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"क्या लिखूं…!" बस सींग घुसेड दो...कहीं भी घुसेडो!



अब ये बडी अजीब स्थिति है कि लेखक को यही नहीं मालूम हो कि क्या लिखे…तो मामला पेचीदा हो जाता है. वैसे तो संपादक या मालिक प्रबंधक बता देता है कि इस विषय पर कुछ ठोक ठाक कर जल्दी भेज दिजीये, कल के ही एडीशन में चेपना है. तो इसमें कोई दिक्कत नहीं होती, बस विषय के बारे में अपने दिमाग को एक जगह टिकाओ और उन विचारों में आवश्यकतानुसार कम ज्यादा सींग घुसडते हुये लिख डालो, पांच मिनट में लेख तैयार है. आपकी टाईपिंग की स्पीड कम हो तो कुछ ज्यादा भी लग सकता है.


पर यहां तो कोई विषय ही नहीं है…. फ़ुरसतिया जी ने फ़रमान जारी कर दिया कि बस सींग घुसेडने हैं चाहे कहीं भी घुसेड दो अबकि बार...खुली छूट है....चाहे टेपरिकार्डर, अनशन, साल दर साल, अच्छे दिन या और कोई नही मिले तो "भाईसाहब" को ही घुसेड दो…पर घुसेडो जरूर, भले ही भाईसाहब को सींग घुसेडने के चक्कर में "भाभीजी" से पिट जाना पर चूकना मत. वैसे भी हमारे गुरूजी का कहना है कि व्यंगकार वही जो साठा पाठा होकर भी बछडे की तरह कहीं भी सींग घुसेडने में माहिर हो.
 
अब हमारी आदत है कि हम चाहे और कुछ ना घुसेडे पर सींग घुसेडने की आदत पुरानी है और इसी वजह से हमारे सींग भी आजकल कुछ भोथरे से हो चले हैं. हम सोच रहे हैं कि “बाज” की तरह हम भी कहीं एकांतवास में जाकर अपने पुराने सींग तोडकर नये उगवा आयें. कोशीश और हिम्मत कर रहे हैं, क्योंकि हम नब्बे दस के भी पार होना चाहते हैं जो कि नये सींगो के बिना संभव नही होगा.

हां तो हम “क्या लिखूं…” विषय पर अपने दिमाग को टिकाने की कोशीश कर रहे थे पर मुश्किल है…..आज तक कोई मौका ही नही आया ऐसा….अब हम जितना सोचते उतना उलझते जा रहे थे, हमने “माता बखेडा वाली” का भी ध्यान किया, प्रार्थना की….हे माता तू ही कुछ बता….दिशा दे….माता ने कुछ हल्का सा इशारा दिया…..पर स्पष्ट कुछ नही कहा. देवी देवताओं की बस ये ही एक आदत हमें आज तक पसंद नही आयी कि बस इशारा कर देते हैं, अब समझ लो तुम्हें जो समझना हो, और साफ़ साफ़ कुछ कहते नहीं. अब ये भी कोई बात हुई? रोज सुबह शाम फ़िर अगरबत्ती का खर्चा काहे करते हैं?  

थक हार कर हमने सोचा कि “संटू भिया कबाडी” के अड्डे पर जाकर ही दिमाग फ़्रेश करते हैं फ़िर वापस लौटकर कुछ सोचेंगे. भिया के अड्डे पर एक से एक विचारकों साहित्यकारों का जमावडा रहता है. वहीं बैठे बैठे किसी कबाडी विचारक से लिखने की प्रेरणा भी मिल जाती है. आप समझ सकते हैं कि कबाडी के गोदाम में सारे अनुभवी साजो सामान ही जमा रहते हैं. जैसे व्यंग और साहित्य की दुनियां में किसी नये लिक्खाड को जगह नही मिलती इसी तरह भिया के कबाडखाने में भी नये का क्या काम? वहां तो खेले खाये साठे पाठे लिक्खाडों की तरह दुनियां से विदा होते अनुभवी साजो सामान ही जगह पाते हैं और इन सामानों के अनुभव से साहित्य व्यंग की जो प्रेरणा मिलती है वो और कहीं से नहीं मिल सकती.

वहां पहुंचकर देखा तो संटू भिया कुछ पुरानी किताबें.. मैगजींस…पेन द्वात के ढेर को छांटने में व्यस्त थे. हमने उनके ध्यान को भंग किया तो हमारी और मुखातिब होकर पूछने लगे कि मेरा चिलम पीने का टाईम हो गया है तुम भी पीयोगे क्या? हमने कहा- भिया हम तो चिलम पीते नहीं बल्कि चिलम भरने का काम करते हैं….आप कहो तो आज आपकी भर दें? 
भिया ने हमको संदेह की दॄष्टि से देखते हुये कहा कि तुम बिना मतलब तो खुद की चिलम को पलीता नही लगाते फ़िर हमारी क्यों भरोगे? जरूर तुम कहीं फ़ंसे हो? बोलो क्या बात है? 

अब हम क्या कहते….चुपचाप बैठ गये और संटू भिया अपने काम में मगन हो लिये. तभी भिया ने एक पेन दिखाते हुये कहा – देखो ये पेन "कबीर" का है कई पुश्तों से हमारे कबाडे में शोभा बढा रहा है….हमने बात काटते हुये कहा, कबीर यानि कबीर बेदी का? 
अब भिया सटकते हुये बोले, अमा यार तुम इससे आगे की सोच भी नही सकते….. अरे भले आदमी ये कबीर यानि "संत कबीर" का पेन है वो जितना भी महान साहित्य रच गये हैं वो इसी से रच गये हैं….ये अनमोल पेन है….

