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आप भी लठ्ठासन करते हैं क्या?

ताऊ ने सुबह घूमने जाते समय ताई से पूछा - मेरे साथ मार्निंग वाक् के लिए चल रही हो क्या?

ताई ने आँखे तरेरते हुए पूछा - तुम्हारा मतलब है मैं मोटी हो गई हूँ जो मुझे मार्निंग वाक् के लिए जाना चाहिये?

ताऊ बोला- मेरा वो मतलब नहीं था....तुम्हारी मर्जी...तुम सोवो मैं तो चला सुबह की सैर पर।

ताई फिर भडभड़ाती हुई बोली - नहीं नहीं...तुम मुझे आलसी और निठल्ली समझते हो? आखिर तुम कहना क्या चाहते हो?

ताऊ बोला - तुम बिना बात सुबह सुबह बात का बतंगड बना रही हो...

ताई फिर गुर्राई - तुम्हारा मतलब है की मैं बिना बात झगड़ा करती रहती हूँ और तुम शरीफजादे हो?

ताऊ ने सोचा आज सुबह सुबह किस मधु मक्खी के छाते में हाथ डाल दिया और हाथ जोड़ते हुए बोला- भागवान तुम बात को कहाँ से कहाँ ले जा रही हो? मैंने कब तुम्हें झगड़ालू कहा?

अब तो ताई का गुस्सा सातवें  आसमान पर था वो बोली - तो क्या मैं झूंठ बोल रही हूं?

ताऊ ने झुंझलाते हुए कहा - चलो छोडो अब मैं भी नहीं जाता....

ताई ने पास रखा अपना मेड-इन-जर्मन लठ्ठ उठा लिया और फटकारते हुए बोली - तो यूँ कहो ना की तुमको भी नहीं जाना था.....और इल्ज़ाम ख्वामखा मेरे मथ्थे....

इसके बाद तो ताई ने ताऊ को ऐसे लठ्ठासन करवाए की ताऊ दिन भर हल्दी चूना ही ढूँढता रहा।

हम "अंतर्यामी और सर्व जगह प्रकटम बाबा हैं मूर्ख...

ताऊ टीवी पर बहस चल रही थी "बाबा" शब्द कहां से आया? बहस में शामिल सभी बाबा गणों की बोलती बंद हो गई.... जैसे बाबा शब्द कोई गाली हो. एंकर रामप्यारे ने बहस छेड तो दी पर वह  खुद भी उलझ गया.



थोडी देर में  बाबाश्री ताऊ महाराज भी बहस के लिये कनेक्ट हो गये.....अचानक बाबाश्री को देखकर सभी घबरा गये...... पर एंकर रामप्यारे अपने स्वाभाविक जोश में था जैसा कि आमतौर पर सारे एंकर आ जाते हैं सो उसी रौ में पूछ बैठा... आप तो जोधपुर जेल में बंद थे यहां कैसे आ गये?

बाबाश्री ताऊ महाराज बोले -  अरे बावलीबूच... हम कोई छोटे मोटे बाबा नही हैं...असली बाबा हैं असली... तेरी जेल हमें क्या रोकेगी? हम "अंतर्यामी और सर्व जगह प्रटकम बाबा हैं मूर्ख....देख हम एक ही साथ  जोधपुर जेल में भी हैं... और सिरसा जेल में भी....और तेरे स्टूडियो में भी हैं..... हम तो लीला कर रहे हैं जेल में रहने की, वर्ना किसमें दम है जो  बाबाश्री ताऊ महाराज को जेल में डाले.

रामप्यारे एंकरिंग भूल चुका था....कुछ और पूछने की सोचता इतनी ही देर में बाबाश्री ताऊ महाराज अंतर्ध्यान हो गये.

एक पर एक फ़्री वाला वरदान चाहिये.

 तुम आजकल की लडकियों को क्या हो गया है?
बहु, कब तक बिस्तर पर मुंह फ़ुलाये पडी रहोगी?

