बन्दर बडी अकड मे चश्मा वश्मा लगाके. और शूट वूट पहन कर,
छाता ले के बडे तैश मे मदारी के केबिन मे घुस गया ।
मदारी अपने फोन पे किसी से बतिया रहा था । इस तरह अचानक
बन्दर को घुसते हुये देखा तो बोला-
आ भई बन्दर आ ! भई घनै दिन मे दिख्या ! कहां का
सैर सपाटा कर आये ?
बन्दर -- सैर सपाटा काहे का ! खाने के ठिकाने नही,
पर तुम्हारी तो मस्ती है । बन्दर मरे या जिये ।
मदारी ने सोचा- बन्दर कुछ नाराज सा है.. चलो इसको बीडी
वीडी पिला पिलूकर चलता करते हैं !
मदारी - क्युं भई बन्दर बीडी पिवैगा ?
बन्दर - ना जी ना ? थारी बीडी थमनै मुबारक !
मदारी - के बात सै, भई बन्दर आज तो
तू बडा उखडा उखडा सा दिखै सै ?
बन्दर - थानै मालूम सै की मैं सिर्फ़ डनहिल किन्ग साईज
सिगरेट ही पीता हूं । फ़िर बीडी के लिये
पूछ्ने का मतलब ? और वो भी थारै केबिन
मै आगये तो !
मदारी ने देखा कि आज बन्दर का मूड खराब
दिख रहा है सो तुरन्त सिगरेट निकाल कर बन्दर
के सामने पेश की और पास ही एक जमुरा
बैठा था, उससे कहा... जमुरे !
जमुरा - हुक्म मेरे आका ?
मदारी - जमुरे जरा बन्दर के लिये नाश्ता तो बुलवावो !
इतने मे बन्दर बोला नही नही मुझे नही करना
तुम्हारा नाश्ता पानी । मैं तो जा रहा हूं ।
मदारी को लगा आज कुछ गड बड है । सो
बोला - अरे यार बैठो भी बन्दर साब ।
बन्दर - अच्छा तो हम साब कब से हो गये ? हम जिये
या मरे तुमको उससे क्या ? आज तक भी कभी पूछा कि
यार बन्दर भाई, तुम जिन्दा हो या मर गये ?
बन्दर जिये या मरे ! आपने कभी पूछा ? कभी नही ।
आप की बात छोड भी दूं, तब भी तुम्हारे जमुरे भी
मेरी नही सुनते । मैं दिन भर धूप में तमाशा दिखाता हूं ।
पर तुम्हारे जमुरे मेरा फोन भी नही उठाते ।
और तो और मुझको लिमिट भी नही देते ।फ़िर मैं
खेल किस तरह दिखाऊं ? जितनी लिमिट मिलती है उतने खेल
से कुछ कमाई होती नही । मतलब ये कि हमको तो पागल
समझ रखा है । तुम्हारे जमुरे चाहे जब माल काट देते हैं ।
ठीक है मैं तो जा रहा हूं ।
ये भी साली कोई तमीज हुयी ?
बन्दर पुरी तरह तैश मे आ चुका था ।
मदारी - अरे भई ! । कहां चल दिये बन्दर साब ?
बन्दर - मैं तो जा रहा हूं, नया मदारी खोजने ।
खोजने क्या , पुराने जमुरे ने ही मदारी की दूकान खोली है
मैं तो अब उसके साथ ही खेल दिखाऊंगा
।
मदारी भी खेला खाया था । इसके जैसे कई बन्दर पाल के
छोड चुका था । और इससे भी बडे बन्दर तो क्या लन्गूर उसने
अब भी पाल रखे थे । सो बिल्कुल शातिर अन्दाज में बोला-
अरे यार बन्दर साब आप तो बिल्कुल ही नाराज हो गये ।
ऐसी मदारी बदलने वाली कौन सी बात हो गयी ?
बन्दर : - क्युं आपने कभी मेरे राशन पानी का इन्तजाम किया ?