हमारी समझ में आ गया कि भिया ने आज सुल्फ़े गांजे का  दम कुछ ज्यादा ही लगा लिया है तभी तो इस तरह की  बहकी बहकी बातें कर रहे हैं. 
हमने कहा – भिया, कबीर साहब तो पढे लिखे ही नहीं थे फ़िर पेन का क्या काम पड गया उनको? भिया फ़िर सिरे से उखडते हुये बोले – भले आदमी पेन चलाने और पढे लिखे होने का क्या संबंध? क्या कोई पीएचडी करके ही साहित्यकार, व्यंगकार, सुधारक या लिक्खाड बन सकता है? अरे ये बनने के लिये तो अंतर्मन की पीएचडी होनी चाहिये….पेन चलाना तो फ़ावडा चलाने जैसा ही है, जैसे मजदूर फ़ावडा चलाता है मजदूरी के लिये वैसे ही पेन भी मजदूरी के लिये चलाया जाता है....अपनी मौज में जो पेन उठाकर किसी को भी घुसेड दे वो हो सकता है कबीर...और आजकल पेन चलाता भी कौन है? सब की बोर्ड पर ठोकते हैं….. ये देखो “ग्राहम बेल” का की बोर्ड…..
संटू भिया की बेसिर पैर की बातें सुनकर हमारा दिमाग सिरे से ही उखड् चुका था…. हमने झल्लाते हुये कहा- भिया आज तुमको दिन भर से कोई मिला नही क्या? जो हमको पका रहे हो? भले आदमी “ग्राहम बेल” के जमाने में तो “की बोर्ड” हुआ ही नही करता था. अब तुम कहोगे कि ये देखो “परसाई जी” की कलम……?

अब भिया हमें कुछ मैगजींस दिखाते हुये बोले – देखो हमारे पास परसाई जी की ये “वसुधा” मैगजीन की कुछ कापियां संभालकर रखी हुई हैं जो हमें हमारे चचा मरहूम ने दी थी और जहां तक उनकी कलम का सवाल है तो हमने बहुत कोशीश की, उसे ढूंढ्ने की…..कहीं से मिल जाये तो मजा आ जाये. काफ़ी कोशीसे की उनका पेन खोजने की, पर बाद में पता चला कि परसाई जी की कलम तो उनके चेलों के बीच घूम रही है. सारे दावा करते हैं कि मेरे पास वाली कलम परसाई जी की असली कलम है….दूसरा अपनी वाली को बताता है…..पर ये अभी तक पता नही चल पाया कि असली किसके पास है…जैसे ही असली का पता लगेगा….हम तो उधार बैठे हैं खरीदने के लिये.  

संटू भिया ने हमारे दिमाग का दही जमा कर रख दिया था सो उस जमे हुये दही को लेकर हम घर लौट आये और अभी तक सोच रहे हैं कि “क्या लिखूं…!

सिगरेटिया धुआँ और फ़ेसबुकिया चिंतन



सिगरेट के धुआँ से छल्ले उडाना और फ़ेसबुकिया चिंतन करना दोनों ही एक कला की श्रेणी में आते हैं. सिगरेट के धुआँ से छल्ले उडाना जैसे हर किसी सिगरेट खींचू के बस का नही है वैसे ही फ़ेसबुकिया चिंतन करना भी हर किसी के वश का रोग नही हैं. दोनों ही कामों में महारत हासिल करनी पडती है. शुरू में सिगरेट पीने की शुरूआत किसी ताऊ किस्म के प्राणी की सद संगति में ही संभव है वर्ना तो पहला कश खींचते ही फ़ेफ़डे धुआँ से भरकर भरभराने लगते हैं. इस समय में यदि ट्रेनर दोस्त ढंग का हो तो आपको दम लगाने का सही तरीका सिखाकर ट्रेंड कर देता है और उसके बाद तो नाना प्रकार के प्रयोग करते हुये आप आडे टेढे मेढे या जैसे भी चाहें उस तरह के छल्ले उडा सकते हैं.


इसी प्रकार फ़ेस बुक की शुरूआत में भी आपको किसी एक गुरू घंटाल की जरूरत अवश्य पडती है. पहले तो फ़ेसबुक के तकनीकी बटनों को समझने की जरूरत में यही प्राईमरी गुरू आपको मार्गदर्शन देंगे और कुछ ही समय में आप खुद काम चलाऊ तकनीक सीख जायेंगे. आपके लिये सुझाव यह है कि इस तकनीकी कार्य के लिये किसी युवा, जो तकनीक का माहिर खिलाडी हो उसको अपना गुरू बनायें जैसे हमने ब्लागिंग में श्री आशीष खंडेलवाल को बनाया. अभी किसी साहित्यकार, गुरूघंटाल या व्यंगकार टाईप बुद्धिजीवी को गुरू बनाने की जरूरत नहीं है. इसकी जरूरत बाद में पडेगी.
जब आप तकनीकी कार्य में अर्द्ध कुशल हो जायें तब आप शुरू हो जायें और जो मन में आये वो पोस्ट करना शुरू कर दें….. विषय की चिंता बिल्कुल नहीं करें कि कोई क्या कहेगा? यहां ज्यादातर आपके जैसे ही हैं. इस पर भी आपके दिमाग के ताले बंद हों तो लिजीये हम आपको बता देते हैं कि आपको करना क्या है?

