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"कुदरत का कहर"











 kudarat ka kahar1





















रात भर बर्फ़ गिरती रही  kudarat ka kahar 2
सुबह जब बाहर झांका तो
नजरें अवाक और दिल परेशान  
सडक किनारे का दृश्य
एक गरीब बुढी मां की 
चिथडों  मे लिपटी
'हिम प्रतिमा'
सारा दिन भीड उस
कुदरत निर्मित प्रतिमा को
देखने आती रही
तभी मैने किसी को कहते सुना
कल की बर्फ़ीली रात
बुढिया सर छुपाने की
जगह मांगती फ़िर रही थी !


(इस रचना के दुरूस्तीकरण के लिये सुश्री सीमा गुप्ता का हार्दिक आभार!)

35 comments:

  1. :-(
    बर्फीली प्रतिमा के पीछे ऐसी दर्दनाक कहानी सुनकर फिर इन्सान की बेबसी पे रोना आया --

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  2. बर्फ की बनने के बाद तो देखाने वालों की भीड़ लग गई लेकिन रात भर किसी को उस पर दया नही आई न ही उसका दर्द सुनने को किसी के पास समय ही रहा होगा !

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  3. बड़ी दुखभरी कविता है मगर सोचने को बाध्य करती है कि इसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या किया जाय.

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  4. तभी मैने किसी को कहते सुना
    कल की बर्फ़ीली रात
    बुढिया सर छुपाने की
    जगह मांगती फ़िर रही थी !
    ""सोचने पर मजबूर करते शब्द...काश बुढी मां को आसरा मिला होता "

    regards

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  5. ye manavta ke girte huye chritar ki prakashthh hai

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  6. बहुत सुंदर. हमें मक्सिम गोर्की के ज़माने की याद दिला रही है.

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  7. बेहद दर्द भरी दास्ताँ कहती कविता.
    ऐसे संवेदनहीन समाज पर लानत है जो सिर्फ़ तमाशाई बनना जानता है.

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  8. इतनी सुंदर गुडिया...बुढिया और किसी ने पनाह नहीं दी.... बहुत नाइन्साफी है रे सांबा...

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  9. काश ये दर्द कोई समझा होता..:(

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  10. ताऊ रामराम,
    लगता है कि आपको बर्फ देखने की बहुत ही उतावली हो रही है. शायद सोच रहे होंगे कि पहाडों पर पता नहीं बर्फ कब गिरेगी, ये कविता छापकर ही मन बहला लूं.
    ये कविता तो सैम ने नहीं लिखी, ना ही तुम्हारी लिखी हुई है. जिसने भी लिखी है बढ़िया लिखी है, एकदम मस्त.

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  11. bahut sundar...har ek shabd main ek ehsaas jagaati hui...

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  12. बहुत दुखद ..तमाशा देखने सभी आते हैं

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  13. दर्दनाक। सोचने को मजबूर करती कविता।

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  14. ताऊ ये सरासर नाइंसाफी है...कभी खुल कर हँसा देते हो और कभी आँखें नम करवाते हो..
    अच्छे शब्दों का अच्छा संयोजन मगर

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  15. नया साल आपको मंगलमय हो

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  16. बहुत ही भावुक लगी आप की कविता, क्या हमारे बुजुर्गो का ओर उस के बाद हमारा भी यही हाल होगा?? क्योकि ब्च्चे भी तो हमारे ही कदमो पर चलेगे???
    बहुत सुन्दर कविता ताऊ ओर सीमा जी का धन्यवाद

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  17. बहुत दुखद बात सुन्दर सहज शब्दों में कह दी।
    घुघूती बासूती

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  18. ये कविता तो दिल को चीरती हुई निकल गयी... आज एक दूसरे ताऊ से परिचय हुआ.. जबरदस्त

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  19. ओह!
    अप्रतिम सौन्दर्य भी
    निर्मित होता है
    सामाजिक विद्रूप की
    विवशताओं के
    हादसे से....

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  20. कितनी मासूमियत से उभारा है उस वेदना को, उस दर्द को जिसको सह पाना सबके बस मैं नही
    ताऊ.............बहुत मार्मिक कविता

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  21. bhavuk kar gayii aap ki rachna...sorry seema ji ki rachna...
    neeraj

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  22. सुन्दर शब्द चित्र

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  23. Tau!...kyaa yeh bhi ek nayaa karnamaa hai?... yaa fir asali tau aise hi naram dil hai?.... kahaani dil ko chhoo gai hai!

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  24. संवेदनाओं को अन्दर तक छू लेने वाली पोस्ट।

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  25. एक आह के सिवाय दिल से कुछ आवाज नहीं आई और आंखें भर आई बहुत मार्मिक पोस्‍ट

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