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मदारी, जमूरा और परेशान बन्दर



देखते ही देखते यह सप्ताह भी बीत गया
और मई माह की एक्सपायरी भी हो गई और मजा किम्मै
आया कोनी ।
पुराने मदारियों और बन्दरों को मालूम है कि एक्सपायरी
पै कैसी जोरदार फ़सल कटती थी ।
आजकल तो मालूम ही नही पडता की आज एक्सपायरी है।
बडी मायूसी चारों तरफ़ छाई हुई है ।
नये मदारियों और नये बन्दरों को तो भविश्य
की चिन्ता भी थोडी थोडी सताती सी दिख रही है ।
जमूरों की अभी तक तो चान्दी है । सुना है कई जमूरों ने तो
मदारी बदल लिये हैं ।और कुछ शायद बदल लेंगे ।
ताउ का एक बान्दर तो घुटने से टेकता दिख रहा है ।
देख भाई - तु सै नया बान्दर, तन्नै थोडे से
दिन हुये सैं इस धन्धे मै ।
तन्नै बेरा ना है की ठन्डी करके खावैगा तो ज्यादा मजा आवैगा ।
पुराने मदारियों और बन्दरों को इस खेल का पता है,
इससे भी बदतर हालत देख चुके है ।
यो तो किम्मै ही खराब हालत ना सै ।
नये जमूरों मे ये ही खराब बात है की
जरा सी तेजी होते ही अपने आपको सरकारी समझने लग जाते हैं ।
और लोगों से इस तरह व्यवहार करने लग जाते हैं
जैसे लोगों की किस्मत की चाबी उनके ही पास है ।
और तो और मदारी को भी ये जमूरे आन्ख दिखाने लग जाते हैं।
थम जानते ही हो के मैं किस जमूरे की बात कर रहा हूं ।
यो जमूरा घन्ना पुराना ना सै ।
साल छ महीने हुये सैं इसने यहां इस खेल मे आये हुये
और यो मदारी समझने लग गया अपने आपको ।
इसने बेरा कोनी के बन्दरों से पन्गा नही लिया करते क्यूंकि
बन्दरों के पास काट खाने के दान्त भी होवै सैं ।
जो असली मदारी हैं वो तो कहीं से भी मदारी-पना नही दिखाते ,
अल्बत्ता जरुरत पडने पर अन्दर ही अन्दर खेल जनता को दिखा देते हैं ।
तो भाइ ठीक सै.. जिस दिन यो जमूरा ताउ कै चाले चढ
गया उस दिन इसनै मजा आ ज्यागा । इबी तो इसने नाच कूद लेनै दो ।
कल शाम को ही कपूर साब का फोन आया था, आपने वीक एन्ड पोस्ट का
पूछा तो भाइ थारे खातिर कल जल्दी की कोशीश करी थी
पर ये समझ लो की जल्दी जल्दी मे ७ / ८ घन्टे का काम खराब हो गया ।
सो भाइ ये सारे पोस्ट ही लेट हो रहे हैं। खैर....।
फिर थमनै पूछ्या के यो मारकेट चलेगा या नही, तो यार थम बावलेपन
की बात ना करया करो !
जै ताउ नै यो बेरा होता तो ताउ रोज रोज क्यूं दुकान लगाता ?
एक ही दिन मै के. जी. एन. वालो की
तरह फ़सल काट के घर नही बैठ जाता ?
खैर जब पूछ ही लिया सै.. तो भाइ म्हारा एक घण्णा ढाडा
दोस्त सै पाहवा जी , भाई वो तो आज बावली बावली बात
करण लाग रया था ? किस्सी पन्डत वन्डत के चाले चढ रहा दिखै सै..
एक कोई पन्डत बतावै था.. और वो उल्टे सीधे सरकीट वरकीट
की बात करै था.. भाइ यो पन्डत हर महिने सरकिट लगाने की भविश्यवानी कर दे सै...
एक बार गलती से इसकी बात सही हो गयी थी... उसके बाद इसने आदत सी पडगी सै...
इस तरियां की भविश्य वाणीयां की .. किस्सी दिन यो खुद तो मरैगा ही मरैगा...
ये पक्का समझ ले क्यूकिं क्लाइन्ट तो अब मरनै खातिर बचे कोनी सै ।
और भाई मजे की बात ये की बाकायदा अखबारों मे विग्यापन भी देता है ।
पर भाइ मन्नै लाग सै की असली जड तो तेल की कीमत की है।
दुनियां के सारे देश पेट्रोलियम के २५ से ४० % भाव बढा चुके सैं ।
इब म्हारे देश मै भी हो हल्ला माच रया सै.. सो कब तक नी बढायेन्गे ?