सुबह उठते ही बिस्तर पर बैठ जाये और प्रभु को याद करने की बजाये अपने मोबाईल के फ़ेस बुक एप्प को अपने दाहिनें हाथ की तर्जनी अंगुली से ठोकें (ध्यान रहे किसी और अंगुली का प्रयोग नही करना है वर्ना अनहोनी हो सकती है) और लिखें कि आपको आज गहरी नींद आयी या नही आई… सपने में क्या देखा?......बाथरूम में टुथपेस्ट मिला कि चूहे उठा ले गये रात को….और कहीं गूगल से ढूंढ कर चूहे का फ़ोटो सटा दिजीये….…नाश्ते में घर वाली ने आलू मूली परांठा दिया या लठ्ठ मारे…..और यदि ब्रह्मचर्य धारी हैं तो किसी अच्छी सी नाश्ते पानी वाली जगह का फ़ोटो सटा दिजिये नाश्ता करते हुये….ये ध्यान रहे कि फ़ोटो वोटो का जुगाड एडवांस में करके रखें, जिससे समय की बचत होगी. इसके बाद कुछ बिना देखे….यानि देखना या पढना नहीं है…चालीस पचास दोस्तों की पोस्ट पर लाईक के बटन को अवश्य ठोक बजा दें, कुछ पर वाह वाह..आह आहा टाईप कापी पेस्ट मार दे (भले ही कोई गमी की पोस्ट ही क्यों ना हो), यह इस बात की गारंटी होगी कि आपकी लगाई गई पोस्ट पर इतने लाईक प्रतिदान में यार लोग ठोक ही जायेंगे तो आपको आपकी पोस्ट सूनी मांग वाली नहीं लगेगी जैसी कि आजकल ब्लागर वाली पोस्टे निरी विधवा की सूनी मांग जैसा फ़ील देती हैं.

अब आप अगले कदम के लिये तैयार हैं, इत्ते दिनों में आपको यह पता लग ही गया होगा कि आपके ग्रूप में कौन कौन मठाधीष है….बस इन मठाधीष टाईप गुरूओं की कोई भी पोस्ट आपकी उपस्थिति से महरूम ना रह जाये, सतत लगे रहें, चटके के अलावा वाह वाह गुरू……आह आह गुरू….जैसे कमेंट अवश्य ठोकते रहें, कुछ ही समय बाद आप देखेंगे कि गुरू स्वयं आपके इन बाक्स में प्रकट हो जायेंगे और आपको विधिवत अपना शिष्य कबूल करके आपको फ़ेसबुक का परम ज्ञान प्रदान करेंगे. आप स्वयं धन्य महसूस करेंगे,  आप देखेंगे कि कुछ ही समय बाद आपकी गिनती भी मूर्धन्य फ़ेसगुरुओं में होने लगेगी और आप भी एक दिन अपने स्वतंत्र मठ की घोषणा करने के काबिल हो जायेंगे. 

अब एक बहुत ही जरूरी डिस्क्लेमर टाईप का ज्ञान आपको और देदेते हैं,  समझ लिजीये कि उपरोक्त खटकर्म करते हुये आप पक्के लतियल फ़ेसबुकिये बन चुके होंगे. सिगरेट की लत और फ़ेसबुक की लत दोनों एक समान होते हैं. जैसे सिगरेट पीने का लतियल हो चुका मानव जब भी सिगरेट की लत छोडना चाहता है तब वो यही प्रण करता है कि बस अब ये आखिरी सिगरेट पीलूं फ़िर कभी नही पीऊंगा….थोडी बहुत देर तक उसे अपना वादा याद रहता है उसके बाद कब उसके हाथ में सिगरेट आ जाती है और कब वो जलाकर पीने लगता है इस बात का उसको कोई एहसास ही नही रहता….पांच साथ घूंट खींचने के बाद उसे अपना वादा याद आता है तब वो सोचता है कि अब दस बारह रूपये की सिगरेट कौन खराब करे….इसको पी लेता हूं फ़िर इसके बाद कभी नहीं पीऊंगा और वो “कभी नही” फ़िर कभी नही लौटता. इसी तरह फ़ेसबुक के लतियल भी जब कभी इस लत से छुटकारा पाने की कसम खाते हैं तब एक आध दिन बाद ही उनको अपनी कसम याद नही रहती और गाफ़िल हुये ही कब अपना मोबाईल उठाकर फ़ेसबुक पर चटके ठोकना शुरू कर देते हैं यह पता ही नही चलता,  तब फ़िर वही सिगरेटिया चिंतन,  कि अब पांच दस चटके मार ही दिये हैं बाकी पर नहीं मारूंगा तो फ़ला फ़्रेंड नाराज होगा तो आज तो चटके मार लेता हूं कल से नही मारूंगा.
 
ना आदमी सिगरेट छोड सकता है और ना ही फ़ेसबुकियाना……..।

टेलीफोन की जुबानी, शीला, रूपा उर्फ रामूड़ी की कहानी


होरासियो विलेगेस ने 13 अप्रैल से 13 मई के बीच तीसरे विश्वयुद्ध की जब से घोषणा की है तबसे राम राम करते महीना पूरा होने में है. जिस तरह पेड़ की ऊंचाई से उतरते समय आदमी ऊँचाई से तो नही गिरता पर नीचे आकर जरूर से टपक लेता है कुछ वैसा ही हाल हमारा था. कल ही 13 मई थी और भविष्यवाणी का यही आखिरी दिन, एक एक पल काटना मुश्किल, अब बम गिरेगा, तब बम गिरेगा.  अब दुनियां के साथ साथ हम खत्म होंगे......और तो और हमको सबसे ज्यादा दुख तकलीफ इस बात की थी कि सारे फेसबुकिये मित्र भी छूट जाएंगे......फ़िर हम अपने मन को दिलासा देते कि ब्लागर से बिछुडे मित्र फ़ेसबुक पर मिल गये तो इस दुनियां से बिछुडकर कहीं और मिल जायेंगे. इन सब चीजों से बेखबर अनूप शुक्ल जी ने मौज लेते लेते आज का विषय थमा दिया "टेलीफोन". अब बताइये, ऐसे माहौल में कोई टेलीफोन के बारे में लिख सकता है क्या? पर सुकुल जी ठहरे ऐसे गुरू, जो परीक्षा में बच्चों को कठिन से कठिन सवाल ही पूछेंगे.