बहु किसी तरह अपनी दोनों बेटियों को लेकर अपने पिता के घर लौट आई. जिसने भी सुना उसने पुलिस में शिकायत करने की सलाह दी.  पिता और भाई ने वकील से परामर्श किया. वकील साहब ने पुलिस केस करने की बजाय सिर्फ़  घरेलू हिंसा व गुजारा भत्ते के वाद लगाने की सलाह दी. शुरू से आखिर तक समस्त घटना क्रम का विवरण देते हुये केस लगा दिये गये.

उधर ससुराल में जैसे ही नोटिस सम्मन तामिल हुये कि सास गुस्से से उफ़न पडी. बहु की इतनी मजाल कि उसने हमारे खिलाफ़ केस लगाये? पति भी गुस्से से उबल रहा था, उसका बस चलता तो वहीं से बैठे बैठे गोली मार देता.

इतनी ही देर में बाबाश्री ताऊ महाराज वहां प्रकट हो गये और उनको गुस्से में लाल पीला होते हुये देखकर उनसे कुछ वरदान मांग लेने की पेशकश की. आप तो जानते ही हैं कि बाबाश्री ताऊ महाराज सर्वज्ञ हैं, कुछ भी कर सकते हैं.

सास ने वरदान मांगा कि उसका एक खून माफ़ किया जाये.
बाबाश्री ने पूछा - किसका खून करोगी?
सास बोली - बहु का.

अब बाबाश्री ताऊ महाराज पति की और मुखातिब हुये तो पति बोला - मुझे भी एक खून माफ़ माफ़ किया जाये,  लेकिन साथ ही एक पर एक  फ़्री वाला वरदान चाहिये.

बाबाश्री ताऊ महाराज बोले - एक पर एक फ़्री वाला लेकर क्या करेगा?
पति बोला - पत्नी को तो मां (यानि बहु की सास) निपटा देगी. मैं अपने ससुर और साले को निपटा दूंगा.

बाबाश्री ताऊ महाराज ने पूछा - अब ससुर और साले ने क्या बिगाड दिया तुम्हारा?
पति बोला - उन दोनों कमीनों की मदद  से ही उस कमीनी ने हम पर ये  केस लगाने की हिम्मत जुटाई  हैं. वर्ना उसकी इतनी मजाल कहां?

"जन ठोकपाल" पास करवा...तेरा कल्याण होगा !

कुछ ही समय पहले हस्तिनापुर में ऊंटनाथ पार्टी का शासन शुरू हो गया यानि ऊंट खडा हो गया. सांडनाथ व भैंसानाथ पार्टियों ने भीतरघात करते हुये उसके कदम रोकने शुरू कर दिये. ऐसे में ऊंटनाथ पार्टी को कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या करे और क्या ना करे?

एक शुभचिंतक ने ऊंटनाथ पार्टी के इकलौते विचारक मेजरीवाल को सलाह दी कि यदि सियासी चालों में सफ़ल होना है और सत्ता की मलाई का रसास्वादन करना है तो ताऊ महाराज धृतराष्ट्र की शरण में जाईये. इन मामलों में महाराज धृतराष्ट्र  से ज्यादा अनुभव किसी को नही है.

मेजरीवाल ने अपनी आशंका जाहिर करते हुये कहा कि ताऊ  महाराज धृतराष्ट्र तो सांडनाथ और भैंसानाथ पार्टी के सलाहकार हैं फ़िर वो हमको क्यों सलाह देंगे?

ऊंटनाथ पार्टी को राजनैतिक ज्ञान देते हुये  ताऊ महाराज धृतराष्ट्र

शुभचिंतक ने कहा कि ताऊ महाराज धृतराष्ट्र तो बिल्कुल निरपेक्ष आत्मा हैं वो तो बिल्कुल निरपेक्ष भाव से सबको सलाह देते हैं, जैसे चोर को कहेंगे - जा चोरी कर और साहुकार को सलाह देते हैं कि जागते  रहना.... आप तो तुरंत  ताऊ महाराज के पास जाईये.

