आज गाम तैं म्हारे बाबू आण आले थे ! सो उणको
लेण ताहीं हम रेलवे सटेशन (STATION) गये थे ! वहां
तैं बाबू नै लेकै हम घर आ गये ! नहा धौकै म्हारै बाबू
नै हम तैं पूछी के भई वो तेरी सुई तैं हवाईजहाज
आली के चीज थी ? उसकै के हालचाल सैं ?
मैं बोल्यो- बाबू वा सुई तैं हवाईजहाज ना सै ! वा तो
सूई तै उडनतश्तरी सै ! बाबू बोल्यो--अर या उडनतश्तरी कित
सै आगी ? मैं बोल्यो - बाबू या तो मन्नै भी ना बेरा ! पर यो
उडन तश्तरी कितै तैं भी निकल कै घर घर जाकै प्रसाद (टिपण्णी)
बांट कै गायब ! छोटे बडे , अमीर गरीब किसी मे कोई भेद भाव नही
करै सै ! और फ़िर कोई प्रसाद लेण आला दिख्या के उसको भी प्रसाद !
किसी तैं भी भेद भाव ना करती यो उडन तश्तरी ! छोटे बडे
सबनै एक जैसा ही प्यार करै सै यो उडन तश्तरी !
और सबका उत्साह वर्धन करती है ये उड़नतश्तरी !
बाबू बोल्या-- हां भई ऐसा काम तो कोई उडन तश्तरी ही कर सकै सै !
जो दुसरे ग्रह तैं आवैं सैं ! इस ग्रह के लोग तो आपस मै
जुतम फ़जीता ही कर सकै सैं ! पर यो तो बता के उस का हुवा क्या ?
इब असल मैं बाबू पुछै था ब्लागरी का किस्सा का ! मैं बोल्या
बाबू थमनै जो पिछला किस्सा रामपुरा पन्च रतनानि का सुणाया
था वो मन्नै थारै नाम तैं ही छाप दिया था ! इब बाबू बोल्यो- अक
भई इब तू एक किस्सा और सुण और उसको भी छाप दे !
मैं समझ गया कि बाबू भी धीरे धीरे ब्लागरिया होता जावै सै !
तभी गाम तैं इतनी जल्दी इबकै आ लिया ! खैर साब इब बाबू नै
किस्सा सुणाणा शुरू किया-- और भिडते ही संस्कृत मै किम्मै मन्त्र
सा मारया ! भई म्हारै किम्मै भी समझ मैं नी आया ! और बाबू
नै मन्त्र सा मारकै पूछया - आया समझ मै ?
मैं बोल्या - बाबू इब थम के गिट्पिट गिट्पिट बोलगे ? म्हारै
किम्मै समझ मै नी आया ! इब बाबू का गुस्सा आस्मान पै चढ लिया !
बाबू लठ्ठ पै हाथ जमाता जमाता सा चिल्लाया - अर सटुपिड (STUPID)
तन्नै संस्कृत समझ मै नी आवै के ? बावली बूच कहीं का !
म्हारै बाबु नै किम्मै संस्कृत बोलण की बिमारी सै !
भई हम नै चुप रहने मे ही भलाई समझी ! अगर बाबू को ये जवाब
देते की बाबू हमको इन्ग्लिश स्कुळ मे आपने ही भेजा था ! तो म्हारै
बाबू का स्वभाव हम जाणै थे ! बाबू का लठ्ठ हाथ मै ही था ! और उधर
पास मैं ही ताई भी इन्तजार मै ही थी कि कब मौका मिलै और भाटिया जी
आल्ले मेड इन जर्मन लठ्ठ की खुजली मिटा दे ! भई ताऊ कै तो इधर कुआं
और उधर खाई !
इब बाबू नाराज होता सा बोल्या - चल ठीक सै ! ठीक सै ! उल्लू कहीं का !
इब बाबू को लठ्ठ के डर से किम्मै समझा भी ना सकै थे कि बाबू
यो सब गालियां भी थमनै ही जा री सै ! खैर साब बाबू बोल्या- हां तो
ये किस्सा राजा भोज के समय का सै ! मैं समझ गया कि आज तो बाबू
के दौ चार लठ्ठ खानै ही पडैंगे ! कारण अगर बाबू का यो किस्सा राजा
भोज के समय का है तो इस किस्से मे कालीदास जी महाराज
जरुर आयेंगे ! और जब कालीदास जी आयेंगे तो संस्कृत जरुर
बोलेंगे ! और कालीदास अगर संस्कृत बोलेंगे तो म्हारै बाबू
कै मुंह तैं ही बोलेन्गे ! ख़ुद के मुंह से तो बालने से रहे !
और हमको संस्कृत का स भी समझ आवै कोनी !