वैसे भी आजकल के मोबाइलों में वो आकर्षण नही है जो पुराने जमाने के डायल वाले टेलीफूंनो में था। इन कम्बख्तों के सीने में इतने बड़े बड़े राज दफन हैं कि शरीफ आदमी तो इनकी बात सुनकर ही प्राण त्याग दे. इनकी बातचीत सुनकर तो ऐसा लगता है की कहीं ये हमारी भी इज्जत के पंचनामे ना करवा दें.

आज के विश्वयुद्ध से बचें, यही प्राथमिकता थी, इससे बच पाए तो टेलीफोन की भी सुनी जाएगी। इसी टेंशन में हम चले जा रहे थे कि संटू भिया की खनकती आवाज से होश आया कि हम तो संटू भिया के कबाड़खाने आ पहुंचे हैं. भिया के कबाड़खाने में एक तलघर भी था, हम अपने डर की वजह से भिया के साथ सुरक्षित रूप से उनके "एंटी-न्युक्लियर बंकर" जैसे तलघर में ही आज का दिन काटना चाहते थे, सो जाकर वहीं एंटी-न्युक्लियर बंकर जैसे तहखाने में जम लिए.


तहखाने में कई तरह के कबाड़ पड़े थे तभी हमको अपने पीछे से कुछ बाते करने की आवाजें सी आती मालूम पड़ी...... एक बार तो हम डरे की कहीं ये हमारे उस्तादों वाली शीला...रुपा या रामूड़ी तो नही हैं? आखिर वो भी परमाणु हमले से बचने के लिए यहां आ छुपी हों? उस्ताद लोग उन्हें अपने हाल पे छोडकर सुरक्षित मांद में मजे कर रहे हैं और ये बेचारी शीला और रूपा यहां दिन काट रही हैं.

खैर हमारा ख्याल गलत निकला…..वहां तरह तरह के पुराने बाबा आदम के जमाने के टेलीफ़ोनों का ढेर लगा था और वो आवाजे उन्हीं के बतियाने की थी. वो बीते जमाने की बातें कर रहे थे. उनकी बातें सुनकर हम अपना डर भूलकर ध्यान से सुनने लगे. उनमें एक जो बहुत ही क्लासिकल मोडल था जिसे आपने फ़िल्मों में जरूर देखा होगा…..वहां रखे सभी फ़ोनों में बुढ्ढा होने के बावजूद भी उसमें एक शाही गरूर सा लगा….हमने पूछा, दद्दा,  आप तो फ़िल्मों में होते थे यहां क्या कर रहे हो?
बुढऊ ने आह सी भरते हुये कहा – क्या बतायें…हम तो सुरैया बेगम के ड्राईंग रूम में रहते थे और उन्हीं के इश्क में गिरफ़्तार होकर रह गये थे……हाय हमें अपने नाजुक नाजुक हाथों से पकड कर जब वो देव साहब से प्यार भरी बाते करती थी तो हमें चूम लिया करती थी, कसम से क्या दिन थे वो भी…..वो थोडा खांसा,,,,शायद बुढापे का असर था उस पर….फ़िर कहने लगा कि एक दिन देव साहब से बातें करते देखकर उनकी अम्मा ने हमे चूमते हुये देख लिया, बस फ़िर क्या था, अम्मा ने हमें ही उठाकर फ़र्श पर दे मारा और हमारी दोनों टंगडियां टूट गई और उस दिन के बाद हमने सुरैया बेगम की शक्ल तक नही देखी. और अब तक इंतजार में दिन काट रहे हैं……हाय मेरा इश्क परवान ना चढ सका, वो आह सी भरते हुये बोला….

तभी बीच में एक काला कलूटा सा बिल्कुल ही गरीब श्रेणी का डायल वाला पहलवान टाईप का फ़ोन बोल पडा – अरे ओ बुढऊ…अब कहां तेरा इश्क…वो तो कब का पाकिस्तान निकल लिया था बे. अरे इश्क तो हमने किये नही पर देखे खूब हैं….हमको ये काला पहलवान कुछ राजदार सा लगा सो हम उसकी तरफ़ मुखातिब हो लिये…पहलवान को जब लगा कि हम उसे तवज्जो दे रहे हैं तो शुरू हो गया. बोला…साहब वो भी क्या दिन थे? आजकल तो हर छोरे छारी की जेब में मोबाईल नाम का फ़ोन रहता है, हमारी तो क्या अब मोबाईल की भी कोई बख्त नही रही. अगला मोडल आते ही पिछला कबाडे में चला जाता है. और एक हमको देखो….सेठ लोगों की तिजोरियों के बराबर बैठा करते थे और सुबह सुबह सेठजी आकर लक्ष्मी जी के साथ साथ हमारी भी आरती उतारा करते थे. और हमारी छाती में तो इतने राज दफ़्न हैं कि यदि खोल दें तो भूचाल आ जाये.

