रमलू, कमलू और शमलू के कारनामे

भाई आज थमनै हम ताई पताशी के किस्से सुनावान्गे
बात न्यूं हुई थी की ताई का आदमी यानी घर आला
ताऊ रक्खेराम कमाने के लिए मण्डी गोविन्दगढ़ गया हुवा था !
और ताई के तीन छोरे थे और भई तीनों छोरे एक नंबर के
ऊत ( बिगडे ) थे ! एक का नाम रमलू , दूसरा कमलू और
तीसरे का नाम था शमलू !
अण तीन्युं उतों ने ताई का जीणा
हराम कर रखा था !


ताई पताशी अण बालकां कै लिए रोज हरी सब्जी, दूध, दही
जैसी गुन कारी चीजें खिलाया करती पर अण तिनु उत छोरों को
ये आछे ना लाग्या करते ! इनको तो पिज्जा बर्गर मुंह लाग
रे थे ! शाम नै रोटी खाण कै बख्त ये छोरे माच खड़े हुए और
बोले हम ना खाते यो हरा साग ! ताई बोली -- अरे छोरो मैं
इतनी मेहनत से यो साग खेता तैं ल्याकै बनाऊं सूँ ! थम खाते
क्यूँ नही हो ? छोरे बदमाश थे पक्के ! बोले -- हरा साग बनाण
की किम्मै जरुरत ही कोनी ! हमनै लेके खेत म चली जाया कर !
और वहीं हमको चरा दिया कर !
ताई को गुस्सा आगया !
और लठ उठाकै उण कै पीछे दौडी पर छोरे हाथ नही आए
उसकै ! ताई उनको गालियाँ देके चुप होगई !

इब ये तिन्युं छोरे चले गए स्कुल ! और साब थोड़ी देर
मै वहाँ पर हालण (भूकंप) आ गया ! सब घर वगैरह गिर गए
और स्कुल की इमारत भी ढह (गिर) गई ! सब बाहर खड़े हो
गए ! इतनी देर मै ये ताई के तिन्युं उत छोरे रमलू, कमलू,
और समलू जोर जोर तैं रुक्के मार मार कै रोण लाग रे !
हैड मास्टर आया और इन को रोते देख कर वो समझा की स्कुल
की बिल्डिंग गिर गई और अब ये कहाँ पढेंगे ये सोच कर शायद
ये बच्चे रो रहे हैं ! सो मास्टर बोला- बच्चों रोवो मत !
मैं जल्दी ही स्कुल की नई बिल्डींग बनवा दूँगा !
तुम चिंता मत करो ! रमलू बोला- अजी मास्टर जी हम इस
लिए थोड़ी रोवैं सें की स्कुल की बिल्डिंग गिर गई !
ये तो भोत बढिया हुवा ! हम रोवैं तो इस लिए सें की
इस भूकंप मै एक भी मास्टर ना मरया !
अगर सारे मास्टर भी
मर लेते तो पढ़ने से पीछा ही छुट जाता !
मास्टर डंडा लेके
इनके पीछे दौडा पर ये उत तो नौ दौ ग्यारह हो लिए वहाँ तैं !


फ़िर कुछ दिन बाद इनका बापू रक्खेराम वापस आ गया !
ताई नै और मास्टर नै इन तिन्युं उतो की शिकायत करी तो
ताऊ रक्खे राम नै अण छोरों की खूब ठुकाई कर दी ! और ये
छोरे घर छोड्कै भाज लिए और शहर जाण आली बस मै बैठ लिए !

इब ये थे तो पक्के उत ! सो बस मै चढ्कै एक छोरी नै
परेशाण करण लाग गे ! भई उसी बस मै एक और ताई
बैठी थी ! उस ताई तैं अण छोरों की बदमाशी बर्दास्त ना
हुई तो ताई नै चिढ कै इस रमलू तैं पूछ्या - अरे ताऊ कित जावे सै ?
रमलू किम्मै चमक्या और किम्मै नी बोल्या ! ताई नै फ़िर पूछ्या
-- र ताऊ कित जावे सै ? रमलू नै सोच्या -- या ताई कम स
कम ५० वर्ष की हो री सै ! और मन्नै ताऊ ताऊ कहण लाग री सै !
छोरे नै किम्मै छोह (गुस्सा) आ गया ! पर फ़िर भी चुप रहा !
अब बस की दूसरी सवारियां भी इनके मजे लेने लग गई !

ताई नै फ़िर तैं पूछ्या-- अरे ताऊ बताता क्यूँ नही के तू कित जावे सै ?
भई छोरा किम्मै गुस्से में तो था ही इबकै खट तैं बोल्या - ताई जावे
तो मैं कित्तै और ही था पर इब सोचू के तेरे लिए एक छोरा ही देख आऊं
भई ताई नै आव देख्या ना ताव ! अण तिन्युं छोरां पकड़कै और
कुटण लाग गी और ताई कै देखम देख बस की बाक़ी छोरियां भी
इनको धोण लाग गी ! छोरे बोले --ताई.... इबकै छोड़ दे आयन्दा
ऐसी छेड़खानी बस में कभी नही करेंगे !


