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पोथी पुराणम्

अध्यातम का नाम आते ही एक तसवीर सामने आती है, गम्भीर , और बुढे आदमी ओरतों द्वारा परमात्मा को याद करने का काम्। यानि मरते हुये लोगों द्वारा डर के मारे परलोक सुधारने का काम्। और मजे की बात तो ये की इनको ये भी पता नहीं की मरने के बाद ये किसके पास जायेंगे ईश्वर या शैतान । एक बार ऐसा हुवा की पलटु गंभीर रूप से बीमार पड गया । उसकी बीबी अशरफी और बच्चों को यकीन हो गया की इसका अंत समय आ गया है. सो उन्होने आसपडोस के लोगो को और रिश्तेदारों को भी बुलवा लीया. उसकी खाट के चारों तरफ भीड़ हो रही थी. पंडितजी को भी बुला लिया. पंडितजी ने आते ही गाय के गोबर से जमीन लिपवा कर पलटु को खटिया से निचे उतरवा दीया. और पलटु को गीता के श्लोक सुनाना शुरु कर दिया। फीर पंडितजी ने पलटु से कहा -- देख भाइ पलटु अब तेरा ये आखिरी समय है॥सो तुने जीवन मे जो भी गुनाह किये हों उन सबकी माफी परमात्मा से मांग ले॥ अंत समय की पुकार परमात्मा अवश्य सुनते है. पलटुराम को सिर्फ बीमारी की वजह से थोडी कमजोरी थी इस वजह से बोल नही पा रहा था. सो घरवालों को लगा की मरने वाला है इस कारन उसकी मरने की तैयारी कर ली थी. पर जब पंडीतजी ने उसे परमात्मा से माफी माँगने का कहा तो उससे रहा नही गया. जोर लगा के बोला... अरर पंडीत् तु मेरे को बता की मरने के बाद यदि ईश्वर की जगह शैतान के राज मे पहुंच गया तो क्या होगा. भई मैं तो दोनों मे से किसी से भी दुशमनी नही ले सकता ॥ ईश्वर के पास गये तो उसकी जय जय और शैतान के राज मे गये तो उसकी जय जय्. अपन तो रिस्क नही लेते. पलटुराम तो सीधा सादा देहाती आदमी है वो ही रिस्क लेने को तैयार नही है. और तुम पुरी रिस्क उठा रहे हो. हमारे तथाकथित बाबा महात्माओ ने धर्म को मजाक बना दीया हैबल्कि कहना चाहिये कि धर्म को भय रुपी प्रोडक्ट मे बदल दिया है. ऐसा लगता है कि ये सारे बाबा महात्मा IIM से फ़र्स्ट क्लास MBA पास आउट है. सब कुछ manage कर रहे हैं कभी कभी हाई रिस्क ( लड़कियों वगैरह की) हो जाती है. उस वक्त तो इनकी रिस्क मैनेजमेंट क्षमता देखने लायक होती है, जैसे की बडे बडे कार्पोरेट घरानो या सरकार मे संकट के समय manage कीया जाता है. ये इसी भय रुपी प्रोडक्ट को बेचकर माल बना रहे है. सुनने मे आया है की इन का काफी सारा माल ब्याज पर भी चलता है. धन्य हो धर्म के ठेकेदारो की। आप किसी भी चैनल पर देख लिजिये ये बाबा हर जगह अपनी दुकान चलाते मिल जायेंगे. और दिखावा ऐसा करते हैं की ये ज्योतिश , गंडे, ताविज या यंत्र वैगरह तो सिर्फ जनता की भलाइ के लिये देते है. वर्ना तो ये पहुंचे हुये सिद्ध है। उदाहरण के लिये एक बाबा को एक दिन सुनने का मोका या कहे सोभाग्य मिला. चैनल सर्च करते करते हाथ रुक गया. बाबा का उपदेश चालु था. ओशो के एक प्रवचन को यो का यों दोहरा रहे थे .. मुझे तुरत उस प्रवचन का स्मरण हो आया . तो मैं भी बाबा की आगे की कारगुजारी सुनने के लिये देखता रहा. बाबा ज्ञान झाडने के बाद असली मकसद पर आ गये और अंत मे कहा ... मुझे ये सब तुमको जगाने के लिये कहना पड रहा है. ये ज्योतिश वगैरह तो बहाना मात्र है. इसके माध्यम से मैं तुमको जगाने आया हू. फिर बाबा ने ओशो स्टाइल मे हि कहा... आज इतना हि.... या शेष कल ..... बाबाजी के विलुप्त होते ही बडा सा विज्ञापन चालू हुवा. जिसमे बाबा ने जन्म पत्री देखने का 3100 रु. कोइ एक प्रश्न पूछने के 1100 रु. दो जन्म्पत्री दिखाने पर एक मुफ्त्. यानि दो पर एक फ्री. लगता है ये बाबा लोग परमात्मा के लिये लोगो को कम जगाते है. खुद की जेब भरने के लिये