हमने कहा भैये…ये भूचाल राहल गांधी और नसीमुद्दीन वाले ही हैं या कुछ सही भी हैं? वो नाराज होते हुये बोला – देखो साहब आप गाली तो हमें दो मत. हम राजनेता नही हैं हम तो वफ़ादार किस्म के हैं इसीलिये एक एक राज सीने में दफ़्न करके बैठे हैं.
हमने कहा – चचा…इता बोझ सीने पर लिये काहे बैठे हो….आपका अंत तो हो लिया….कुछ अपने राज हल्के करलो तो सकून से अगला जन्म ले पाओगे. खोल दो अपने दिल की गिरह….वो कुछ सोचते हुये बोला…अब क्या सेठजी की बेईमानी का राज खोलूं या सेठानी जी की बेवफ़ाई का या सेठ जी की छोरी शीला या रूपा का……?

शीला या रूपा नाम सुनते ही हमारी बत्ती टिमटिमाने लगी….हमने पूछा चचा कहीं तुम वो मढाताल वाले सेठ धन्नालाल के फ़ोन तो नही हो? वो खुशी से चहकते हुये बोला – अरे आप हमको कैसे पहचान लिये इत्ते सारे फ़ोनों में…..
अब हम क्या बोलते…..कि हम भी कयामत की नजर रखते हैं….पर हमने उसे चने के झाड पर चढाते हुये कहा – चचा आप यहां रखे सभी फ़ोनों में खानदानी लगते हो…बाकी में दम नही लगता. वो खुश होकर खिलखिलाने लगा….हमने लोहा गर्म जानकर अपने मतलब की बात पूछी….चचा आप कुछ वो शीला या रूपा की बात कर रहे थे……

काले पहलवान ने तो अब हमको अपना खास सगा मान लिया था सो बोला – आपको तो मालूम ही होगा कि किस्सा क्या हुआ था? हमने कहा मालूम तो है ही है,  पर वो सब उडती उडती सी खबरें ही थी अब आपके मुंह से सुने तो पक्का हो. वो बोला – आदमी तो आप सलीके के लगते हो, उडती बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिये बल्कि कानों सुनी पर ही करना चाहिये. वो किस्सा कुछ ऐसे हुआ था कि शीला बेबी कालेज जाने लगी थी…. और थी भी बला की खूबसूरत…..हमको जब अपने होंठों के पास ले जाकर हैल्लो कहती थी तो हमारे दिल की धडकने बढ जाया करती थी……और सच में बुढऊ टेलीफ़ोन की सांसे तेज चलने लगी….खांसने लगा, हमने सोचा कहीं ये सारे राज सीने में लिये लिए ही राम नाम सत्य ना हो जाये….हम इत्ता सोच भर रहे थे कि बुढऊ की आवाज आई… हां तो हम कहां थे….हमने कहा – चचा आप वो शीला वाला किस्सा बता रहे थे….
शीला के नाम से ही उसके काले चेहरे पर ऐसी चमक आगयी जैसे किसी ने चेरीब्लासम वाली पालिश करदी हो. वो कहने लगा – जब शीला बेबी कालेज से आती तो एक गोल मटोल सा हैंडसम लडका अपनी साईकिल लिये पीछे पीछे आने लगा….कुछ दिन तो यूं ही चलता रहा फ़िर मालुम पडा कि वो पास ही में रहने वाला है…कुछ तो नाम था उसका…याद नहीं आ रहा…..शायद…….मीर लाल या ऐसे ही कुछ था…

अब क्या बताये वो तो शीला बेबी और उसकी सहेली रूपा के पीछे हाथ धोकर ही पड गया, जब रास्ते में बात नही बनी तो उस लडके ने नया तरीके का पैंतरा खोज लिया और अपने दोस्तों से हम पर फ़ोन करवाने लगा. घंटी  बजती और उधर से कोई कहता , जी आपके पड़ौस में वो ...मीर रहता है ना उसे बुलवा दीजिये... बहुत जरूरी काम है.  फोन उठाने वाली शीला या रूपा होती तो ऐसी ऐसी बातें होती कि क्या बताऊँ....हम भी सेठ जी के यहां 3 पीढ़ी से रहे थे पर साहब ऐसा आशिक नही देखा था.... उसे बुलाने जब कभी बेबी उसके घर जाती तो  वहीं इनकी मिलने की ख्वाहिश पूरी हो लेती थी.

एक दिन का किस्सा बताऊं....मैं बजा ट्रिन...ट्रिन...ट्रिन...ट्रिन... फोन  घर के नौकर रामचरण ने उठाया, क्योंकि बेबी उस समय घर पर नहीं थी, उधर से कोई बोला कि मैं ..मीर का मौसा बोल रहा हूँ मीर को बुलवा दीजिये.....हमें रोज रोज की कसरत से शक तो हो ही चला था…हम भी दम साधे सुनते रहे....नौकर ..मीर को बुला लाया.... आते ही उसने घर मे चोर नजरों से किसी को ढूंढते हुए हैल्लो कहा…...हाँ मौसा जी नमस्ते, हाँ क्या कहा.... मौसी जी की तबियत खराब है?......
उधर से मौसा बोला - अबे स्साले मैं अमर बोल रहा हूँ बे.......अबे मैंने तेरी वाली को फ़ोन कर दिया है अब तू जाकर मेरी वाली को फ़ोन करदे….हमारा शक सही साबित हुआ.... हमसे क्या छुप सकता था क्योंकि बात तो हमारे द्वारा ही होती थी.