भाइ ताउ नै तो यो कोइ आछे लछ्छन ना दीखै सै..
आगे जो होगा देखेन्गे , और कोई उपाय भी नी दिख रया सै ।
खरचे पानी किस तरह चलेन्गे ये चिन्ता सतान लागरी सै..
क्योन्कि खरचे बढ गे सै किम्मै ज्यादा ही ,
सो अगर ताउ लद्दाराम और ताउ खद्दाराम के जिसे हाल हो गये तो बडी मुश्किल पड ज्यागी ।
हुवा यो था की भई पिछली तेजी शुरु होने के बख्त ही
ताउ लद्दा और ताउ खद्दा की मुलाकात जयसवाल साब तै होगी थी
और जयसवाल साब नै दोनु ताउआं के घण्णे मोटे पिस्से (रुपिया) बाज़ार मे
लगवा दिये थे । और ताउआं के घण्णा मोटा फ़ायदा हुवा था ।
सो दोनु ही ताउ मजे लेने लग गये थे जिन्दगी के...
खेत वेत पे जाणा दिया छोड.. और सारे दिन मार्केट मै बैठे रहते...
नु समझ लो की अपने आपको चेम्पियन समझ्ने लग गये..
लम्बे लम्बे दांव पासे लगाने लग गये थे..
जयसवाल जी ने भी समझाने की भतेरी कोशिश करी पर ताउ नी माने।
और भाइ जब मन्दी शुरु हुयी तो दोनु ताउआं का सब कुछ स्वाहा होग्या ।
नु समझ ले कि ताउ इकन्नी इक्न्नी के मोहताज हो गये ।
ताउ पहले देशी ठेके पे पिया करते थे ।
पिस्से आते ही विजय माल्या साब वाली बिलायती खिन्चनै लग गे थे ।
और इब या हालत हो री सै की नीम और टीकर आली देशी भी
मिल ज्या तो भोत सै । इब भई हुया यो की दोनु ताउआं नै
रेवाडी जाना था और जेब मे धेला कोडी था नी,
सो दोनु बिचार करण लाग गे कि किस तरियां करया जाये..
जाना भी जरुरी था । सो रुपये का जोगाड बैठाने का विचार करण लग गये ।
तो दोनु तय करके रुपिये पिस्से उधार लेण खातिर हरीश गर्ग धोरे पहुन्च लिये..
अब थम पूछोगे की यो गर्ग साब कुण आग्या
तो भई इस गर्ग साब नै शुक्ला जी आछी तरियों जाणते हैं ।
शुक्लाजी नै पहले भी एक ताउ की जमानत गर्ग साब धोरे दे दी थी,
और इब वो ताउ पिस्से देवै कोनी सो शुक्लाजी भी के करै ।
इब गर्ग साब को तो थम जानते ही हो की रुपिये उधार देने वास्ते
कभी मना करे कोनी पर बिना पक्के जमानतदार के देवे भी कोनी ।
और ताउआं की जमानत देवै कोण ? किसका खोटा बख्त आया सै ।
जो ताउआं की जमानत देने की सोच भी ले !
गर्ग साब बोल्या :- ताउ न्यु करो पिस्से रुपये तो थम चाहे जितने लेलो
और चाहे तो वापस भी ना करियो पर जमानत शुक्लाजी की दिलवा दो ।
इब गर्ग साब नै ताउआं सै पिन्ड छुडान का
इससे बढिया तरीका नी मिल सकता था ।
पहली बात तो ये की शुक्लाजी अभी यहां रहते कोनी
और अगर ताउ फोन वोन पे जोगाड कर भी ले तो
शुक्लाजी इब कम से कम ताउआं की जमानत तो देने आला नही सै ।
क्यून्की एक ताउ नै पहले ही घी घाल राख्या सै शुक्लाजी की आन्ख्या मै । ।
सो भई ताउआं का जोगाड जम्या कोनी.
ताउ लद्दा बोल्या - एक काम कर हम दोनुं सायकिल से रेवाडी चालान्गे ।
ताउ खद्दा के यो बात कती एक बार मे ही जच गी।
इब दोनु घर मे से एक पुरानी सायकल ठा ल्याये और लद लिये उस पे ।
पिछे की सीट उस पे थी नही सो ताउ खद्दा डन्डे पे बैठा था,
और ताउ लद्दा पैडल मारता जा रहा था ।
गाम से बाहर निकले ही होन्गे की सामने से ताई ग्यारसी जा रही थी ।
ताई नै देख कै दोनु ताउ कुछ उट्पटान्ग मजाक करने का सोच ही रहे थे,
की ताउ लद्दा का बेलेन्स बिगड गया और सायकल पिछे से
ताई ग्यारसी कै दे मारी !