मेजरीवाल अपने दो चार पठ्ठों के साथ महाराज के पास राजनैतिक शासन चलाने के लिये सलाह मांगने पधार गये. ताऊ महाराज धृतराष्ट्र उस समय ध्यानस्थ थे और मेजरीवाल को इतना टाईम कहां...उन्हें तो मुख्य मंत्री की कुर्सी के अलावा धरने प्रदर्शन के लिये भी समय निकालना पडता है. पर क्या करें...मजबूरी है...सो मन मार कर बैठे रहे. कुछ समय पश्चात ताऊ महाराज धृतराष्ट्र बाबा ठांशाराम की मानिंद अवतरित हुये. और दोनों में मंत्रणा शुरू हुई.

मेजरीवाल - ताऊश्री...हम तो फ़ंस गये...अब सरकार कैसे चलायें? यदि हस्तिनापुर की लोकल सरकार (विधान सभा) में उलझे तो हस्तिनापुर की बडी सरकार (लोक सभा) के लिये कैसे जुगाड जमायें? मैंने  समर्थन देने वाली ंसांडनाथ पार्टी के लोगों पर FIR  भी करवा दी, पर इतने बेशर्म लोग नही देखे जो समर्थन वापस लेते ही नही हैं.....और मैं यह पद छोडकर किस तरह भांगू? महाराज जरा इसका जुगाड बताईये.

ताऊ महाराज धृतराष्ट्र बोले - मेजरीवाल जी, इसमे कौन सी बडी बात है? आप नाहक चिंता करते हैं....एक काम किजीये....सांडनाथ और भैंसानाथ पार्टी के बडे बडे नेताओं पर जमकर भ्रष्टाचार के, मिली भगत के बडे बडे झूंठे सच्चे  आरोप लगाईये....लगे हाथ ही उनके साथ के कार्पोरेट्स को भी आरोपों से सराबोर कर दिजीये. फ़िर देखिये आपकी इच्छा तुरंत पूरी हो जायेगी....

मेजरीवाल बोले - पर ताऊश्री, सच्चे आरोपों का तो ठीक है पर झूंठे आरोपों का क्या करेंगे? उन  आरोपों को सिद्ध कैसे करेंगे?

ताऊ महाराज नाराज होते हुये बोले - मेजरीवाल जी, लगता है आपको राजनीति करना आती नही है जब हस्तिनापुर की विधान सभा नही चला सकते तो हरियाणा प्रदेश में सरकार बनाने का सोच भी कैसे सकते हो? अरे हरियाणा में जगह बनानी है तो जाट नीति सिखीये....वर्ना भूल जाईये हरियाणा और हस्तिना पुर की बडी गद्दी का सपना.....

ताऊश्री की बात बीच में काटते हुये ही मेजरीवाल जी बोले - ताऊ महाराज श्री, अब ये जाट नीति कहां से आगई? अभी तक तो सांडनाथ, भैंसानाथ, थर्ड फ़्रंट और फ़ोर्थ फ़्रंट की नीतियां ही सुनी थी.....

ताऊ महाराज धृतराष्ट्र ने मेजरीवाल की अक्ल पर तरस खाते हुये कहा - हद हो गई यार.....राजनीति करने निकले हो और जाट नीति नही जानते? क्या खाक राजनीति करोगे?

मेजरीवाल ने खसियाते हुये ताऊ महाराज धृतराष्ट्र से विनय करते हुये कहा - ताऊश्री, अब आप मुझको यह जाट नीति सिखा ही दीजिये....बडा एहसान होगा आपका हम पर.