खैर शीला बेबी और उसकी मेल मुलाकातें बढती गयी पर किस्सा परवान नहीं चढ सका……हमने पूछा – चचा क्या हुआ? वो कुछ बतला पाता इसके पहले ही….उसकी आखिरी सांस उखडने लगी…..हमने कहा चचा आज आराम कर लो यदि आज विश्वयुद्ध टल गया तो कल आकर आपकी पूरी कहानी सुनेंगे. हमको अब शीला का राज तो आधा अधूरा पता चल चुका था पर ये रूपा का राज राज ही रह गया…

वाकई पुराने जमाने में घर में टेलीफ़ोन का होना रसूख तो था साथ ही साथ इस तरह के दिवानों के गले पडने का सबब भी था….जमाना उस दौर से मोबाईल के जमाने में आ गया पर जो राज पुराने टेलीफ़ोनों के सीने में दफ़्न है वो मोबाईल में कहां? मोबाइल में डिलीट सुविधा है पर इन काले फोनों में असली वाला दिमाग था, इस वजह से इनसे पंगा लेना अपनी खटिया खडा करवा लेने के बराबर था.

डिस्क्लेमर: कोई भी व्यक्ति इस किस्से को अपने आप से नही जोड़े, यह सिर्फ काल्पनिक है और किसी की जिंदगी से मिलता है तो महज सिर्फ एक संयोग है, और खासकर Udan Tashtari के बारे में तो बिल्कुल नही.

वही रामदयाल और वही रामदयाल की गधेडी की कडी निंदा...



आजकल निंदा शब्द बड़ा प्रचलन में है तो जो लोग इस खुशफहमी में हैं कि निंदा शब्द उनका आइडिया है तो वो इस गलतफहमी को अपने दिमाग से निकाल बाहर का रास्ता दिखायें क्योंकि निंदा तो पुरातन काल से चली आ रही है. निंदा करने, कडी निंदा करने और निंदित होने में जो मजा है वो और कहां मिलेगा. जी भरके निंदा करनी चाहिये और पेट भरके निंदित भी होते रहना चाहिये.
निंदा बडी गजब की दवा है तभी तो आजकल सरकारों की भांति ही जनता भी प्रयोग में लाने लगी है. कोई भी फ़ोरम हो चाहे सोशल मिडिया हो आजकल जमके निंदा की जाती है. और क्यों ना करें, निंदा करने से ही सारे कष्ट मिट जाते हैं तो हाथ पैर चलाने की कोई आवश्यकता ही नही है.  कबीर बाबा ने कितनी सटीक बात कही थी कीनिंदक नियरे राखिये...” इसका मतलब बस इतना भर था कि निंदा करने से बडे से बडा युद्ध भी टाला जा सकता है और  आपका साबुन पानी भी बचा रह जाएगा…चकाचक धुलाई होगी वो मुफ़्त में. क्योंकि निंदक आपके पास है तो वो निंदा कर करके सब मामला ही शांत कर डालेगा.


और फिर निंदित होने में कितना बड़ा सुख मिलता है जरा कल्पना कीजिये, निंदित होने वाला भी निंदित होकर वैतरणी पार हो लेता है..... ना कुछ खर्चा पानी और ना ही कोई बवाला...मनोरंजन मुफ़्त में. और इसीलिये तो निंदा करना और निंदित होना, महिलाओं के लिये इतना कीमती माना गया है. बस जरा चौका चूल्हा समेट कर फ़ुरसत हुई नही कि आसपास में किसी के यहां भी इकठ्ठी होकर निंदा महोत्सव शुरू कर देती हैं. पर महिलाएं इस गुमान में ना रहें की अब ये निंदा पुराण उनकी बपोती रह गया है अब तो सारे 56 इंच की छाती वाले मर्द और सरकारे भी निंदा की जगह कडी निंदा और घनघोर निंदा पुराण का सहारा लेने लगी हैं.

सार्क सरकारों की तो छोडिये आजकल नार्थ कोरिया वाला मोटू सांड, बुढऊ ट्रंपू और नवजवान सा बना पुतिन  भी एक दूसरे की निंदा और घनघोर निंदा में ही दिन गुजार रहे हैं. और इसमें बुराई भी क्या है? लोग जबरन उकसाते रहते हैं…..सोचो आपके उकसाने से इन्होंने परमाणु युद्ध छेड दिया तो क्या होगा?  भाई, चैन से निंदा और कडी घनघोर निंदा सुनते रहो और युद्ध से बचे रहों. हमें तो ये फ़ायदे का सौदा लग रहा है. युद्ध का इतना बडा खतरा मोल क्यों लेना? आजकल कडी निंदा के भरोसे तो गांव मुहल्ले के युद्ध निपटाये जा रहे हैं तो इसमे क्या बुराई है? क्यों आप दुनियां को मौत के मुंह में धकेलने में लगे हो? युद्ध होगया तो आपकी आने वाली पीढी आपको कोसने के लिये भी नही रहेगी.

अभी चार दिन पुरानी ही बात है कि चम्पालाल पहलवान के छोरे को रामदयाल के गधेडे ने जलेबी घाट पर जमकर दुल्लतियां  झाड़ दी और वहां से ये जा और वो जा…. अब गधा तो गधा उसका क्या ठिकाना कि कहां मिलेगा. छोरे को चोट वोट कुछ ज्यादा ही बैठ गयी थी.. शक्ल सूरत भी अन्जानी सी हो गई थी सो चंपालाल भी गुस्से से तमतमा गया, और तमतमाये भी क्यों नही, चंपालाल खुद 56 इंच के सीने वाला पहलवान ठहरा और उसका तो पूरा कुणबा ही पहलवानों का था सो घर में इस बवाले पर पंचायत बैठ्नी थी सो मई की इस भरी दुपहर में पंचायत बैठ गयी.