हम को याद आया कि गुरु का कहना नही मानने वाले
की हर युग मे दुर्गती होती आई है ! हमको पिछली बार भी हमारे
गुरुदेव समीर जी ने साफ़ साफ़ मुंह फ़ोड कै समझाया था कि बाबूजी
को तो बख्सो और उनको अपने खेत खलिहान सम्भालने दो !
और गांव वालो से दुआ सलाम करने दो ! पर किस्मत हमारी खराब !
जो गुरुदेव का कहना नही माना और बाबू को इस ब्लागरी के
बारे मे बढ चढ कै फ़ाकालोजी कर दी ! अब ये मुसीबत सर पर ।
इब बाबू नै जो किस्सा सुणाना शुरु किया ही था कि बाबू कै लिये रोहतक तैं
फ़ोन आ लिया ! बाबू फ़ोन सुनने के लिये ऊठ गये तो हम भी किसी तरह
नजर बचा कै वहां तैं उठ कर बाहर बढ लिये ! पर कब तक ! बाबू का किस्सा
और लठ्ठ तैं कब तक बचेंगे ? शाम तक ? चलो शाम तक तो घुमो !
आज बाबू के लठ्ठ शाम को ही खायेंगे ! इब्बी तो सनीमा देखण जायेंगे !
गुरुदेव समीर लाल जी कुछ ऊपाय बताइये ! शिष्य बहुत परेशान सै !
त्राही माम गुरुदेव समीर जी ! इबकै बचाल्यो ! थारै हाथ जौडे !
चाहे तो मेरे से ब्लागरी छोडण की कसम उठवालो ! मैं आयन्दा ब्लागरी नही करूंगा !
पर एक बार मेरे बाबू का यो ब्लागरी का चस्का छुडवाने का उपाय बतादो !
आप तो गुरुओ के भी गुरु हैं ! रक्षा करो गुरुदेव !
त्राहि माम गुरुदेव समीर जी
Tuesday, August 19, 2008 at 9:50 PM Posted by ताऊ रामपुरिया
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About Me
- ताऊ रामपुरिया
- अब अपने बारे में क्या कहूँ ? मूल रुप से हरियाणा का रहने वाला हूँ ! लेखन मेरा पेशा नही है ! थोडा बहुत गाँव की भाषा में सोच लेता हूँ , कुछ पुरानी और वर्त्तमान घटनाओं को अपने आतंरिक सोच की भाषा हरयाणवी में लिखने की कोशीश करता हूँ ! वैसे जिंदगी को हल्के फुल्के अंदाज मे लेने वालों से अच्छी पटती है | गम तो यो ही बहुत हैं | हंसो और हंसाओं , यही अपना ध्येय वाक्य है | हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं ! उस पर लिखा है : कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं ! एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं ! ब्लागिंग का मेरा उद्देश्य चंद उन जिंदा दिल लोगों से संवाद का एक तरीका है जिनकी याद मात्र से रोम रोम खुशी से भर जाता है ! और ऐसे लोगो की उपस्थिति मुझे ऐसी लगती है जैसे ईश्वर ही मेरे पास चल कर आ गया हो ! आप यहाँ आए , मेरे बारे में जानकारी ली ! इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ !
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16 comments:
Wednesday, August 20, 2008 12:36:00 AM
aur karo bloggary.badhiya likha
Wednesday, August 20, 2008 5:16:00 AM
अरे दुखी क्यों हो रहे हैं, हम सबको तो बाबूजी का ब्लॉग अच्छा लग रहा है. ऐसा करें एक नया ब्लॉग सुपर-ताऊनामा के नाम से शुरू कर दें. मुख पृष्ठ पर एक भीमसेनी लट्ठ की तस्वीर लगा दें. लट्ठ वैसे जर्मन भी चल जायेगा मगर साथ में बागडी भैंस ज़रूर दिखनी चाहिए.
Wednesday, August 20, 2008 8:58:00 AM
कोए ढंग की बागड़न मिलज्यै तो वा बी जंचेगी..
ताऊ,
पलूरे वाला किस्सा याद सै के ?
Wednesday, August 20, 2008 9:04:00 AM
हाँ भाई पिलुरे आला किसा के पिलुरा ही
पूरा याद सै ! पर भाई ताऊ नै पिटवाण का
इरादा सै के ? पिलुरे का किस्सा सुन कै ताई
के हाल करैगी ताऊ के ?
Wednesday, August 20, 2008 10:49:00 AM
अब कुछ नहीं हो सकता.. अब या तो लठ काहो या संस्कृत सीखो...
Wednesday, August 20, 2008 2:12:00 PM
ताऊ राम राम ! के हाल सें ?
इब चढ्या नै तू बाबू कै हत्थे !
बोल इब करेगा ब्लागरी ?
सटुपिड...:)
Wednesday, August 20, 2008 2:21:00 PM
ताऊ कौन सा सनीमा देख के आए ?
