफा के बाहर, आलस्य में  धूप में लेटा  हुआ था . तभी  एक लोमड़ी घूमते घूमते वहां आई.

 

लोमड़ी : आपकी घडी मे क्या बजा होगा? क्योंकि..मेरी घडी टूट गयी है.

 

शेर बोला -  "ओह, लाओ मैं आपकी घडी सुधार देता हूं.

 

लोमड़ी : "हम्म ... लेकिन यह एक बहुत जटिल और बारीक काम है. और आपके   बड़े पंजे   इसे उल्टा खराब  कर देगें ."


शेर : "अरे नहीं, मुझे दे दो, मैं इसको ठीक कर  दूंगा." लाओ चिंता मत करो.

लोमड़ी: लेकिन "यह हास्यास्पद है! कोई बेवकूफ भी ये जानता है की है कि इतने बडॆ पंजे के साथ आलसी शेर" जटिल घड़ियों को ठीक नहीं कर सकते हैं .


शेर : "बेशक वो कर सकते हैं  , यकीन करो. लाओ  मुझे दे दो .

 

शेर घडी लेकर अपनी गुफा में चला गया. और कुछ  देर बाद जब वापस आता है तो उसके हाथ मे चलती हुई घडी होती है ..

 

अपनी घडी को ठीक देख कर लोमड़ी, शेर से और प्रभावित हो जाती है और धुप  मे लेटा  शेर बेहद प्रसन्न होता है.

 

 

जल्द ही एक भेड़िया भी वहां  आता है और धूप में लेटे आलसी शेर को देखने के लिए रुक जाता है.

 

भेड़िया बोला : "क्या मै आज रात आपके साथ  टीवी देखने आ सकता हूँ , क्योंकि मेरा TV खराब हो गया है?

 

शेर : "ओह, मैं आसानी  से आप का   टीवी ठीक कर सकता हूँ..

 

भेडिया: " आप क्या सोचते हैं कि मैं आपकी इस बकबास पर यकिन कर लूंगा? एक बडे पंजे वाला शेर इतना बारीक, टीवी सुधारने का काम कर सकता है? नही ये असम्भव है..

खैर भेडिया अपना टीवी सुधरवाने  लिये तैयार हो जाता है.

 

शेर उसका टीवी लेकर अपनी गुफा में चला जाता है और कुछ समय बाद एक बिल्कुल ठीक  टी वी के साथ आता है. भेडिया ये देख कर  चकित और खुश हो जाता है.

 

 

अब  शेर की गुफा के अंदर का नजारा देखिये . एक कोने में आधा दर्जन से अधिक छोटे और बुद्धिमान  खरगोश  बहुत विस्तृत उपकरणों के साथ बहुत बारीक और जटिल काम कर रहे हैं. 

 

दूसरे कोने में एक बहुत बड़ा शेर उन्हें मेहनत से काम करते देख मन ही मन बडा प्रसन्न दिख रहा  है.

 

Moral : यदि आप जानना चाहते हैं की एक मेनेजर प्रसिद्ध क्यूँ है , तो उसका नहीं उसके अधीनस्त कर्मचारियों का  काम देखिये. जिनकी मेहनत का श्रेय उसको मिलता है.

 

कार्यशील संसार के  संदर्भ में प्रबंधन पाठ : यदि आप जानना चाहते हैं की  क्यों कोई अयोग्य मेनेजर बिना काबलियत ही  पदोन्नत कर दिया जाता है तो उसके अधीन कार्य करने वालो का कार्य देखो.


अगले सप्ताह फ़िर मिलते हैं तब तक के लिये अलविदा.

 

--सीमा गुप्ता

 

संपादक (प्रबंधन)

 

 

 

इस गुरुवार १९ मार्च को हम श्री सैयद यानि लविजा के पापा का ईन्टर्व्यु प्रकाशित करेंगे  जो कि ताऊ पहेली के उपविजेता रह चुके हैं.