विचार विमर्श शुरू हुआ तो छोटे पहलवान बोले कि धिक्कार है हम पर जो इसका बदला नही लिया तो और गधे की तलाश में जुट गये. अब इतने बडे जंगल में गधे को कहां मिलना था सो घूम फ़िरकर वापस आ गये. जंगल में गधे को ढूंढना किसी बडे ढेर में सूई ढूंढने जैसा….और चंपालाल के भाईयों के पास अमेरिका जितनी सुविधायें भी नही थी कि जैसे ओसामा को अमेरिका ने एबटाबाद में ढूंढकर ठिकाने लगा दिया था वैसे ये भी गधे को ठिकाने लगा पाते. क्या करते? आ गये वापस, लाल पीले होते और अपनी 56 इंची फ़ुलाते हुये.

फ़िर सारे मोहल्ले के लोगों को इकठ्ठा कर लिया गया और सर्व सम्मति से यह तय पाया गया कि गधे के मालिक रामदयाल को पकडा जाये. वहां से हरकारे को भेज रामदयाल को तलब किया गया.
रामदयाल बोला – पहलवान भाई, आप क्या बहकी बहकी बातें करते हो? बोलने से पहले कुछ सोच भी लिया करो. अरे हमारे गधे कोई गंवार या बिना पढे लिखे थोडे ही हैं जो इस तरह के काम करेंगे? हमारे गधे तो बिल्कुल ट्रेंड, पढे लिखे और प्रोफ़ेशनल गधे हैं. यह काम वो कर ही नहीं सकते. और खबरदार यदि आपने आगे से ऐसे टुच्चे इल्जाम हमारे गधों पर लगाये तो…. अरे ये जरूर आप लोगों की कोई साजिश होगी जो खुद ही अपने छोरे का थोबडा बिगाड लिया और इल्जाम हमारे गधों पर लगा रहे हैं.

पंचायत में मौजूद सभी की बोलती बंद करके रामदयाल तो वहां से अपना वक्तव्य देकर खिसक लिये और पहलवानों का कुणबा सन्निपात की स्थिति में आ गया. सन्निपात इसलिये नहीं कि छोरे की दुर्गति हो गयी थी बल्कि इसलिये आया कि अब मोहल्ले में मुंह कैसे दिखायेंगे, छोरे की मां और बीबी बच्चों को क्या जवाब देंगे? फ़िर 56 इंच की छाती का क्या मोल रह जायेगा? गली मोहल्ले गांव में जहां पहलवान साहब ने अपनी धाक जमा रखी थी उसका क्या होगा?

इसी बीच चंपालाल पहलवान के पांच सात पठ्ठे और आकर जम गये और उन्होंने एक अनमोल सलाह दे डाली कि – भिया अबकी बार तो इस रामदयाल को ही बजा डालो, बहुत वर्ष हो गये हैंगे….इससे तो सभी परेशान हो गये हैंगे. तभी पहलवान के छोटे भाई कल्लू उस्ताद चश्में वाले ने बात को बीच में ही काटा और बोले कि ये बजा डालने का सही मौका नही है. बजाने के लिये तो तैयारी करनी पडेगी. अभी के लिये रामदयाल और उसके गधेडों की कडी निंदा का प्रस्ताव पास कर दिया जाये, बाद की बाद में देखी जायेगी.

सभी ने वहां कडी से कडी और घोर निंदा का प्रस्ताव पास किया, प्रेस रीलीज भेज दी गई. घर की औरतें जो छोरे के गम में कुछ ज्यादा ही गमजदा थी उन्होने इन पहलवानों पर कुछ इस तरह लानते भेजना शुरू कर दी जैसे भारत की जनता जब तब भेजती रहती है. पर पहलवानों को ना तब कोई फ़र्क पडा था और ना अब कोई फ़र्क पडेगा. यानि रहेगा वही रामदयाल और वही रामदयाल की गधेडी और कडी निंदा...

अभिनेत्री की चप्पल और ताऊ का जूता...



आदत के मुताबिक घूमने जाने की बजाये हम रमलू की चाय की गुमटी पर बैठे चाय की चुस्कियां सी लेते हुये शाम का अखबार बांच रहे थे कि हमारी नजर अचानक सामने से एटीआर हवाईजहाज की तरह फ़डफ़डाते से आते हुये संटू भिया कबाडी पर टिकी. वो सीधे लैंड करते हुये बेंच पर हमारे बगल में टिक लिये. हमने जरासा खिसकते हुये उन्हें लैंड करने की पर्याप्त जगह देते हुये पूछा – यार भिया, आप ये इतनी हवाई गति से आके क्यों टिके हो? चाय की गुमटी कहीं भागी जा रही थी या चाय यूरेनियम की तरह दुर्लभ होने जा रही थी. 

भिया नाराज से होते हुये फ़डफ़डाकर बोले – यार देखो, तुम्हारी कसम… तुम हर बखत हा… हा.. ठी… ठी.. वाली बात हमसे ना किया करो कसम से, वर्ना कसम से हम ताई के पास जाकर तुम्हारी पोल खोल देंगे कि तुम घूमने जाने की बजाये यहां रमलू की घुमटी पर अड्डेबाजी करते रह्ते हो. ये सुनकर हमने भिया को पुचकारते हुये से अपनी और खींचा तो भिया उवाचने लगे कि ….यहां हमारी जान निकले जा रही है और तुमको मजाक सूझ रही है. हमने गंभीर बनने की कोशीश करते हुये कहा – लो ये लो, हम गंभीर हो लिये अब बताओं समस्या क्या है? भिया बोले – तुम यहां से जल्दी उठो और हमारे साथ चलो, समस्या जहां है वहीं बतायेंगे.