ताऊ महाराज धृतराष्ट्र बोले - सुनो.....एक बार एक तेली और जाट का झगडा हो गया. तेली हाथ पैर से तो जाट से जीत नही सकता था सो वो जुबान ही चलाता रहा और आखिर में झगडा जब ज्यादा बढ गया तो तेली गुस्से में आकर   - जाट रे जाट, तेरे सर पर खाट.... कहते हुये भागने लगा

जाट ने जब ये सुना तो गुस्से में अपना लठ्ठ उठाकर तेली के पीछे भागते हुये चिल्लाया- तेली रे तेली, तेरे सर पर कोल्हू.....

जाट का जुमला सुनकर तेली बोला - तेली और कोल्हू का जुमला मिला नही...

जाट बोला - अबे बावलीबूच....जुमला नही मिला तो मत मिलने दे..जब सर पर कोल्हू लिये सारा दिन घूमेगा तो नानी याद आ जायेगी तेरे को.

यह कहानी सुनाकर ताऊ महाराज बोले - अब समझ आ गई जाटनीती कि और समझाऊं?

मेजरीवाल गदगद होकर बोले - महाराज श्री, सब समझ गया...अब जाट की तरह मैं भी झूंठे सच्चे, उल्टे सीधे, जो भी दिमाग मे आयेगा वो आरोप लगाना शुरू कर दूंगा...अगले उसी में उलझे रहेंगे...और मेरा काम बन जायेगा.

अब मेजरीवाल कंपनी ने सांडनाथ और भैंसानाथ पर अनर्गल आरोपों की झडी लगा दी...फ़िर भी सांडनाथ पार्टी ने अपना समर्थन वापस नही लिया तो मेजरीवाल घबरा कर फ़िर ताऊ महाराज धृतराष्ट्र की शरण में चले गये और बोले - ताऊ श्री, हमने उन पर इतने झूंठे सच्चे आरोप लगाये...अम्मा और युवराज के नाम पर भी आरोप लगाये...लिस्ट जारी कर दी...पर पता नही ये कैसे बेशर्म लोग हैं कि समर्थन वापस ही नही लेते....महाराज कुछ तो पक्का उपाय बताईये कि सांडनाथ पार्टी समर्थन वापस खींच ले और हमारी  जान छूटे और हम आसानी से हस्तिनापुर की बडी गद्दी (लोकसभा) का चुनाव लड लें.... आप तो कोई परफ़ेक्ट तरीका बताईये कि सांप भी मर जाये और मेरी झाडू भी बची रहे पर सामने वाले की लाठी टूट जाये.

ताऊ महाराज धृतराष्ट्र बोले - वत्स मेजरीवाल....अब एक काम कर....."जन ठोक पाल" पास करवा...तेरा कल्याण अवश्य होगा.

मेजरीवाल बोले - पर महाराज श्री...जन ठोकपाल पास करवाना लोक सभा के अधिकार में है उसे दिल्ली विधान सभा में पास नही करवाया जा सकता...इसमे संवैधानिक अडचन है.

ताऊ महाराज धृतराष्ट्र बोले - अरे ओ बावलीबूच मेजरीवाल....तेरे को जब इतनी ही संविधान की फ़िक्र है तो काहे को मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री बनने का ख्वाब देख रहा है? तू ये बता, जब तूने सामने वालों पर बिना आधार के आरोप लगाये जिनका कोई सबूत ही नही है,  वो संवैधानिक था क्या? तूने सब बडे नेताओं को चोर बेईमान कह दिया, उसका कोई सबूत है क्या?

मेजरीवाल बोले - महाराज कुछ के तो सबूत हैं पर कुछ के नही...बस यूं ही आप के कहने पर लगा दिये थे पर उन बेशर्मों को कोई शर्म भी नही आती.....

ताऊ महाराज धृतराष्ट्र बोले - हां अब समझ आया ना.....आरोप लगाना पहली स्टेज थी. अब बस इसी तरह मजे मजे में घोषणा कर दे कि "जन ठोक पाल" दिल्ली विधान सभा में पारित करवाऊंगा....और ये तेरे को मालूम ही है कि यह पास नही हो सकता और बस पतली गली से भाग लेना.....समझ गया ना या और समझाऊं?

