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प्रतिरूप



parmatma

एक आदमी बोला
मैं बहुत खुश हूं
ये दुनियां बडी खूबसुरत है
मैने कहा बिल्कुल ठीक
वाकई जन्नत है


दुसरा आदमी आया और बोलाparmatma2
मैं बहुत दुखी हूं
परमात्मा ने इतनी
दुख भरी दुनियां
आखिर क्यों बनाई
मैं जीना नही चाहता
मैने कहा तू भी बिल्कुल सही
वाकई साक्षात नर्क है ये दुनियां


एक तीसरा आदमी खडा था
उसने पूछा
आप तो बडे अजीब इन्सान हो
दिलासा देने की बजाये
दोनों की हां मे हां
मिलाते हो
मैने कहा
तू तो उन दोनो से भी सही


सारा वार्तालाप एक यparmatma3 क्ष
सुन रहा था
वो बोला - ये हां मे हां नही मिलाते
बल्कि तुम तीनो से भी
ज्यादा सही कहते हैं
परमात्मा ना दुख:, ना सुख
और ना ही निर्णय है
परमात्मा तो तुम जैसा भी
देखना चाहो, वही

यानि तुम्हारा ही प्रतिरुप है

(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)

29 comments:

  1. परमात्मा तो तुम जैसा भी
    देखना चाहो, वही
    यानि तुम्हारा ही प्रतिरुप है


    लाजवाब! बहुत अच्छी रचना है ताऊ, फुल क्रेडिट दिया.

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  2. तस्वीरें कहां से चुनते हैं आप। तस्वीरों के साथ संदेश भी सुंदर है। पर कई बातें हैं जो समझकर भी समझी नहीं जा सकती।

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  3. अरे परमात्मा ना दुख:, ना सुख
    और ना ही निर्णय है
    परमात्मा तो तुम जैसा भी
    देखना चाहो, वही

    यानि तुम्हारा ही प्रतिरुप है

    आज बहुत तगड़ी ज्ञान की बात बता दी ताऊ !

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  4. एक मित्र का यह फर्ज बनता है की वह मित्र को सद्विचार देता रहे -अब तुम आध्यात्म की ओर पेंगें बढ़ा रहे हो गुरू ..सारी ताऊ गीरी धरी रह जायेगी ! वॉर्न कर दे रहा हूँ -कविता को अच्छा कहूंगा तो तुम उत्साहित हो -नारद मोह से तुम्हे बचाना मेरा परम कर्तव्य है -सीमा जी को भी टोकता हूँ काहें हमारे प्यारे ताऊ को ताऊपना से अनजाने ही वंचित कर रही हैं !

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  5. बिल्कुल सही कहा भाई. यह अपना दृष्टिकोण ही है.

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  6. मस्त ताऊ ...बहुत अच्छी कविता है..... जीवन के फलसफे को बहुत अच्छे से दर्शाता है.......

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  7. bahut gahri baat kahi hai taau, wakai parmatma ham sab ka pratiroop hi to hain. bahut badhai aapko.

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  8. ताऊ रामराम,
    एक बात बताऊँ?
    एकदम मस्त कविता.

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  9. अरे परमात्मा ना दुख:, ना सुख
    और ना ही निर्णय है
    परमात्मा तो तुम जैसा भी
    देखना चाहो, वही
    यानि तुम्हारा ही प्रतिरुप है

    " परमात्मा सर्वव्यापी है , हर जगह हर वस्तु में है, सच कहा हम परमात्मा को जहाँ जैसा देखना चाहते हैं, वैसे ही देखते हैं और पूजते हैं, पथरों मे भी तालाश कर लेतें हैं....हर प्राणी का प्रतिरूप भगवान् है..सुंदर भाव "
    regards

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  10. सही कहा, हम जैसे होते हैं, दुनिया वैसे ही नजर आती है।

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  11. जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

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  12. परमात्मा तो तुम जैसा भी
    देखना चाहो, वही
    यानि तुम्हारा ही प्रतिरुप है

    सजीव लिखा है ताऊ, संवेदन-शील रचना

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  13. आहा हा ! आज तो ज्ञान की वारिश हो रही है . तृप्त हो गए . आहा हा !

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  14. एक आदमी बोला
    मैं बहुत खुश हूं
    ये दुनियां बडी खूबसुरत है
    मैने कहा बिल्कुल ठीक
    वाकई जन्नत है

    Bahut Achhi Line

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  15. अरे परमात्मा ना दुख:, ना सुख
    और ना ही निर्णय है
    परमात्मा तो तुम जैसा भी
    देखना चाहो, वही
    यानि तुम्हारा ही प्रतिरुप है
    जी बिलकुल सही कहा ताऊ, परमात्मा तो हमारे अन्दर ही हैम हमारा ही प्रतिरुप.....
    ताऊ जी आप अर्विंद मिश्रा जी की बात पर भी जरुर गोर करे, बातो बातो मे उन्होने बहुत काम की बात कह दी है.
    धन्यवाद

    वेसे ताऊ कवि से तो लोग भागते है, इस लिये यह कविता सविता मत करो आप का तो लठ्ठ ही ठीक है,

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  16. बहुत बढ़िया ! जैसे आप वैसी दुनिया.

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  17. ताउजी! ...ये सहीराम तो ऐसा है कि' पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....'...बहुत सुंदर रचना से परिचय कराया आपने, धन्यवाद!

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  18. हमारा भी आभार स्वीकार कीजिएगा..

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  19. आपकी इस पोस्ट को पढकर दो लाईन याद आ गई एक ब्लोगर की लिखी। ब्लोगर शायद पवन जी हैं।
    ऐलान उसका देखिए कि वो मजे में हैं
    या तो वो फकीर हैं या फिर वो नशे में हैं।

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  20. अरे आज ताऊ !!! क्या हो गया!!!

    वैसे एक बेहतर कवितामयी विचार
    ताऊ के साथ सीमा जी को बधाई!!!


    और अब चलिए !! मेरी मदद करने .....

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  21. ताऊ.. आपकी पसंद का जवाब नहीं आपकी इस प्रस्तुति को प्रणाम... सीमा जी को भी यथायोग्य..

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  22. बेहतरीन आपको सीमा जी और ताऊ जी का आभार इतनी अच्‍छी रचना के लिए

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  23. जिसकी रही भावना जैसी, प्रभू मुरत तिन देखी वैसी

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  24. परमात्मा तो तुम जैसा भी
    देखना चाहो, वही

    यानि तुम्हारा ही प्रतिरुप है
    सच लिखा है.आध्यात्म की ओर ले जाती कविता...गहरी सोच लिए हुए--
    ताऊ जी आप का कवि रूप भी बेहद प्रभावशाली है.

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  25. परमात्मा तो तुम जैसा भी
    देखना चाहो, वही
    यानि तुम्हारा ही प्रतिरुप है
    एकदम सही...

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  26. कविता जीवन एक गहन याथार्थ्य को बहुत ही कम एवं सुंदर शब्दों में व्यक्त करती है.

    सस्नेह -- शास्त्री

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