 

ताऊ पहेली राऊंड दो के तीसरे अंक के उपविजेता श्री .दिलिप कवठेकर , और राऊंड एक के महाताऊ सम्मान प्राप्त श्री संजय बैंगाणी और श्री गौतम राजरिषि के इंटर्व्यु अभी चल ही रहे हैं. हम हमारे सम्माननिय पाठकों से अनुरोध करते हैं कि उनको इनसे जो भी सवाल पूछने हों वो कृपया हमें जल्दी से जल्दी भिजवायें

 

  

अब ताऊ साप्ताहिक पत्रिका का यह अंक यहीं समाप्त करने की इजाजत चाहते हैं. अगले सप्ताह फ़िर आपसे मुलाकात होगी. संपादक मंडल के सभी सदस्यों की और से आपके सहयोग के लिये आभार.

 

 

संपादक मंडल :-

 

मुख्य संपादक : ताऊ रामपुरिया

 

विशेष संपादक : अल्पना वर्मा

 

संपादक (प्रबंधन) : seema gupta

 

संपादक (तकनीकी)  : आशीष खण्डेलवाल

 

सहायक संपादक : बीनू फ़िरंगी एवम मिस. रामप्यारी

19 comments:

  Udan Tashtari

Monday, March 16, 2009 6:06:00 AM

अल्पना जी द्वारा, आशीष द्वारा प्रद्द्त जानकारी एवं सीमा जी द्वारा प्रद्द्त मेनेजमेन्ट फंडा बहुत अच्छा लगा. सभी का आभार.

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

Monday, March 16, 2009 7:37:00 AM

ताऊ जी! पत्रिका विस्तृत होती जा रही है। इसे दो तीन पेजों में बदलना पड़ेगा। मेरा जैसा पाठक कई बार इसे सरसरी तौर पर पढ़ कर निकल जाता है यह ठीक नहीं। आप इसे दिन भर में तीन चार टुकड़ों में प्रकाशित कर सकते हैं।

  Ratan Singh Shekhawat

Monday, March 16, 2009 8:12:00 AM

आशीष जी आपके द्वारा दी गई जानकारी बहुत अच्छी लगी |
सीमा जी ने भी बहुत अच्छी बात बताई, मैनेजर कितना ही काबिल हो अगर उसके अधीनस्थ कर्मचारी कामचोर है तो वो मेनेजर भी फ़ैल है और कर्मचारी दुरुस्त है तो अयोग्य मेनेजर भी एक सफल मेनेजर बन जायेगा |
अल्पना जी ने रोहतांग दर्रा घर बैठे ही घुमा दिया बहुत-बहुत आभार !

  आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal)

Monday, March 16, 2009 9:33:00 AM

हमेशा की तरह अल्पना जी ने इस स्थान की भी व्यापक और रोचक जानकारी दी है। छोटे-छोटे किस्सों से बड़े-बड़े मैनेजमेंट नुस्खे सिखाने में सीमा जी का जवाब नहीं। एक और अच्छे अंक के संपादन के लिए ताऊ, रामप्यारी और बीनू फिरंगी का आभार..

  seema gupta

Monday, March 16, 2009 9:52:00 AM

अल्पना जी ने रोहतांग दर्रे की बहुत खुबसुरत जानकारी दी है..कभी जाना तो हुआ नहीं पर हाँ जी जरुर जाने का मन हो आया है इतनी डिटेल पढ़ कर.. , .आशीष द्वारा दी गई जूता मोबाइल की जानकारी बहुत अच्छी लगी, क्या पता आने वाले समय में ये मोबाइल भी पोपुलर हो जाये....इस पत्रिका की सफलता के लिए सभी पाठको के योगदान और प्रोत्साहन का आभार.

regards

  लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्`

Monday, March 16, 2009 10:04:00 AM

आपका साझा ब्लोग पत्रिका का आनँद दे रहा है सभी को बधाई और इसी तरह खुशियाँ बाँटते रहीये
- लावण्या

  डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक

Monday, March 16, 2009 10:54:00 AM

पर्वतमाला का किया,वर्णन ललित-ललाम।

सुन्दर-सुन्दर दृश्य,ये लगते हैं अभिराम।।


ताऊ जी की पत्रिका, मुझको बड़ी पसंद।

बच्चों-बूढ़ों सभी को, यह देती आनन्द।।

  Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"

Monday, March 16, 2009 11:06:00 AM

अल्पना जी,आशीष जी,एवं सीमा जी सहित पत्रिका का समस्त संपादक मंडल अपनी अपनी भूमिका का बहुत ही बढिया तरीके से निर्वहण कर रहा है.....बधाई

  mehek

Monday, March 16, 2009 11:12:00 AM

waah rohtak ki sair,juta phone aur manager ki kahani bahut bahut pasand aaye.sabhi ka bahut aabhar.