जब आपके पिताश्री को मालुम पडेगा
की चोरी छुपके सनीमा जाते हो तो
फ़िर लट्ठ तो खावोगे ही ! हर समझदार
पिता अपनी बिगडैल औलाद को ऐसे ही
सुधारता है ! बाबूजी को बहुत धन्यवाद !
आपका बस चले तो सबको बिगाड़ दोगे !
बाबू और ताई दोनों को दुश्मन बना लिया !
वाकई आप ताऊ हो ! :)
Wednesday, August 20, 2008 4:54:00 PM
aapke likhne ka andaj bhut hi nirala hai. jari rhe.
Wednesday, August 20, 2008 8:02:00 PM
इब तो भैय्या घुस गए तो घुस गए यहाँ से निकलना मुश्किल है ....नू करो ...रिश्तेदारो को भी बुलवा लो
Wednesday, August 20, 2008 8:54:00 PM
बालक, जब पहले समझा रहे थे तो हँसी ठ्ठ्ठा समझे थे और अब लट्ठ के डर से भाग रहे हो. यही तो होता है-लट्ठ बड़े बड़े का दिमाग ठिकाने लगवा देता है.
अभी बचवाने का एक ही उपाय है-बाबू जी पुराने ख्याल के हैं, उनको नारी सश्क्तिकरण वाले सारे ब्लॉग मय टिप्पणी पढ़वा दो, खुद ही गांव लौट जायेंगे और फिर ब्लॉग की तरफ कभी झाकेंगे भी नहीं. :)
Thursday, August 21, 2008 12:23:00 AM
राम राम भाई ईब कुछ ना कुछ तो करना ही पडेगा,अगर बाबु एक लठ्ठा मारे गा तो ताई दो मारेगी,रामपुरिया भाई वेसे तो बाप की पिटाई अभी तो दर्द देती हे बाद मे जि्दगी बना देती हे,भाई जब भी बाबु कथा सुनाये जेब मे से मोबाईल का बटन दबा कर टेली फ़ोन की घण्टी बजा दे, बाबु फ़ोन सुनने जाये गा ,वहां कोई नही होगा,ओर फ़िर गुस्से मे आ कर बिना संस्क्रुत सुने ही ....
राम राम भाई
Thursday, August 21, 2008 6:19:00 AM
आपके ब्लॉग की विशेषता यह है कि पोस्ट्स तो मजेदार हैं ही, टिप्पणीकारों की रचनात्मकता भी खूब निखर कर सामने आती है. मैं तो आपकी पोस्ट पढने के बाद भी दिन में एकाध बार यहाँ रोचक टिप्पणियाँ पढने आ जाता हूँ.
शुक्रिया!
Thursday, August 21, 2008 7:23:00 PM
ताऊ हम तो बाहर तैं आज ही लौटे सें ! और इत आकै मालूम पड्या कै बाबू नै थारी ऐसी तैसी कर राखी सै ! ताऊ न्यू डरया नही करते ! बाबू तैं इब के डरणा ? उसतैं आगे का किस्सा भी इब लिखो ! दो दिन होगे , किम्मै ख़बर भी कोनी ?
Thursday, August 21, 2008 7:29:00 PM
ताऊ राम राम ! ताऊ मेरी सलाह मान ! इब ताई
नै लेके बाबू कै साथ रोहतक चला जा ! और वहाँ
खेत मै बैठ के दोनु बाप बेटे पोस्ट लिखणा ! बाबू
भी राजी और थम भी राजी ! इस उम्र मैं बाबू नै
क्यूँ नाराज करै सै ? और खबरदार यदि बाबू को
नारी शशक्ति करण वाले ब्लॉग पढ़वाए तो !
Thursday, August 21, 2008 7:30:00 PM
ताऊ राम राम ! ताऊ मेरी सलाह मान ! इब ताई
नै लेके बाबू कै साथ रोहतक चला जा ! और वहाँ
खेत मै बैठ के दोनु बाप बेटे पोस्ट लिखणा ! बाबू
भी राजी और थम भी राजी ! इस उम्र मैं बाबू नै
क्यूँ नाराज करै सै ? और खबरदार यदि बाबू को
नारी शशक्ति करण वाले ब्लॉग पढ़वाए तो !
Thursday, August 21, 2008 7:35:00 PM
.
ऒऎ ताऊ, इस तरिंयॊं के रो रिया सै ?
ऒऎ जाटों का नाँव-गाँव डुबा कोनी ।
उधर एक छोरा सबनै पछाड़ के मेडल हड़प रैया,
हौर तू जाट कुलकलंकी हरकते दिखाणे लग रैया सै ?
जाट मैदान ना छोड़ते..
ऒऎ बावरे, जाट तो लट्ठ से डरते कोनी !
लट्ठ सै.. तो जाट सै !
जाट तो देखणे को भी लट्ठ.. सोच्चते भी लट्ठ...
खावैं भी लट्ठ.. हौर मारें भी लट्ठ..
ज़र्मनी से खबर आयी सै के दिमाग ही लट्ठ..
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