इब ताई नै आग्या छोह और बोली- अर थम बुढे डान्गर होलिये
थमने शरम नी आती ... कम से कम घन्टी तो मारनी चाहिये थी ?
इब ताउ खद्दाराम बोल्या- अर भाभी पूरी सायकल ही दे मारी
और तू घन्टी मारनै की बात करै सै ?
ताइ होगी नाराज़ और हाथ मे उसके था गन्डाशा सानी काटने का ,
वो ही लेके मारने दोड पडी. पर ताउ भी कम ना थे-
वो उनकी पूजा पाठ कर पाती ,
उसके पहले ही सायकल छोड के और भाज लिये बस अड्डे कि तरफ़......
इब दोनु जणे बतला कर बस मे चढ लिये। बस मे भीड घनी हो रही थी ।
ताउ लद्दाराम तो आगे के दरवाजे से चढ लिया
और ताउ खद्दाराम पाछे के दरवाजे से चढ लिया ।
कन्डकटर आया - ताउ टिकट ? ताउ खद्दा से पूछ्या..
ताउ खद्दा - रे कलन्डर .. भई न्यु समझ लिये कि कोइ गाम की छोरी जावै थी.
(हरयाने मे जिस गाम की बस होवे ,
उस ही गाम की कोई छोरी जावै तो उस तै किराया भाडा ना लिया करते)
कन्डक्टर नै कही- चल ठिक सै ताउ , तु भी के याद करैगा...
थोडी देर मे कन्डक्टर टिकट काटता अगले दरवाजे मे ताउ लद्दाराम के धोरे पहुन्चग्या
बोला- ताउ टिकट.. टिकट ?
ताउ लद्दराम नै पूछी- रे कलेन्डर साब पीछे नै एक ताउ था नै,
उसने टिकट ली के ?
कन्डक्टर बोल्या-- नही ली उसनै ..
ताउ लद्दा नै पूछी-- के बोल्या वो ?
कन्डक्टर बोल्या- उस ताउ नै कही के....
.. नु समझ लियो के कोइ गाम कि छोरी जावै थी !
इब ताउ लद्दाराम बोल्या-- र डाकी तो न्यु भी समझ ले ना
की वो छोरी के साथ उसका बटेऊ भी जावै था !
तो इस तरियां करके फिर पहुन्च गये दोनु ताउ रेवाडी ।
दोनुआं नै भूख लाग री थी जबरदस्त ।
पर गोज (जेब) धोरे इकन्नी भी थी नही ।
सामने ही एक हलवायी कडछी घौटने लाग रा था खाली ।
ताउआ नै सोची के इसनै मामा बना बनुके नाश्ता पानी का इन्तेजाम करान्गे,
पर भई यो भी रेवाडी बस अड्डॆ का हलवायी था ।
यो दिन भर ताउआं नै ही बणाया करता था ।
ताउ लद्दा नै पूछी... रे .. डाकी के बनाने लाग रया सै ?
हलवायी नै जबाब दिया- बावलीबूच (बेवकूफ़) बनाउ सूं !
जबाव सुन के दोनु ताउ समझ गये की यहां दाल गलने आली नही सै ।
दोनु ताउआं की साथ बाद मे क्या क्या हुया यो आगले सप्ताह पढ लियो...
और यदि ताउआं नै इस ताउ सै पहले सम्पर्क किया तो आप
ब्लोग देखते रहना, आपको ताउओं की खबर दे देन्गे ।
वैसे यो सम्भावना पूरी पूरी दीख रही सै कि ताउ हिमान्शु जी से
सम्पर्क जरुर करेन्गे । क्योन्कि आज भी ताउआं नै यो भरोसा सै कि
वो उनकी इस हालत मे मदद जरुर करेन्गे ।
और भई इस सप्ताह हमारे खनडेलवाल जी का कोइ समाचार नही सै..
पिछले सप्ताह तो यो ताउ (खन्डेलवाल साब) भी मदारी
और जमूरों पे भोत भडक रहा था ।
देख भई ताउ खन्डेलवाल साब तू एक बात समझ ले ।
तो तु भी सुखी और सारे सुखी । वो ये सै .....
नाचै कूदै बान्दरी और खीर मदारी खाय...
अपने को तो एक आधा चावल का दाना ही भोत सै...
और जै ज्यादा खीर चाहिये तो बाज़ार मै इबी घने मदारी घूम रहे हैं ।
डलवा ले रस्सी किस्सी नये मदारी से गले मै..
पर भई इस ताउ नै लगता है कि इस बार बान्दर भागेन्गे जरुर !
अच्छा भाइ तो इस हफ़्ते की राम राम ...
और कल से काम धन्धे पर लगना सै..
आगले हफ़्ते फ़िर मिलान्गे॥

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