मेजरीवाल को जैसे परम ज्ञान मिल गया हो...अपनी खांसी को रोकते हुये बोले - वाह ताऊ महाराज, आपने तो सही सलाह दे दी...बस यह जन ठोक पाल विधान सभा में रखवा दूंगा....और सांडनाथ व भैंसानाथ इसको सपोर्ट नही करेंगे...बिल गिर जायेगा...और मेरा छुटकारा हो जायेगा....

ताऊ महाराज धृतराष्ट्र बोले - अरे..तू रहा बावलीबूच का बावलीबूच ही......बिल को हर्गिज भी विधान सभा में मत ले जाना...उसके पहले ही  कन्नी काट लेना...समझ गया ना? अगर बिल विधान सभा में ले गया तो तेरा इस मुख्य मंत्री की कुर्सी से पीछा छूटने वाला नही है.....बस यह कहकर इस्तीफ़ा भिजवा देना कि जन ठोक पाल के लिये हजारों मुख्य मंत्रियों की कुर्सियां कुर्बान.....

ताऊ महाराज धृतराष्ट्र के वचन सुनकर मेजरीवाल जी अति गदगद हो गये और ताऊश्री को साष्टांग दंडवत कर वहां से सीधे अगली जन ठोक पाल की रणनीति पर विचार करते हुये  हस्तिनापुर की केंद्रीय सरकार के मुखिया बनने के सपने बुनने शुरू कर दिये.


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चुनावी साल में पांच हजार साल के राजनिती के अनुभवी "ताऊ महाराज धृतराष्ट्र" के अनुभव से लाभ उठाईये....हमारे विशेष पैकेज निम्नानुसार हैं :-

*जिसको भी चुनाव लडना हो...
  **सरकार बनानी हो....सरकार गिरानी हो.....
   ***अपने पक्ष में सर्वे रिपोर्ट करवाना हो...
    ****उम्मीदवारों के चयन में सहायता लेना हो...
     *****चुनाव हारना या हरवाना हो...
      ******चुनाव जीतना या जितवाना हो...
       *******किसी की खाट आडी या खडी करवाना हो....
        ********गठबंधन करना हो....गठबंधन तुडवाना हो.....
         
हर तरह के राजनैतिक मर्ज का तुरंत हल....

मूल्य सूची मंगवाने के लिये "ताऊ टीवी" से संपर्क किजीये.

नोट - हम सिर्फ़ राजनैतिक गठबंधन ही जुडवाते और तुडवाते हैं, वैवाहिक नही.

गाय को चार थन (दूध देने वाले) और बकरी को सिर्फ़ दो ही थन क्यों होते हैं?

ज्यादा पढा लिखा नही होने के बावजूद भी ताऊ एक सरकारी स्कूल में मास्टर बन गया. उन दिनों में वैसे भी आठवीं पास को सरकारी स्कूल में मास्टर की नौकरी आराम से मिल जाती थी. काम भी कोई ज्यादा नही होता था, बस स्कूल पहुंचकर बच्चों का हाजिरी रजिस्टर भरो और जो मर्जी में आये वो पढा दो. बच्चे भी पढने में कोई ज्यादा रूचि रखने वाले नही होते थे. कुल मिलाकर आराम का काम था. बच्चों को कुछ भी काम देकर आराम से कुर्सी पर बैठकर नींद में खर्राटे लेता और शाम को वापस घर पहुंच जाता था.

स्कूल में पढाता हुआ ताऊ

यह जिस साल की बात है उस साल एक छात्र कक्षा में नया नया आया था और वह छात्र कुछ ज्यादा ही जिज्ञासु प्रवृति का था. ताऊ से वो सवाल पर सवाल पूछता ही जाता था. अब ताऊ कुछ जानता हो तो उसको बताये भी. उल्टे सीधे जवाब देकर उसे टाल दिया करता था. क्योंकि वो सवाल पूछकर ताऊ की नींद में भी खलल डालता था.

