रोम जल रहा था
नीरो चैन की बाँसुरी बजा रहा था
"जोसेफ सेम्युअल" आफिस के गलियारे में
सिगरेट फूंक रहा था !
सेंसेक्स १०८९ पाइंट गिर कर
शेयर बाजार में लोगो को झुलसा रहा था
तो फ़िर "जोसेफ सेम्युअल" गलियारे में
सिगरेट क्यूँ फूंक रहा था ?
मैंने पूछा , ये क्या हो रहा है ?
वो बोला, क्या करूं, सर ?
फूँकने को अब कुछ बचा ही नही
इसलिए सिगरेट फूंक रहा था !





24 comments:
Friday, October 10, 2008 8:49:00 PM
फूँकने को अब कुछ बचा ही नही
इसलिए सिगरेट फूंक रहा था !
सही आकलन, पर भारत में यह भी निषिद्ध है।
काफी दिनों बाद आया, आपसे शुरूवात की, पढ़कर आनंद आ गया। ताऊ को मेरा प्रणाम।
Friday, October 10, 2008 9:31:00 PM
संभल के भाई मार्केट कहां तक जाएगा
कोई नहीं जानता
अगर जानता तो कभी घाटा ही नहीं होता
सो पैसे हैं तो लगाए जाओ
और भूल सको तो भूल जाओ
लेकिन दूसरे मद का पैसा तो
बिल्कुल ना लगाओ
मार्केट गिरा तो घाटे में निकालना पड़ेगा
Friday, October 10, 2008 9:37:00 PM
क्यों ? बीड़ियां किधर छुपा के रखी हैं?
Friday, October 10, 2008 10:09:00 PM
बहुत शानदार | अनूप जी का विचार भी ध्यान देने योग्य है |
Friday, October 10, 2008 10:26:00 PM
सच्ची ताऊ.. बीड़ी किधर है बता भी दो.. ;)
Friday, October 10, 2008 11:57:00 PM
फूँकने को अब कुछ बचा ही नही
इसलिए सिगरेट फूंक रहा था !
ताऊ,
अब आप कविता भी लिखने लगे तो कई जामे जमाए आधुनिक कवियों की दूकान बंद ही करा दोगे.
Saturday, October 11, 2008 12:46:00 AM
फूँकने को अब कुछ बचा ही नही
इसलिए सिगरेट फूंक रहा था !अजी कलेजा क्यो नही कहते.
ताऊ मजा आ गया
राम राम जी की
Saturday, October 11, 2008 6:51:00 AM
बढियां है ,मगर ताऊ यहाँ तो घर फूँक तमाशा तो पहले से ही लोगों का प्रिय शगल रहा है ! इहाँ कौनो फर्क ना आए ताऊ !!
Saturday, October 11, 2008 6:56:00 AM
फिनिक्स (phoenix)की कल्पना करिये बन्धुवर। सब जी उठ्ठेगा।
Saturday, October 11, 2008 8:58:00 AM
मैंने पूछा , ये क्या हो रहा है ?
वो बोला, क्या करूं, सर ?
फूँकने को अब कुछ बचा ही नही
इसलिए सिगरेट फूंक रहा था !
' great sach kha ab kya bcha hai funkne ko, shair markt ne na jane kitne logon ko funk diya hain, excellent presentation.."
regards
Saturday, October 11, 2008 9:20:00 AM
.
फूँक लैण दे, ताऊ यार...
अंतकाल पछताने में बड़ा सुकून दे रही होगी !
Saturday, October 11, 2008 10:35:00 AM
बहुत अच्छा व्यंग है सटोरिये पूंजीवाद पर।
Saturday, October 11, 2008 10:54:00 AM
जो देसी बीडी छोड कर विदेशी सिगरेट पियेगा वो जोसेफ़ बनेगा ही। सटिक लिखा आपने।
Saturday, October 11, 2008 1:26:00 PM
नमस्कार ताऊ जी. ये तो जिंदगी का मौज है जी. जोसेफ घर-बार के साथ फिक्र को भी धुँए में उड़ा रहा है. ये अलग बात है कि आपने बीच में ही पूछ लिया इसलिए उसे बोलना पड़ा.
Saturday, October 11, 2008 2:08:00 PM
सही बात है बीडी वालो की दूकान कैसे चलेगी ?ओर हाँ जी....जरा प्लेस देखकर पीना .अपने रामदौस जी लट्ठ लेकर घूमते है इन दिनों....
Saturday, October 11, 2008 6:48:00 PM
सही बात है ताऊ..बहुत धारदार व्यंग्य है..आपकी लेखनी जिस विधा व क्षेत्र में चलती है, शानदार चलती है।
Saturday, October 11, 2008 7:04:00 PM
फूँकने को अब कुछ बचा ही नही
इसलिए सिगरेट फूंक रहा था !
सही है ताऊ बिल्कुल सही,सटीक और सामायीक है!!
Saturday, October 11, 2008 9:02:00 PM
अब कलेजा जल रहे है शेअर वालो के ताउजी
जियरा धक् धक् करने लगा
दिल धक् धक् करने लगा
और खरीदो पैसा बढाओ
हाय ये क्या हो गया
शेअर को गिराने से
प्यार हो गया
शेअर धारक शेअर देखकर
पागल हो गया
जियरा धक् धक् करने लगा
शेअर गिराने लगा .
तौ जी कभी हमारे ब्लॉग में भी आओ .
आप ताऊ और मै यमराज
हा हा हा
Sunday, October 12, 2008 1:45:00 PM
जै ताऊ की
बिचारे जोसेफ तै सिगरेट पिलवा दी
जो चालान कटग्या तो के भूतनाथ भुगतेगा
भाटिया जी का ब्लाग किसी प्राब्लम म्हं पड़ग्या लाग्गै
खुलता कोनी
इसलिये ताऊ मेरी ये शिकायत उन तक पहुंचाऒ
साथ मैं ५ जरमन लट्ठ का आर्डर भी दे देना
Sunday, October 12, 2008 3:43:00 PM
बेचारा जोसफ@शेयर !
(माइक्रो टिप्पणी)
Sunday, October 12, 2008 3:49:00 PM
बेचारा जोसफ@शेयर
(माइक्रो टिप्पणी)
Sunday, October 12, 2008 4:36:00 PM
kafi sahi kaha ..ab fukane ke liye bacha hi kya hai..par gyan jee ki bat bhi sahi hai phoenix ki kalpana kijiye ummid par duniya kayam hai
Sunday, October 12, 2008 5:55:00 PM
अब तो लगता है कईयों के पास फूँकने को कुछ बचा ही नहीं है, काफी दुखद स्थिति है। पता नहीं लोग मार्केट मे पहले से के हाथ झुलसे होने पर क्यों बार-बार हाथ आजमाते हैं।
Sunday, October 12, 2008 11:14:00 PM
ताऊ जी राम राम
बहुत अच्छा लिखा है आपने लेकिन ये रंग पहली बार देखा है। मतलब कविता रुप से है। बहुत बढ़िया।
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