इंटरवेळ होते ही हमने तडी मारने का प्रोग्राम बना लिया। इंटरवेळ हुवा वैसे ही अपने २ बसते झोले उठाकर निकलने का जुगाड़ करने लगे। पर पता नहीं , संयोग से या जानबूझकर हमारी कक्षा के दरवाजे से लग कर हमारे इंग्लिश के मास्टर साब स्व-नाम धन्य श्री अमरनाथ जी शर्मा खड़े होकर किसी से बात कर रहे थे। वो इस तरह खड़े थे की अगर हम झोला लेकर निकलते तो उनकी नज़र हम पर पड़ ही जाती और वो फीर जो हमारी पूजा पाठ करते , उसकी इच्छा नही थी। सो मन मार कर बैठ गए । और घर से लाई घंटी (प्याज) और रोटी झोले मे से निकाल कर वहीं कक्षा मे ही बैठ कर खा ली। कलेजा धक् धक् कर रहा था। जैसे बकरा कसाई का इंतज़ार करता है वैसे ही नए मास्टर जी का इंतज़ार करने लगे। इस कक्षा के हमारे गाँव के हम ९ छोरे थे और नौ रत्न के नाम से जाने जाते थे।
खैर साब इंटरवेल खत्म हुवा और नये मास्टर जी कक्षा मे प्रकट हुये. गंगाराम (डंडा) हाथ मे पकड़े हुये पहला ही सवाल किया- तुम मे से नौ रत्न कौन कौन हैं , अपनी 2 जगह पर खड़े हो जाये। मुगलिया शैली मे फर्मान जारी हुवा। अब जिल्ले इलाही के सामने सिवाय खडे होने के चारा ही क्या था. स्कूल मे तो हम उनका कुछ बिगाड नही सकते थे। और बाहर हमने कोइ कसर कभी छोड़ी नही जो मास्टर जी को आज तक मालूम नही होगा की हमने उनसे बदला लेने के लिये क्या 2 गुल खिलाये. ये सब आप आगे जाकर पड़ेगे । हम नौ के नौ सबसे पीछे की लाइन मे इक्कठे ही बैठते थे. मन मार कर खडे हो गये. ( अब समझ आया की इंग्लिश वाले मास्टर जी क्यों हमारा रास्ता रोक के खड़े थे ? अंग्रेजी वाले मास्टर जी से भी हमारा पुराना हिसाब कीताब था. हम उसके बस मे तो आते नही थे तो नये मास्टर साब को सीखा पडाकर भेजा था। अंग्रेजी वाले मास्टर जी के साथ के कार नामे भी आप आगे आगे पढ़ पायेंगे। तो तुम अपना 2 नाम बतावो। हमने अपने २ नाम बता दीये। मास्टर जी जयपुरिया लहजे मे कुछ 2 हर्-यानवी मिक्स हिंदी बोलता था। फिर बोला - देखो भइ .. तुम्हारी करतुते मुझको मालूम पड गयी हैं . तुम आज से सुधर जावो वरना तुम्हारी खैर नही ... ...चलो अब बैठ जावो। अब 15 मिनिट ही पीरियड मे शेष बचे है हम कल से पढाई शुरु करेंगे। हमने सोचा चलो इस आफत से पीछा छूटा.. इतने मे हमारा नौ रत्न साथी राम-जी लाल लंगडॉ बुद बुदाया ... सुसरे कल कोई आयेगा तब तो पढायेगा... और शायद एक दो गाली वाली दी... मास्टरजी बोले ... कौन बोला ..... सब खामोश्.... अचानक मास्टर जी बोले अभी 15 मिनिट बचे हैं तुमको एक महा भारत की कहानी सुनाता हूँ . मास्टर जी की इस कहानी ने हमारे सबसे बड़े नौ रत्न राम जी लाल लंगडा जिसको हम प्यार से राम्-जिडा भी कहते थे की दुसरी टाँग भी तुड़वाने मे कोई कसर नही रखी। मास्टरजी --- हाँ तो ये कहानी महाभारत से है. धीरे से रामजीडा बुद बुदाया..... पहले ही दिन महा भारत कर रहा है आगे आगे और के के करेगा। मास्टरजी ... कौन बोला .. कोई बोला क्या ? ... कक्षा मे सन्नाटा ..............हाँ तो ये कहानी कंस और कृष्ण की है. जब कंस को मालूम पड़ा की उसको मारने के लिये उसकी बहन देवकी के गर्भ से