एक रोज वो छात्र खडा होकर सवाल पूछने लगा और ताऊ उसके कुछ भी उल्टे सीधे जवाब देता रहा. अंत में उस छात्र ने पूछा - मास्टर जी, ये बताईये कि गाय और बकरी क्या है?

अब ऐसे सवाल कोई  ताऊ से पूछे तो इनका जवाब देना उसके बांये हाथ का काम था सो ताऊ ने तुरंत जवाब दिया - तुमको इतना भी नही मालूम कि ये दोनों ही पशु हैं.

छात्र ने पूछा - तो मास्टर जी, ये बताओ कि जब ये दोनों ही पशु हैं तो गाय को चार थन (दूध देने वाले) और बकरी को सिर्फ़ दो ही थन क्यों होते हैं?

अब ताऊ मुश्किल में पड गया. जवाब कुछ सूझा नही सो ताऊ ने उसका कान मरोडते हुये कहा - चल चुपचाप बैठ.. बावलीबूच कहीं का...तेरे को कौन सा पशु विभाग का निर्देशक बनना है, जो इतनी जानकारी ले रहा है? छात्र बेचारा चुपचाप अपना कान सहलाता हुआ बैठ गया.

ताऊ के इस व्यवहार व स्कूल में नींद निकालने की शिकायत ऊपर विभाग में भी पहूंच चुकी थी. कई बार स्कूल  निरीक्षक भी आया  लेकिन ताऊ इतना शातिर और हाजिर जवाब था कि कभी भी पकडा नही गया और स्कूल के छात्र ताऊ के डर की वजह से कुछ बोलते नही थे.

एक दिन सर्दियों के दिन बाहर धूप में ताऊ ने क्लास लगवाई और बच्चों को कुछ काम देकर खुद कुर्सी पर बैठ कर नींद निकालने लगा. थोडी देर में खर्राटे भी लेने लगा.  तभी स्कूल निरीक्षक वहां आ पहूंचा और बोला - ताऊ, आज तो तुम रंगे हाथों सोते हुये पकडे ही गये...अब तुमको सस्पेंड करवाऊंगा.

ताऊ ने बडे ही सहज भाव से उत्तर दिया - अरे इंस्पेक्टर जी....मैं सो नही रहा था, मैं तो बच्चों को प्रेक्टिकल करके बता   रहा था.

अब स्कूल निरीक्षक भी चौंका और पूछा  कि ये कौन सा प्रेक्टीकल करवा रहे थे?
ताऊ बोला - मैं बच्चों को बता रहा था कि सोते समय खर्राटे कैसे लिये जाते हैं.

स्कूल निरीक्षक ने बच्चों से भी पूछा तो डर के मारे बच्चों ने भी ताऊ की बात का ही समर्थन किया. स्कूल निरीक्षक अपना सर धुनता हुआ वापस चला गया.

अकेला ताऊ ही सारा पुण्य कमाए...इसके लिये मेरी आत्मा गवाही नही देती.

पुराने कहानी किस्से गांव की चौपाल पर मनोरंजन का साधन हुआ करते थे. उन पर यदि गौर करें तो आज वाकई हालात वही हैं. हर राजनैतिक पार्टी का मूल मंत्र हो गया है "मीठा मीठा गप और कडवा कडवा थू.. थू.." जिस तरह से आजकल राजनैतिक पाटियों के तेवर दिखाई दे रहे हैं उनसे तो लगता यही है कि ये सारे तो सरपंच ताऊ के भी ताऊ हैं. लिजीये एक किस्सा शुद्ध देशी हरयाणवी भाषा में पढिये और खुद ही अंदाज लगा लीजिये कि हमारी सभी राजनैतिक पार्टियां आखिर चाहती क्या हैं?  