ज्यादा। ये कोइ सिद्ध बाबा नही है. इनकी सिद्धि सिर्फ इतनी है की ये रात को ओशो के किसी प्रवचन का घोटा मार लेते है. और अगले दिन जस का तस बोल देते है. कोइ कोइ बाबा तो अकल से इतने पैदल है की ओशो की कापी टु कापी बिना मिलाये ही जनता के मगज पर दे मारते है. और कोइ कोइ थोडे स्मार्ट है जो नाम, स्थान और पात्र बदल कर मिला मिला कर देते है। अब इन बाबाओ की दुकान भी जनता ही चलवाती है. जनता जान बूझकर पागल रहना चाहती है, क्योंकि समझदार होने से काम करना पड़ेगा और जब बाबाओ के गंडे तावीज और पूजा पाठ से काम चल जाये तो जान बूझकर पागल बने रहने मे ही फायदा है। और चुंकी ये खुद का पाला हुवा भ्रम है तो ये दुसरे से दूर भी नही होगा. अब तुम्हारी तक्लीफे इन बाबाओ से दूर ना हो तो भगवान भी है ही दोषारोपण करने के लीये. एक सुविधा है इस बात के लिये, भगवान भी. अगर तुम खुद जिम्मेदारी लेते हो तो असफलता के लिये किसे जिम्मेदार ठहरावोगे। मलूकदासजी कह गये हैं " अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम्, दास मलूका कह गये, सबके दाता राम्।" एक बार सारी रात पलटु को ये ही सपना आता रहा की वो मर गया है. और उसकी सुबह आंख खुली तो उसको लगा की वो तो मर चुका है. और वो तो बिल्कुल भी हिले डुले भी नही. पडा रहा बिस्तर पर्... उसकी बीबी अशरफी काफी देर से आवाज लगा रही थी जब पलटु नहि उठा तो आ गयी बेलन लेकर्. यहाँ आकर देखा तो एक बार तो घबडा ही गयी। पर काफी दबंग महिला थी. सो धीरज रखते हुये पूछा ... के बात है ? पल्टु तो बिल्कुल सांस सी रोक के पडा रहा। अशरफी ने नब्ज टटोली और सब कुछ ठीक ठाक पाकर बेलन दिखाती हुयी बोली -- अरे नाश पीट्टे .. सत्यानाशी इब तो उठ ज्या.. सुरज देवता सर पे आ गया ... जंगल भी जाना सै ... लकडी लेने... फीर बेलन मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि पल्टु खटिया से कूद लीया। और बोल्या- ठहर ज्या, ठहर ज्या...जरा मेरी भी सुन ले. बात ये है की रात को मुझे सपना आया था कि मैं तो मर लिया. इब तु बता कि मैं कैसे उठूं ? अब तो अशरफी को और भी गुस्सा आ गया और हाथ पकड के दो चार बेलन पल्टु के चिपका दिये... और चिख कर बोली - अबे अकल के पैदल .. इस तरह नही मरते ..जब मौत आयेगी तो तेरे हाथ पाँव ठंडे पड जायेंगे । और पल्टु की इस मूर्खता पर अशरफी की हंसी भी छूट गयी. फीर उसको पुचकारते सी बोली --- इब नु कर .. तु रोटी कलेवा कर ले और जंगल चला जा.. लकडी ले के आवगा तब आज की रोटी बनेगी। उसको पुचकारना भी जरुरी था नही तो बच्चे भुखे मरते... पल्टु का क्या ? जंगल की बजाये और कहीं निकल ले और पांच दिन नहि आवे। ... वैसे इस जोडी का भी कोइ मेल नही था. पल्टु बिचारा 45 या ज्यादा से ज्यादा 48 किलो का सिंकीया पहलवान और अशरफी 70 या 75 कीलो की हट्टी कट्टी मजबूत कद काठी की औरत पल्टु की इच्छा तो जंगल जाने की नही थी पर अशरफी का बेलन अब भी उसके हाथ मे देखकर और मन मार कर जल्दी जल्दी डर के मारे आधे अधुरे कपडे पहन कर्, नंगे पाँव अपने गधे को लेकर चल पडा। सर्दियो के दिन थे. रास्ते मे बरसात होने गयी और पल्टु ज्यादा भीज गया. और उसको सर्दी सी भी लगने लग गयी. सो पल्टु ने एक पेड से गधे को बांध दिया और खुद भी एक पेड के निचे पड गया. थोडी देर मे उसको और सर्दी लगने लग गयी . पलटु ने अपने हाथ पाँव टटोले .. दोनो ही ठंडे हो रहे थे. उसको अशरफी की बात आयी की मरने पर हाथ पान्व ठंडे पड जाते है. सो अब उसको पक्का यकीन हो गया की अब वो सच मुच मर गया है। थोडी देर बाद उसने गधे की तरफ देखा तो एक शेर गधे की तरफ धीरे धीरे बढ़ रह था. इतनी देर मे शेर गधे के