कभी व्हिस्की सोढा के लिये पूछा कि इस महिने
तुमने खाया पीया या नही । दो महिने तो पिये होगये ।
तुमसे अच्छा तो पुराना मदारी ही था जो महीने के राशन पानी
और खम्बे का इन्तजाम बिना कहे ही कर देता था । अब उसकी
कीमत मालूम पड रही है । उसके यहां रहते तो मैने उसकी कद्र
कभी की नही । अब मालूम पडा है की वो ही ठीक था ।
और हमारे साथ का एक ताउ बन्दर सही ही कहता है कि
नाचै कुदै बान्दरी और खीर मदारी खाय । तो अब ऐसा नही चलेगा ।
खीर मे से एक दो कटोरी नही तो आठ दस चम्मच हमको भी
देनी चाहिये । पर तुमको तो पुरी खीर का भगोना ही पीने की
आदत पड गयी है । अपने को ये बिल्कुल ही मन्जूर नही है ।
बन्दर अब तक काफ़ी तैश मे आ चुका था ।
बीच मे मदारी ने टोका.... अरे बन्दर भाई सुनो तो ..
पर बन्दर सुनने को तैय्यार ही नही हो रहा था ।
फ़िर आगे बोल पडा.. बोल तो क्या पडा .. बस फ़ट ही पडा ।
बोला- और तुम्हारे जमुरॊं से कहो कि मेरा फोन उठाये और मेरी रस्सी
जो तुमने ५ फ़ीट की कर रखी है उसको खेल दिखाते समय कम से
कम २० फ़ीट की करवावो । और दारु पानी का इन्तजाम समय से करवावो ।
बन्दर एक सांस मे ही ये सारी बातें कह गया ।
मदारी भी घुटा हुवा था-- ठन्डे छींटे मारते हुये बोला-
अरे यार बन्दर भाई आपके लिये तो मेरी जान हाजिर है ।
जहां तक आपकी रस्सी का सवाल है तो आप खातिरी रखॊ..
कल से ही खेल दिखाते समय आपकी रस्सी मैं ही थामुंगा ।
और २० फ़ीट तो क्या आपकॊ रस्सी मे जितनी छूट (लिमिट)
चाहिये उतनी मैं दूंगा । और जहां तक दारु पानी और खर्चे
का सवाल है तो मुझे आप थोडा सा समय दो मैं ऊपर मेरे
बाजीगर (बास) से बात करके करवाने की पक्की समझो ।
आप चिन्ता मत करो । आप तो पब्लिक को बढिया खेल
दिखाते रहो । बाकी मै सम्भाल लूगा ।
बन्दर भी अब थोडा ठन्ढा पड चुका था । बन्दर ने भी सोचा चलो
घुडकी का कुछ तो असर होगा । और सोचा की ये मदारी
यों ही छोडने वाला भी नही है अगर इसने ५ फ़ीट की रस्सी
को छोडने के बजाये और घुटने के पास बांध लिया तो
और दम घुट जायेगा । सो बन्दर भी खींसे निपोरता हुवा मदारी
के केबिन से निकल लिया और मदारी ने अपने जमुरे से
विचार विमर्श शुरु कर दिया ।
पाठको आपको इसके बाद का हाल चाल भी समय समय पर
हम बताते रहेंगे ।
मदारी और बन्दर
Wednesday, June 4, 2008 at 5:57 PM Posted by ताऊ रामपुरिया
Labels: जरा हंस ले
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About Me
- ताऊ रामपुरिया
- अब अपने बारे में क्या कहूँ ? मूल रुप से हरियाणा का रहने वाला हूँ ! लेखन मेरा पेशा नही है ! थोडा बहुत गाँव की भाषा में सोच लेता हूँ , कुछ पुरानी और वर्त्तमान घटनाओं को अपने आतंरिक सोच की भाषा हरयाणवी में लिखने की कोशीश करता हूँ ! वैसे जिंदगी को हल्के फुल्के अंदाज मे लेने वालों से अच्छी पटती है | गम तो यो ही बहुत हैं | हंसो और हंसाओं , यही अपना ध्येय वाक्य है | हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं ! उस पर लिखा है : कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं ! एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं ! ब्लागिंग का मेरा उद्देश्य चंद उन जिंदा दिल लोगों से संवाद का एक तरीका है जिनकी याद मात्र से रोम रोम खुशी से भर जाता है ! और ऐसे लोगो की उपस्थिति मुझे ऐसी लगती है जैसे ईश्वर ही मेरे पास चल कर आ गया हो ! आप यहाँ आए , मेरे बारे में जानकारी ली ! इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ !
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