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स्कूल के सुनहरे दिन भाग्-2

भाग -1    अब आगे....

इंटरवेल होते ही हमने तडी मारने का प्रोग्राम बना लिया.  इंटरवेल हुवा वैसे ही अपने २ बसते झोले उठाकर निकलने का जुगाड़ करने लगे.  पर पता नहीं , संयोग से या जान बूझकर हमारी कक्षा के दरवाजे से लग कर हमारे इंग्लिश के मास्टर साब स्व-नाम धन्य श्री अमरनाथ जी शर्मा खड़े होकर किसी से बात कर रहे थे.  वो इस तरह खड़े थे की अगर हम झोला लेकर निकलते तो उनकी नज़र हम पर पड़ ही जाती और वो फ़िर जो हमारी पूजा पाठ करते , उसकी इच्छा नही थी.  सो मन मार कर बैठ गए.  और घर से लाई घंटी (प्याज) और रोटी झोले मे से निकाल कर वहीं कक्षा मे ही बैठ कर खा ली.  कलेजा धक् धक् कर रहा था. जैसे बकरा कसाई का इंतज़ार करता है वैसे ही नए मास्टर जी का इंतज़ार करने लगे.  इस कक्षा के हमारे गाँव के हम 9 छोरे थे और नौ रत्न के नाम से पूरे स्कूल में प्रसिद्ध थे जैसे बादशाह अकबर के नौ-रत्न थे यानि हर फ़न के माहिर.

खैर साहब इंटरवेल खत्म हुवा और नये मास्टर जी कक्षा मे प्रकट हुये. गंगाराम (डंडा) हाथ मे पकड़े हुये पहला ही सवाल किया- तुम मे से नौ रत्न कौन कौन से  हैं?...., अपनी 2 जगह पर खड़े हो जाये.  मुगलिया शैली मे फर्मान जारी हुवा.  अब जिल्ले इलाही के सामने सिवाय खडे होने के चारा ही क्या था?  स्कूल मे तो हम उनका कुछ बिगाड नही सकते थे.  और बाहर हमने कोइ कसर कभी छोड़ी नही जो मास्टर जी को आज तक मालूम नही होगा की हमने उनसे बदला लेने के लिये क्या 2 गुल खिलाये?  ये सब आप आगे जाकर पड़ेगे.

हम नौ के नौ रत्न  सबसे पीछे की लाइन मे इक्कठे ही बैठते थे. मन मार कर खडे हो गये. ( अब समझ आया की इंग्लिश वाले मास्टर जी क्यों हमारा रास्ता रोक के खड़े थे ?)  अंग्रेजी वाले मास्टर जी से भी हमारा पुराना हिसाब किताब था. हम उनके काबू मे  आते नही थे तो उन्होंने  नये मास्टर साब को  सिखा पढाकर यानि हमारे  सारे गुणगान पहले ही बखान कर दिये थे.  अंग्रेजी वाले मास्टर जी के साथ के कार नामे भी आप आगे आगे पढ़ पायेंगे.

आते ही मास्साब ऊंचे लहजे में बोले - हां  तो तुम अपना 2 नाम बतावो.  हमने अपने 2 नाम बता दिये.  मास्टर जी जयपुरिया लहजे मे कुछ 2 हरयाणवी मिक्स हिंदी बोलते  थे.  फिर वो  बोले - देखो भइ .. तुम्हारी करतुते मुझको मालूम पड गयी हैं . तुम आज से सुधर जावो वरना तुम्हारी खैर नही ... ...चलो अब बैठ जावो.  अब 15 मिनिट ही पीरियड मे शेष बचे है हम कल से पढाई शुरु करेंगे.

हमने सोचा चलो इस आफत से पीछा छूटा.. इतने मे हमारा नौ रत्न साथी रामजी लाल लंगडॉ बुद बुदाया ... सुसरे कल कोई आयेगा तब तो पढायेगा... और शायद एक दो गाली भी  दी... मास्टरजी बोले ... कौन बोला ..... सब खामोश्.... अचानक मास्टर जी बोले अभी 15 मिनिट बचे हैं तुमको एक महा भारत की कहानी सुनाता हूँ.

