हवा और चांदनी

 

 chandanijpgप्रत्येक मनुष्य जीवन मे कुछ ना कुछ सोचता रहता है ! कुछ लोग कविता के रुप मे अपने को अभिव्यक्त कर लेते हैं ! कुछ मुझ जैसे लोग सिर्फ़ रफ़ पन्नों पर डूडल्स के जैसे अपने मनोभावों को व्यक्त करके उनको इतिहास के पन्नों मे दफ़न कर देते हैं हमेशा के लिये !

 

 

मैने भी ऐसे ही कुछ डुडल्स के रुप मे अपने भाव, मेरी डायरियों मे समय समय पर बेतरतीब रुप से लिख रखे हैं ! उनमे से चंद कविताएं मैने सुश्री सीमा गुप्ता जी को ठीक करने के लिये भेजी थी ! जो उन्होने बडे अनुग्रह पुर्वक ठीक करके भेजी हैं ! मैं उनका बहुत आभारी हूं ! बिना उनके मार्गदर्शन के ये कविताएं यहां तक इस रुप मे पहुंचना मुश्किल था !

 

 

ये मेरी पहली कविता है हवा और चांदनी 

 

 

 

 chandani1jpg

रात के आँचल तले,
खिड़की दरवाजों को सुला
खामोशी की चादर में सिमटा
ख्बाबों मे खोया था
कांच की खिड़की पे
चुपके से कदम रख
चाँद की चांदनी
मेरे पास उतर आई
और असहाय हवा
सारी रात दरवाजे पर खडी
दस्तक देती रही....

( मार्गदर्शन हेतु पुन: माननिया सीमा गुप्ता जी का आभार )

 

30 comments:

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

Monday, December 22, 2008 9:33:00 AM

गज़ब की अभिव्यक्ति! क्या कहूं पी सी भाई साहेब, बहुत गज़ब की रचना है. जिस समय मैं यह कमेन्ट लिख रहा हूँ, घर के बाहर का तापक्रम शून्य सी १४ डिग्री नीचे है - बर्फीली रात में ठंडी हवा ज़ोर सी दरवाज़ा पर दस्तक दे रही है और सीटियाँ भी बजा रही है - ऐसे में आपकी कविता बहुत ही सही दिख रही है.

  मुसाफिर जाट

Monday, December 22, 2008 9:34:00 AM

ताऊ रामराम,
ताऊ, थारे मुहँ से भैंस कथा ही शोभा देती है. तम् कहाँ ये कवि बनने चले हो?
वैसे बढ़िया प्रयास.

  बवाल

Monday, December 22, 2008 10:03:00 AM

राम राम ताऊ जी,
वाह वाह क्या बात है. सीमाजी का आभार के हमारे प्यारे ताऊ ने कविता को भी अपने शानदार लेखन
में स्थान देना प्रारम्भ कर दिया. स्वागत ताऊजी.

  विनय

Monday, December 22, 2008 10:31:00 AM

बहुत बढ़िया!

  seema gupta

Monday, December 22, 2008 10:49:00 AM

कांच की खिड़की पे
चुपके से कदम रख
चाँद की चांदनी
मेरे पास उतर आई
" ताऊ जी बेहद नाजुक और सुंदर भावनाओ की अभिव्यक्ति, भावः और शब्द तो आपके ही हैं ...हम तो सोच भी नही सकते थे की ताऊ जी भी कविता लिख सकतें हैं और भी इतनी शानदार भावनाओ की ....शुभकामनाये .."

Regards

  गौतम राजरिशी

Monday, December 22, 2008 10:51:00 AM

ताऊ तेरे रूप अनेक.....इस नये रूप ने तो अचंभित कर दिया और
"असहाय हवा
सारी रात दरवाजे पर खडी
दस्तक देती रही.." का जो ट्विस्ट दिया है अंत में,वो तो क्या कहने

  poemsnpuja

Monday, December 22, 2008 11:12:00 AM

taau, ab aap bhi kavita karne lagoge, aur wo bhi itni acchi to ham becharon ko kaun padhega.
kamal ki likhi hai kavita...badhai badhai.

  Amit

Monday, December 22, 2008 11:27:00 AM

Bahut mast likha hai taau....subeh subeh itni acchi kavita phadne ko mili...

  दिगम्बर नासवा

Monday, December 22, 2008 11:44:00 AM

ताऊ राम राम

आपके धोरे इतना संजीदा कलम है, पता कोंन्ये था
इब कविता लिख्नना हि सुरू करो

थारे दिल मा तो घंनी संवेदना भरी है

  सुनीता शानू

Monday, December 22, 2008 12:31:00 PM

या तो गलत बात स ताऊ,बा बिचारी रात भर दरवाजे प खड़ी रई और तं चादर तान कै सोता रैया...

कविता लिखना सभी के बस की बात नही मगर आप इस में भी परफ़ेक्ट हैं ताऊ...

धन्यवाद हमारी ओर से भी सीमाजी को...उन्होने ताऊ की लट्ठ मार(शायद ऎसी ही रही हो) कविता को कोमल हृदय स्पर्शी बना दिया...

  रंजना [रंजू भाटिया]

Monday, December 22, 2008 12:37:00 PM

वाह आप तो कविता भी बहुत अच्छी लिखते हैं ..बढ़िया लिखी है

  संजय बेंगाणी

Monday, December 22, 2008 12:53:00 PM

माफ करणा ताऊ ई सब हमरे पल्ले नी पड़ता. बाकी जोरदार ही लिखा होगा.

