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पापा और बिटिया


कोमल कली सी बेटी , पापा के आगंन मे चहकी ।
बनके सबकी लाडली , पुरे घर उपवन मे महकी ।


लाडों से पली, सबकी दुलारी बिटिया स्कूल चली ।
देख कर उस चिडिया को, मन अति आनंदित होता था ।


छोटी सी बेटी, उसके छोटे छोटे हाथ, पापा को दुलराते ।
जैसे कोइ मां अपने बेटे को दुलराती है ।


पापा उसकी छॊटी सी गोद मे सर रख कर खो जाते ।
ऐसा सुखद एहसास सिर्फ़ मा की गोद मे ही होता है ।


पापा बेटी साथ साथ, सुबह घर से स्कूल के लिये जाते ।
दोपहर मे पापा बेटी को स्कूल से लेकर घर आते ।


फ़िर दोनों साथ साथ, खाना खा कर थोडी देर सो जाते ।
कभी बेटी मां बनकर पापा को सुलाती, कभी पापा उसे सुलाते ।


फ़िर उठकर पापा आफ़ीस जाते, बिटीया फ़िर दादी बूआ मां ।
इन सबका प्यार लेती और मानों उनपर एहसान करती ।


शाम को पापा के लोटते ही उन पर लद लेती ।
बहुत मस्ती करती पापा से , और कुश्ती तक लड लेती ।


जीत तो बिटिया कि तय थी , क्योंकी ये तो पापा बेटी मे ।
तय शुदा नूरा कुश्ती होती थी । जीत के बाद बेटी ताली बजाती ।


कभी बेटी मेहरबान होती , तो पापा को भी झूंठ मूंठ मे ।
बोलती ॥ पापा अबकी बार तुम जीतना , मैं हारूंगी ।


ऐसा कभी हुवा है , कभी अपनी बहादुर बेटी से कोई पापा जीता है ।
पापा फ़िर जान बूझकर हार जाते, बेटी कहती क्या पापा ? फिर हार गये ।

3 comments:

  1. बहुत सुंदर, खासकर बेटी वाले पापा के तो दिल को छू गयी आपकी कविता.

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  2. पि सी भाई आपने फिर से अपना जादू बिखेर दिया है...यह कविता बस दिल में बस गई है .....बहुत सही कहा आपने किसी बहादुर बेटी से कभी कोई पापा नही जीत सकता ...

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  3. बहुत सुन्दर रचना !

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