मास्टर जी की इस कहानी ने हमारे सबसे बड़े नौ रत्न राम जी लाल लंगडा जिसको हम प्यार से रामजीडा  कहते थे.  की दुसरी टाँग भी तुड़वाने मे कोई कसर नही रखी.

मास्टरजी बोले  --- हाँ तो ये कहानी महाभारत से है. धीरे से रामजीडा बुद बुदाया..... पहले ही दिन महा भारत कर रहा है आगे आगे और के के करेगा?

मास्टरजी फ़िर बोले ... कौन बोला .. कोई बोला क्या ? ... कक्षा मे सन्नाटा ..............हाँ तो ये कहानी कंस और कृष्ण की है. जब कंस को मालूम पड़ा की उसको मारने के लिये उसकी बहन देवकी के गर्भ से
संतान पैदा होगी तो उसने बहन और बहनोई को जेल मे डाल दीया.

इधर हम सारे ही पक चुके थे पर रामजीडा कुछ ज्यादा ही पका हुवा था... धीरे से बुद बुदाया... तो तेरे बाप का क्या ले लिया ... डाल दिया तो डाल देने दे ... तु भी तेरे घर जा और हमने भी जाने दे. असल मे रामजीडे को चिलम पीने की तलब लग रही थी. इस करके उसका माथा ही काम नही कर रहा था.

मास्टर साब तेज आवाज मे चीखे ... ये कौन बद तमीज बोल रहा है. यो मेरी लास्ट वॉर्निंग है... इबकै आवाज आयी तो मेरे से बुरा कोई नही होगा.  हाँ तो देवकी के पहला बालक हुवा और कंस ने उसको जहर दिलवा कर मार डाला. ... फ़िर दुसरा बालक पैदा हुवा उसको पहाडी से फिकवा कर मरवा दीया..... फिर तीसरा ................ इसी बीच  रामजीलाल लंगडे ने सवाल पूछने की मुद्रा में  हाथ खडा कर दीया..... ...... रामजीलाल लंगडा--- जीईईई वूऊऊओ ...... मास्टर साब थोडा नाराज होके बोले... पूछो कुछ पूछना है तो.....

रामजीडे की तो हड्डियाँ कुल् बुला रही थी कुटने के लिये.... रामजीडा बोला- मास्टर जी .. एक बात बतावो के जब कंस को ये मालूम था की उसकी बहन से होने वाला बच्चा ही उसे मारेगा तो उसको अपने बहन और बहनोई को अलग अलग जेल मे बंद करना चाहिये था ना?.... उनको एक जगह क्युं रखा... अलग 2 जगह रखता तो ना बच्चे पैदा होते और ना यो खून खराबा होता.... और हम भी अपने घर जा के चिलम पी के कुऐ पे काम करते होते..... खुद भी दुखी हो लिया और जमाने को भी  दुखी कर दिया.

इस बात का असली मतलब समझ मे आते ही मास्साब  तो लाल पीला हो लिये बोले.. तुम अभी जड मे से भी नीकले नही हो और ऐसी 2 गंदी 2 बाते करते तुमको शरम नही आती ? और इसी बात पर मास्टर साब ने रामजिडे को खूब मारा... दो डंडे टूट गये और मास्टर जी भी हांपने लग गये तब कहीं जाकर रामजिडे की कुटायी बंद हुयी. सारी कक्षा के छात्र अंदर ही अंदर कांप रहे थे. रामजीडे ने इस बार की कुटाई का बहुत दुख और अफसोस किया और आगे जाकर मास्टर जी की छाती पे कैसे 2 मूंग दले ये सब आप आगे के अंको मे क्रमशः पढेंगे.....

शेष अगले भाग में .....






4 comments:

  1. तब मास्टर मास्टर नहीं कसाई होते थे...

    असल बात ये है तब हम भी गधों से कम नहीं थे... >)

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  2. बाबा हम तो पैदायशी गधों के ताऊ थे तो क्या खाक पढते लिखते?:)

    रामराम.

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  3. पढने के बाद आज महीनों बाद इतनी हंसी आई कि रोके ही नहीं रुक रही :)

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