  Ratan Singh Shekhawat

Monday, December 22, 2008 1:25:00 PM

ताऊ ये कविता भी जोरदार लिखी अबकी भेंस वाली बात भी कविता में लिखना ! मजा आ जाएगा ! वैसे भी थारी भैंस चाँद से लौटने के बाद कुछ कविता तो करण लागगी होगी ही |

  विनीता यशस्वी

Monday, December 22, 2008 1:51:00 PM

Tauji aap to Kavita bhi achhi likh leto ho.


Waise bahdur ab thik hai aur apna kaam karna wapas shuru kar diya hai.

  डॉ .अनुराग

Monday, December 22, 2008 2:15:00 PM

आपका ये रूप भी अच्छा लगा ,एक अच्छे इंसान तो आप है ही ....

  Pt.डी.के.शर्मा"वत्स"

Monday, December 22, 2008 3:21:00 PM

ताऊ का यो रूप घणा पसन्द आया.बडी जोरदार कविता कह दी.
मणै तो यूं लागै के कदी ताऊ का 'भाई योगिन्द्र मोदगिल'के कम्पीटीशन मे खडै होण का विचार सै.
गद्य,पद्य,हास्य,व्यंग्य,लेखन अर इब कविता,जै सारे धंध्यां मैं इ टांग फसां दी ते बाकी बलागर तैं बेचारे भूख्यां मर जयांगें.

  Gyan Dutt Pandey

Monday, December 22, 2008 3:25:00 PM

बहुत सुन्दर! हमें ज्ञात है कि आप में बहुमुखी प्रतिभा है।

  Abhishek

Monday, December 22, 2008 3:58:00 PM

कांच की खिड़की पे
चुपके से कदम रख.....
कमाल कर दिया ताऊ जी आपने तो. कविता भी अच्छी लगी आपकी.

  दीपक "तिवारी साहब"

Monday, December 22, 2008 4:37:00 PM

चाँद की चांदनी
मेरे पास उतर आई
और असहाय हवा
सारी रात दरवाजे पर खडी
दस्तक देती रही....

बस ताऊ आज तो तिवारी साहब का सलाम ले लो ! आपकी आज तक की सुन्दरतम रचना !

  rukka

Monday, December 22, 2008 4:39:00 PM

अरे वाह वाह ताऊ ! आपका ये रुप भी है ? मजा आगया ! कुछ बात तो है आपकी कविता में ! बहुत धन्यवाद !

  makrand

Monday, December 22, 2008 4:41:00 PM

बहुत धन्यवाद ताऊ इस नए रुप से परिचय करवाने के लिये !

लाजवाब लगी आपकी यह रचना !

  Alag sa

Monday, December 22, 2008 6:47:00 PM

कविता रूपी चांदनी की कोमलता ने तन-मन को सराबोर कर दिया।
बहुत ही सुंदर।

  pintu

Monday, December 22, 2008 7:30:00 PM

wah tau aap to kavita bhi bahut achche likhte hai!
ram ram!

  Arvind Mishra

Monday, December 22, 2008 9:06:00 PM

अरे वाह ताऊ इस लट्ठमार के पहलू में एक दिल भी धड़कता है ? है तो बेहतरीन यह कविता पर इसका श्रेय किसे है सीमा जी को न ?

  दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi

Monday, December 22, 2008 10:34:00 PM

ताऊऊऊऊऊऊ......! कविता में भी लट्ठमारी?

  राज भाटिय़ा

Monday, December 22, 2008 10:40:00 PM

अरे ताऊ यह जुल्म मत करो, आप का लठ्ठ ही चले अच्छा है कभी मिल गये तो दो चार लठ्ठ तो खा सकते है लेकिन कविता....एक तो इतनी अच्छी कविता लिख दी लेनिक साथ मे झुठ भी ध्यान से देखो दरवाजा तो खुला हुआ है, ओर फ़िर इतनी सर्दी मे चादर ओड कर सोये, ओर वो बेचारी दरवाजे पर ठिठुरती रही, आप की कविता को भी सर्दी लग रही है.
राम राम जी की

  अल्पना वर्मा

Tuesday, December 23, 2008 12:24:00 AM

बहुत ही सुंदर भाव लिए है यह कविता.
चित्र भी अच्छा है.
ताऊ जी के लोकप्रिय ताऊ प्रसंगों से हट कर उन का एक नया कोमल पक्ष भी दिखायी दिया.
पहली कविता की सफल प्रस्तुति पर आप को बधाई..

  Mired Mirage

Tuesday, December 23, 2008 2:09:00 AM

बढ़िया कविता लिखी है। थोड़े से शब्दों में इतनी सुन्दर कविता ! वाह!
घुघूती बासूती

  अनुप शुक्ल

Tuesday, December 23, 2008 10:00:00 PM

क्या बात है। ठिठुरा दिया न आपने हवा को इस भयंकर जाड़े में। सीमाजी हमारी भी कवितायें ठीक करके लौटायें ताकि हम भी उसे पोस्ट कर सकें। :)

  ''ANYONAASTI ''

Wednesday, December 24, 2008 4:14:00 AM

तौऊ आप तौ अछै अछै कबियन का चारौ कोना चित्त कै दिहो ,ज्वान लागे रहा

ताऊ उवाच :-:


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