  आलोक सिंह

Monday, March 16, 2009 11:40:00 AM

बहुत अच्छी जानकरी और प्रसंग .
धन्यवाद

  poemsnpuja

Monday, March 16, 2009 11:47:00 AM

ham jab manali ghoomne gaye the to hamara bhi rohtang pass jane ka plan tha, par mausam achanak se kharab ho gaya fir avalanche ke karan bahut se log fans gaye. to hamara jaana ho nahin paaya...jaan ke accha laga yahan ke bare me. shayad fir kabhi jaana ho paaye.

accha raha aaj ka ank bhi, dhayavaad taau aur baki sampadak mandal ko.

  Shiv Kumar Mishra

Monday, March 16, 2009 11:51:00 AM

बहुत शानदार! साप्ताहिक पत्रिका के दर्शन पहली बार हुए. लेकिन अद्भुत प्रयोग है, यह साप्ताहिक पत्रिका. रोहतांग पास और व्यास नदी के उद्गम वाली जगह और इलाके की जानकारी बहुत खूब रही. हम इस साप्ताहिक पत्रिका के परमानेंट ग्राहक बन गए आज से.

  cmpershad

Monday, March 16, 2009 2:10:00 PM

निश्चित ही वो खरगोश जापानी रहे होंगे:)

  लवली कुमारी / Lovely kumari

Monday, March 16, 2009 2:53:00 PM

आप सब की मेहनत के लिए आभार जैसा शब्द छोटा होगा फिर भी ..बहुत आभार.

  गौतम राजरिशी

Monday, March 16, 2009 2:57:00 PM

ताऊ को राम-राम...तनिम व्यस्तता बढ़ गयी है इस स्थानांतरण के चक्कर में तो अनुपस्थित रहने लगा हूँ...और इसी फेर में इस बार की पहेली देख नहीं पाया....
अल्पना जी का व्याख्यान हमेशा की तरह रोचक और ग्यानवर्धक और सुश्री सीमा जी की कथा नये द्वार खोलती हुई....

  Dr.Bhawna

Monday, March 16, 2009 3:04:00 PM

सचमुच बहुत अच्छी जगह है कई बार जाना हुआ वहां पर,यहाँ के काफी फोटो भी हैं हमारे,बस अब परदेस में आने के बाद तो कभी मौका नहीं मिला फिर से वहां जाने का क्योंकि कम समय के लिए ही भारत जाना होता है बस उन्हीं फोटो को देखकर याद ताजा कर लेते हैं...

  अल्पना वर्मा

Monday, March 16, 2009 5:05:00 PM

आज की साप्ताहिक पत्रिका रोचक लगी.
वेद ब्यास कुंड के बारे में नेट पर बहुत ज्यादा जानकरी उपलब्ध नहीं है लेकिन यह एक ऐसी जगह है जहाँ एक बार तो जरुर जाना चाहिये.मनाली और कुल्लू तक जा कर लोग अक्सर वापस आ जाते हैं.हमने जब यह जगह ६ साल पहले देखी थी तब नाम मात्र को ही बर्फ वहां थी.
आशीष जी ,'जूते में फ़ोन 'यह तो बड़ी मजेदार खबर आप ने दी है.यह लेख वाकई रोचक लगा.
लेकिन इस से चलते -चलते फ़ोन करने वालों को एक जुटा पहन कर चलना पड़ेगा..एक हाथ में ले कर!
ऐसी अनोखी चीजें ताऊ नहीं खरीदेंगे तो कौन खरीदेगा!आप की खबर में सच्चाई दिख रही है.
सीमा जी का कहानी के द्वारा हर बार प्रबंधन का एक नया गुर सिखाना पसंद है. अच्छी प्रस्तुति लगी.
-पाठकों से सवाल आमंत्रित करने का विचार अच्छा है.

  समयचक्र - महेन्द्र मिश्र

Monday, March 16, 2009 9:05:00 PM

पत्रिका रोचक लगी.

  राज भाटिय़ा

Monday, March 16, 2009 9:55:00 PM

टिपण्णी पहले लेलो पत्रिका किस्तो मे पढूंगा.
राम राम जी की

ताऊ उवाच :-:


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