गांव का दर्जी मर गया  और सारे ही गाम आले वहाँ पर इक्कठ्ठे हो गये अफ़्सोस प्रकट करण कै लिये.
दर्जी की घर आली को सारे गाम आले तसल्ली देण लाग रे थे. और दर्जी की बीबी जोर जोर तैं रोये जावै थी. तभी सियासी नेताओं की तरह सरपंच ताऊ भी वहां अपने चेले चपाटों के साथ पहुंच गया. 

इब ताऊ ने दर्जी की बीबी को ढाढस बंधाते हुये कहा - इब रोना धोना बंद करो और बच्चों को संभालो. इब रोने से तेरा घर आला तो वापस आवैगा कोनी.

तो दर्जिन बोली - अर ओ ताऊ ! रोवूं क्युं ना ? अरे वो मेरा खसम था... कोई पराया थोडे ही था?  जब तू मरेगा तब तो मैं रोवूं कोनी.  और मेरा रोने का कारण एक दुसरा भी है.

अब  वहां मौजूद सभी लोग चौंके कि भई यो  रोवण का दुसरा कारण कुण सा सै ?

इब ताऊ ने पूछा - हां तो बता,  तू क्युं कर रौवै सै इतनी जोर तैं ?
इब दर्जिन बोली - ताऊ मैं तो न्युं करके घणी रौवू सुं कि इबी मरने के तीन दिन पहले ही वो मोटर साइकिल
हीरो होन्डा आली खरीद कै ल्याया था.  इब उस मोटर साइकल नै कुण चलावैगा ? और फ़िर दहाड मार कै रोण लाग गी.
ताऊ बोल्या - अरे तैं भी के बावली बात करै सै ? अरे मैं गाम का सरपंच सूं.... वो जो काम बाकी छोड ग्या सै...उन सबको मैं पूरा करुंगा.  बावली तू चिंता ही मत कर.... मोटर साइकल मैं चलाउंगा....और तेरे दर्जी की आत्मा की तसल्ली की खातर उसमै पेट्रोल तू भरवा दिया करणा,  तेरे जी को भी तसल्ली रहवैगी.

इब वो दर्जिन फ़िर तैं  दहाड मारके रौवण लाग गी !
ताऊ ने फ़िर पूछा की - इब के हुया ? इब तूं क्यु रौवै सै ?
दर्जिन बोली - अरे ताऊ इब के बताऊं.  मैने उसके लिये परसों ही देशी घी के गौन्द के लडडु बनाए थे,  इब वो लडडु कुण खावैगा ?
ताऊ बोल्या - अरे तू बावली बात मत कर.  अरे जब मैं गाम का सरपंच सूं..... तो ये सारे काम भी मैं ही करुंगा,  तू फ़िकर ना कर, वो लडडु भी मैं ही खा ल्युंगा.... पर इब तू रौवै मना.

ताऊ की बात सुनकै,  इबकै दर्जिन नै किम्मै जोर तैं रुक्का मारया... और रौवण लाग गी....
ताऊ - इब के होग्या, इतनी जोर तैं क्यूं रुक्कै मारण लागरी सै ? तन्नै कह तो दिया कि तेरे दर्जी के छोडे हुये बाकी सारे काम मैं पूरे करूंगा....चल इब रुक्कै मारणा बंद कर...और टाबरां नै संभाल.
इबकै ताऊ की बात सुनकै दर्जिन उठकर खडी हुई और घणी जोर तैं रुक्कै मारती हुई  बोली - अरे ताऊ इब के बताऊं ? दर्जी तो मरग्या.... पर मेरे माथे पै  पचास हजार रुपये का कर्जा छोडग्या....  इब मैं न्युं करकै घणी 
रौवूं सुं कि वो कर्जा कौण चुकावैगा ?

दर्जिन की बात सुनकर ताऊ ने वहां बैठे गांव वालों की तरफ़ मुंह करके कहा - अरे भई गांव वालो... इतनी देर से इस गरीब विधवा के सारे काम मैं अकेला ही कर रहा हू...तुम चुपचाप बैठे हो...कुछ तो शर्म करो... क्या सारा काम सरपन्च के जिम्मै ही होवै सै ?