पास पहुंच चुका था. और उसकी गरदन पकडने की कोशिश कर रहा था. और गधे राम उससे बचने के लिये दुल्लत्ती झाड रहे थे. पल्टु बोला - भई क्या करे ... हम तो मर चुके हैं अगर जिंदा होते तो इस शेर की ये मजाल की हमारे गधे की तरफ आंख भी उठा ले........... अब पल्टु ने ये मरने का भ्रम पाल लीया ... इसमे उसकी सुविधा है. जिंदा हो तो शेर से लडना पडे... ऐसे ही हम भी अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से भ्रम पाल के बैठ जाते है. क्योंकी ये हमारे लिये आसान हैं. अगर अशरफी के जैसे कोइ हमको बेलन दिखा कर भ्रम दूर भी करे तो हम उससे दूर भाग लेते है. बाबाओ के दिखाये भय से हम डरते हैं. और गुनाह की माफी की बात करते है। अगर ईश्वर दंढ ही देने वाला है, तो वो फीर ईश्वर ना होकर जेलर हो गया। नही ये बिल्कुल नही चलेगा परमात्मा से डरो मत, वो तुम्हारा अभिन्न साथी है। बाबा बुल्लेशाह ने कहा कि ... रब यानि खुदा को भी क्या पाना है. ये तो ऐसा ही है कि इधर से उठा कर उधर रखना है। और ग्रंथों मे तो परमात्मा को रस रुप बताया है. परमात्मा तो पीने जैसा है. अभी ईधर एक हिंदी फिल्म jab we met का गीत .. जिसके एक अंतरे मे गीतकार लिखता है. माही मेरा शर्वत वर्गा , जी करे गट गट पी ला. यकीन मानिये यही परम तत्व है। फिल्म मे चाहे जिस संदर्भ मे लिया गया हो. और मुझे ऐसा लगता है कि ये अंतरा भी बाबा बुल्लेशाह कि किसी काफी का ही होगा. ऐसी सुंदर रचना बुल्लेशाह के अलावा परमात्मा की याद मे कौन गा सकता है. और स्वयं बाबा बुल्लेशाह के जागरण की घटना भी ऐसी ही क्षण मात्र मे घटती है। एक बार ऐसा हुवा कि पल्टु की बीबी अशरफी कुछ ज्यादा ही बीमार पड गयी. जब ये लगा की अब बचना मुश्किल है तो मुझे भी बुलाया .. मै भी वहीं परथा. अशरफी ने पल्टु से कहा कि देख पल्टु तू मेरे मरने के बाद मेरे कपड़े तेरी दुसरी बीबी को मत देना , मुझे मालूम है कि तु दुसरी शादी करे बगैर तो रहेगा नही पर मेरी इतनी सी बात तु जरूर मान लेना। अब पल्टु बोला- तु भी कैसी बाते करती है ... ? तुझे मालूम है मै तुझसे कितना प्यार करता हू. मै तेरे बाद जान देदुंगा पर दुसरी शादी हरगिज नही करुंगा. और पल्टु ने कनखियों से मेरी तरफ देखा. क्योंकि एक बार मैने पल्टु को उसकी महिला मित्र अनारो के साथ पार्क मे पकड़ लिया था और उसने मेरे बहुत हाथ पैर जोडे थे कि मै ये सब अशरफी को ना बताऊँ. क्योंकी मैं भी उसी मोह्हल्ले मे रहता था। मुझे आश्चर्य हुवा पल्टु के इस तरह झूंठ बोलने पर्. पल्टु वैसे तो मन ही मन खुस था की चलो इस खुसट औरत से पल्ला छूट रहा है.. पर अंत समय मे इसका दिल क्यू दुखाया जाये. सो मेरी तरफ मुँह पर उंगली रख कर चुप रहने का आग्रह करता हुवा .. उदास स्वर मे बोला -- नही..... नही मेरा यकीन करो मैं दुसरी शादी नही करुंगा ये मेरा वादा है तुमसे ....और फीर अनारो को तुम्हारे कपड़े भी कहाँ आयेंगे। ? कितना ही छुपाओ दिल कि बात आखिर जुबान पर आ ही जाती है. नही .... पल्टु मत बनो.. बाहर भीतर से एक जैसे रहो... परमात्मा की शराब तुम पर बरसने लगेगी. और जिस घडी परमात्मा की मदिरा तुमने पी ली... फिर इसका नशा नही उतरेगा.... विजय माल्या की दारु और बियर का नशा रात करो सुबह उतर जाता है. पर परमात्मा की शराब का नशा चढ्ता देर से है पर एक बार चढ गया फीर नही उतरता . पी के तो देखो.... शेष फिर कभी................. .

1 comments:

  1. Roshan from hissar
    pothii puraan padhke mazze aage..
    baba logo ki tau loo hii utaar dee...band mat karnaa ..yo jaruri sei

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