फ़िर ताई नै इनका नाम गाम पूछ्या तै ये छोरे बोले हम तो
घर तै भाज कै आए सें ! तब तो ताई नै इनकी और ठुकाई करी
और इनको इनके घर ले जाकै छोडकै आई !



13 comments:

  योगेन्द्र मौदगिल

Sunday, August 17, 2008 12:12:00 PM

वाह ताऊ, वाह..
हरियाणा की चौपाली जीवन्तता का आपसे बढ़िया प्रस्तुतकर्ता ब्लाग दुनिया में संभवत नहीं है. कोटिशः बधाई............
'ऒह् ले भाई' वाला किस्सा याद हो तो एक दिन वै भी डाल दो
मजा आजेगा

  makrand

Sunday, August 17, 2008 1:06:00 PM

वाह वाह ताऊ छा गए आप तो ! लगता है
दुनिया को हरयाणवी सीखनी ही पड़ेगी !
लगता है ताई ने आपको छोड़ कर बच्चों
को सुधारना शुरू कर दिया है ? :)

  fundebaj

Sunday, August 17, 2008 1:20:00 PM

भूकंप मै एक भी मास्टर ना मरया ...!

ताऊ के जुल्म करण लाग रे हो ?
ताऊ हँसी के मारे पेट दुखै सै !
पोस्ट की साथसाथ पेट दुखना बंद
कराने की दवा भी लिख्या करो ! :)

  rukka

Sunday, August 17, 2008 5:18:00 PM

ताऊ राम राम ! बहुत शानदार किस्सा है !
आप तो बस इसी तरह लिखते रहो !
धन्यवाद !

  Smart Indian - स्मार्ट इंडियन

Sunday, August 17, 2008 6:03:00 PM

ताऊ, जय राम जी की. आनंद आ गया सारा किस्सा पढ़कर.

र ताऊ कित जावे सै?
भगवान् ने हर सेर का सवा सेर तैयार रखा है.

  Anil Pusadkar

Sunday, August 17, 2008 9:54:00 PM

aanand aa gaya tau

  राज भाटिय़ा

Monday, August 18, 2008 12:09:00 AM

वाह ताऊ वाह,मजा आ गया पढ कर, एक से बढ कर एक, लेकिन थे हाजिर जबाब, धन्यवाद

  Dr. Uday 'Mani' Kaushik

Monday, August 18, 2008 11:32:00 AM

सादर अभिवादन
पहले तो हिन्दी ब्लॉग्स के नये साथियों मे आपका बहुत स्वागत है
दूसरे आपकी इस सशक्त रचना के लिए बधाई

चलिए अपने परिचय के लिए , अभी एक गीत मैने अपने ब्लॉग पे डाला ही उसकी कुछ पंक्तियाँ भेज रहा हूँ
देखिएगा
तुम कभी मायूस मत होना किसी हालात् में
हम चलेंगे ' आखिरी दम तक ' तुम्हारे साथ में

है अँधेरा आज थोड़ा सा अगर तो क्या हुआ
आ गयी कुछ देर को मुश्किल डगर तो क्या हुआ
दर्द के बादल जरा सी देर में छँट जायेंगे
कल तुम्हारी राह के पत्थर सभी हट जायेंगे

चाहते हो जो तुम्हें सब कुछ मिलेगा देखना
हर कली हर फूल कल फ़िर से खिलेगा देखना
फ़िर महकने - मुस्कुराने सी लगेगी जिंदगी
फ़िर खुशी के गीत गाने सी लगेगी जिंदगी

घोर तम हर हाल में हरना तुम्हारा काम है
"दीप "हो तुम रौशनी करना तुम्हारा काम है
पीर की काली निशा है आख़िरी से दौर में
अब समय ज्यादा नहीं है जगमगाती भोर में

देख लो नजरें उठाकर ,साफ दिखती है सुबह
देख लो अब जान कितनी सी बची है रात में

तुम कभी मायूस मत होना किसी हालात् में
हम चलेंगे ' आखिरी दम तक ' तुम्हारे साथ में

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा मे
डॉ . उदय 'मणि'
http://mainsamayhun.blogspot.com
(मेरे ब्लॉग पे भी आपका सहृदय स्वागत है , और यदि आपको ब्लॉग समर्थ और सार्थक लगे तो इसे अपनी ब्लॉग लिस्ट मे शामिल कीजिए अतिप्रसन्नता होगी ..)

  जगदीश त्रिपाठी

Monday, August 18, 2008 3:04:00 PM

भाई अपने बचपन की बातें लिखना ठीक नहीं होता.आपने बचपन में जो किया सो किया पर अब तो बचो नहीं अबकी बार कोई ताई ठुकाई कर भौजाई के पास छोड़ आएगी.

  बालकिशन

Monday, August 18, 2008 3:07:00 PM

बापड्या तिनुआं न कुट्वाकर ताई का कालजा प् ठंडक पडली.
इब बिनका कै हाल चल स ताऊ?

  अनुराग

Monday, August 18, 2008 7:03:00 PM

आनद आ गया सै....

  सतीश पंचम

Monday, August 18, 2008 8:49:00 PM

मजा आ गया भई, लगता है सचमुच अब हरियाणवी सीखनी होगी।
बढिया लिखा।

  मदारी

Thursday, May 21, 2009 9:16:00 PM

superb!

ताऊ उवाच :-:


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