ताऊ की बात सुनकर वहां तीसरे मोर्चे (थर्ड फ़्रंट) की तरह बैठे गांव वाले ताऊ का मुंह देखने लगे.

गांव वालों को इस तरह हक्के बक्के देखकर ताऊ फ़िर बोला - गांव वालों...सुनो... पहले के सारे काम  मैने निपटाने का वादा कर लिया है.  इब ये जो आखिरी काम बचा  है ये तुम लोग निपटा दो....आखिर गांव मे किसी पर विपदा आई है तो मिलजुल कर ही काम करने पडेंगे....तुम भी कुछ पुण्य कमालो... अकेला ताऊ ही सारा पुण्य कमाए...इसके लिये मेरी आत्मा गवाही नही देती. 




भैंस मिलने की खुशी में "ताऊ गुरू-घंटाल महोत्सव - 2014" आयोजन

ताऊ की भैंसों अनारकली और चंपाकली को तो आप अच्छी तरह जानते ही हैं. ताऊ की भैंसों को कौन चोरी कर सकता है बल्कि वो खुद ही पूरे ब्रह्मांड में विचरण करने वाली सख्शियत रखती हैं. यमराज भी उनसे पनाह मांगते हैं.


असल में हुआ यों था कि ताऊ महाराज ने अपनी पुलिस की मुस्तैदी जांचने के लिये अपनी भैंसों को चांद पर सैर करने भिजवा दिया था और खबर फ़ैलादी कि भैंसे चोरी होगई. बस आनन फ़ानन में पुलिस लग गई और भैंसे हाजिर हो गई. अब भैंसे चोरी हुई होती तो कुछ परेशानी भी होती, यहां तो बस चंपाकली को एक फ़ोन किया कि अब वापस सारी भैंसों को लेकर वापस लौट आवो और वो तुरंत लौट आई. पुलिस और सरकार की वाहवाही हो गई कि आखिर ताऊ सरकार की पुलिस कितनी मुस्तैद है? ताऊ राज में जब भैंसे ही ढूंढ निकाली जाती हैं तो फ़िर दूसरे कोई गुनाह होना तो मुमकिन ही नही.

ये तो विपक्षी दल जबरन हवा फ़ैलाते रहते हैं. आप बिल्कुल भुलावे में ना आवे और ताऊ सरकार द्वारा प्रायोजित गुरू घंटाल महोत्सव का आनंद उठाये.

अगले सप्ताह "ताऊ गुरूघंटाल महोत्सव" का आयोजन किया गया है. इस महोत्सव में रंगारंग कार्यक्रमों के अलावा गुरू घंटाल - 2014  का गुरू घंटाल अवार्ड भी दिया जायेगा.  अन्य भी बहुत से ताऊ गुरू घंटाल अवार्ड दिये जायेंगे. रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है.

सभी ब्लागर्स से निवेदन है कि अपना अपना नामांकन जल्द से जल्द करवालें. इस साल का गुरू घंटाल अवार्ड घंटालों के घंटाल महा घंटाल गुरू के हाथों दिये जायेंगे. गुरू घंटाल समिति की चयन प्रक्रिया शुरू हो गई है. निम्न पदों पर सर्व सम्मति से चयन प्रक्रिया पूरी कर ली गई है.

 "गुरू घंटाल समिति के पदाधिकारी गण " 

अध्यक्ष     :     अरविंद मिश्रा"


सेकरेट्री     :     सतीश सक्सेना


कोषाध्य्क्ष :     ताऊ रामपुरिया

सरंक्षक :        डा. टी.सी.दराल

आजीवन सरंक्षक :         समीरलाल

गुरू घंटाल समिति की कार्यकारिणी  सदस्यों की चयन प्रक्रिया चालू है,  घोषणा शीघ्र ही की जायेगी. कार्यकारिणी में शामिल होने और अन्य खाली पद पाने के लिये आवेदन आमंत्रित हैं.