हम क्या करते? हमारी तो कमजोर नश भिया ने पहले ही दबाकर अपनी पूंछ से बांध रखी थी सो चुपचाप  उठ लिये और संटू भिया की खटारा लूना पर पीछे की तरफ़ लद से लिये. और भिया फ़रार्टे से लूना को दौडाते हुये अपने कबाडखाने वाले गोदाम पर आकर ही रूके.

वहां पडे एक टूटे से बेंत के मुड्डे को हमारी तरफ़ खिसकाते हुये भिया खुद अपनी लोहे वाली सीट पर आसीन हो लिये. पास में ही दूर तक जूते चप्पलों की बारात सी लगी थी जिनमें से कुछ अजीब सी लडने भिडने की आवाजे सी आ रही थी…..हमने भिया की तरफ़ देखा…..वो आंखे गोल करते हुये बोले….यही तो समस्या है, वर्षों से इन चप्पलों का ढेर पडा था कोई खरीदने को राजी नही था पर अचानक से पता नहीं कहां से डिमांड खडी हो गई? बेचने के लिये बाहर निकाला था और अब इन्होंने महाभारत शुरू कर दिया….कि पहले मैं बिकूंगी….पहले मैं बिकूंगा….

हम भिया की सारी बात समझ गये और ध्यान से उस ढेर में से एक आऊट डेटेड अभिनेत्री सी दिख रही बूढ्ढी सी चप्पल से पूछा कि आप लोग लड भिड रहे हो या किसी फ़िल्म की शूटिंग कर रहे हो? वो आह सी भरती हुई बोली – अब क्या बताऊं, शूटिंग तो मैं जब माधुरी के साथ थी तब किया करती थी, जब  आऊट डेटेड हो गई तो तीन चार जगह रिसेल में बिकते बिकते इस मुए कबाडी को बेच दी गई….पर अब मेरे दिन फ़िर से फ़िरने वाले हैं पर इस बुढ्ढे खूसट ताऊ जैसे दिख रहे जूते को मेरी खुशी हजम ना हो रई है….

अब हमने वाकई  ताऊ सदृष्य दिख रहे काले कलूटे मोटी चमडी वाले उस जूते की तरफ़ देखा तो वो बडी ऐंठ और बेशर्मी से बोला -   ये देखो छुई मूई सी, भगवान कने जाने को तैयार हीरोईन..  कैसे इतरा रही है? इन्हें गरूर हो चला है कि अब इनका रसूख बढ जायेगा….अरे क्या रसूख बढेगा? ये 25 ग्राम की जिराफ़ जैसी दिखने वाली क्या कर लेगी? इनके तो ये हाल हैं कि शोहदे छोरे भी बार बार आकर इनसे पिटना चाहते हैं और पिटने में भी इनके मजे लेते हैं और एक हमको देखो….जिसकी खोपडिया पर एक बार टिक जाये तो वो दुबारा पास आने का नाम ना ले.

अब वो अभिनेत्री की चप्पल औरताना अंदाज में चीखती हुई सी बोली – अरे ओ ताऊ के बुढ्ढे खूसट जूते…ये पीटने पिटाने जैसे काम तुम जैसे लफ़ंगों को ही शोभा देते हैं. हम तो खाली आत्म रक्षा में इस उपाय को अपनाती हैं और मैं बात यहां पीटने पिटाने की नहीं कर रही हुं. तुम्हे क्या पता होगा? तुम पढे लिखे तो हो नहीं सो कहां से पता होगा? मैं बताये देती हूं कि अब हमें पहनने वाले भी हवाई जहाज में घूमेंगे और तुम यहीं पडे रह कर सडते रहना संटू भिया के कबाडखाने में…..
उस अभिनेत्री चप्पल की बात सुनकर वहां मौजूद सभी घिसी पिटी मजदूराना टाईप की चप्पलों के मुंह पर चमक आगई और एक पुराने रबर के टायर से बनी जनाना मर्दाना चप्पल ने पूछा – देखों बहन तुम तो हम सब की लीडर हो, कहीं तुम एकेली ही मत चले जाना हवाईजहाज से घूमने….हमें भी साथ लेकर चलना….


तभी बीच में उसकी बात काटते हुये ताऊ और उसके जैसे फ़टे पुराने काले कलूटे जूते जोर जोर से हंसते हुये शोर मचाने लगे….जनाना मर्दाना रबर वाली चप्पल की आवाज उनके शोर में ही दब गई और वो ताऊ जूता बोला – अरे जब झूंठ मूंठ की ही मिठाई खानी है तो गुड क्यों खाती हो बल्कि मावे छैने की मिठाई खावो…तुम चप्पल लोग क्या सोचती हो कि तुम हवाई जहाज में घूमोगी? ऐसा कभी नही होगा. आरक्षण की तरह तुम लोगों को 50 प्रतिशत कोटा मिला है और हम ताऊओं के रहते तुम्हारा कोटा तो ट्रेवल एजेंसियों के मार्फ़त हम ताऊ ही जीम जायेंगे…..हूंह…बडी आई…. हवाई जहाज में घूमने वाली कहीं की…..