संतान पैदा होगी तो उसने बहन और बहनोई को जेल मे डाल दीया। इधर हम सारे ही पक चुके थे पर राम-जिडा कुछ ज्यादा ही पका हुवा था... धीरे से बुद बुदाया... तो तेरे बाप का क्या ले लीया ... डाल दीया तो डाल देने दे ... तु भी तेरे घर जा और हमने भी जाने दे. असल मे रामजिडे को चिलम पीने की तलब लग रही थी. इस करके उसका माथा ही काम नही कर रहा था. मास्टर साब तेज आवाज मे चिखे ... ये कौन बद तमीज बोल रहा है. यो मेरी लास्ट वॉर्निंग है... इबके आवाज आयी तो मेरे से बुरा कोई नही होगा। हाँ तो देवकी के पहला बालक हुवा और कंस ने उसको जहर दिलवा कर मार डाला. ... फीर दुसरा बालक पैदा हुवा उसको पहाडी से फिकवा कर मरवा दीया..... फिर तीसरा ................अब रामजीलाल लंगडे ने हाथ खडा कर दीया..... ...... रामजीलाल लंगडा--- जीईईई वूऊऊओ ...... मास्टर साब थोडा नाराज होके बोले... पूछो कुछ पूछना है तो..... रामजिडे की तो हड्डियाँ कुल् बुला रही थी टूटने के लिये.... रामजीडा बोला- मास्टर जी .. एक बात बतावो के जब कंस को ये मालूम था की उसकी बहन से होने वाला बच्चा ही उसे मारेगा तो उसको अपने बहन और बहनोई को अलग अलग जेल मे बंद करना चाहीये था ना.... उनको एक जगह क्युं रखा... अलग 2 जगह रखता तो ना बच्चे पैदा होते और ना यो खून खराबा होता. और हम भी अपने घर जा के चिलम पी के कुऐ पे काम करते.. खुद भी दुखी हो लीया और जमाने ने दुखी कर दीया। इस बात का असली मतलब समझ मे आते ही मास्टर साब तो लाल पीला हो लिया.. तुम अभी जड मे से भी नीकले नही हो और ऐसी 2 गंदी 2 बाते करते तुमको शरम नही आती ? और इसी बात पर मास्टर साब ने रामजिडे को खूब मारा... दो डंडे टूट गये और मास्टर जी भी हांपने लग गये तब कहीं जाकर रामजिडे की कुटायी बंद हुयी. सारी कक्षा के छात्र अंदर ही अंदर कांप रहे थे. रामजीडे ने इस बार की कुटाई का बहुत दुख और अफसोस किया और आगे जाकर मास्टर जी की छाती पे कैसे 2 मूंग दले ये सब आप आगे के अंको मे क्रमशः पढेंगे
शेष अगले भाग में .....
स्कूल के सुनहरे दिन भाग्-2
Tuesday, May 27, 2008 at 2:03 AM Posted by ताऊ रामपुरिया
Labels: आत्मकथा
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About Me
- ताऊ रामपुरिया
- अब अपने बारे में क्या कहूँ ? मूल रुप से हरियाणा का रहने वाला हूँ ! लेखन मेरा पेशा नही है ! थोडा बहुत गाँव की भाषा में सोच लेता हूँ , कुछ पुरानी और वर्तमान घटनाओं को अपने आतंरिक सोच की भाषा हरयाणवी में लिखने की कोशीश करता हूँ ! वैसे जिंदगी को हल्के फुल्के अंदाज मे लेने वालों से अच्छी पटती है | गम तो यो ही बहुत हैं | हंसो और हंसाओं , यही अपना ध्येय वाक्य है | हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं ! उस पर लिखा है : कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं ! एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं ! ब्लागिंग का मेरा उद्देश्य चंद उन जिंदा दिल लोगों से संवाद का एक तरीका है जिनकी याद मात्र से रोम रोम खुशी से भर जाता है ! और ऐसे लोगो की उपस्थिति मुझे ऐसी लगती है जैसे ईश्वर ही मेरे पास चल कर आ गया हो ! आप यहाँ आए , मेरे बारे में जानकारी ली ! इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ !
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